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131 दिन बाद जेल से रिहा हुए जफर अली, जामा मस्जिद से दी राजनीति में उतरने की झलक

Zafar Ali released from jail after 131 days, gave a glimpse of entering politics from Jama Masjid

संभल हिंसा के आरोपी जफर अली 131 दिन बाद जेल से रिहा होकर एक बार फिर सुर्खियों में हैं। शुक्रवार को जैसे ही वह जेल से बाहर निकले, बड़ी संख्या में समर्थकों ने उनका स्वागत किया। इसके बाद वह सीधे संभल की जामा मस्जिद पहुंचे, जहां उन्होंने जुम्मे की नमाज अदा की और फिर हाथ उठाकर नमाजियों को सलाम किया। जफर अली की रिहाई न केवल स्थानीय सियासत में हलचल पैदा कर रही है, बल्कि इसके बाद उनके राजनीतिक कदमों को लेकर भी अटकलें तेज हो गई हैं।

रिहाई का दिन: जुलूस जैसा स्वागत

जफर अली की रिहाई को लेकर उनके समर्थकों ने पहले से ही तैयारियां कर रखी थीं। जैसे ही जेल से बाहर निकले, उन्हें फूल-मालाओं से लाद दिया गया। उनके स्वागत में नारेबाजी हुई और माहौल किसी राजनीतिक रैली जैसा बन गया। समर्थकों के अनुसार जफर अली ‘जेल में भी एक जननायक’ की तरह रहे और अब ‘उनकी आवाज़ को दबाया नहीं जा सकेगा।’

जामा मस्जिद में नमाज, सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम

जफर अली को लेकर प्रशासन ने सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए थे। संभल की जामा मस्जिद में जुम्मे की नमाज के दौरान अतिरिक्त पुलिस बल, RRF और खुफिया एजेंसियों की मौजूदगी रही। ASP स्तर के अधिकारी मौके पर तैनात रहे। हालांकि नमाज के बाद कोई अप्रिय घटना नहीं हुई। जफर ने नमाजियों को सलाम करते हुए कहा कि वह ‘सिर्फ अमन और इंसाफ के लिए काम करेंगे।’

जफर अली की चुप्पी और राजनीति के संकेत

मीडिया से बातचीत में जफर अली ने सीधे-सीधे कोई राजनीतिक बयान नहीं दिया, लेकिन उन्होंने कहा कि “अब वक्त है इंसाफ की लड़ाई को नई दिशा देने का।” इस बयान को उनके राजनीतिक पदार्पण का संकेत माना जा रहा है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि “जेल से सीधा घर नहीं, पहले मस्जिद आया, ताकि अमन की दुआ मांग सकूं।”

क्या है संभल हिंसा मामला?

मार्च 2025 में संभल में दो समुदायों के बीच तीखी झड़पें हुई थीं, जिनमें कई लोग घायल हुए थे और सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुंचा था। पुलिस ने जफर अली को हिंसा का ‘मुख्य साजिशकर्ता’ बताते हुए गिरफ्तार किया था। उनके खिलाफ धारा 147, 148, 149, 295A, 307 और UAPA के तहत केस दर्ज किया गया था। हालांकि, सबूतों की कमी और गवाहों के बयान बदलने के बाद कोर्ट ने उन्हें ज़मानत दे दी।

सामाजिक और सियासी असर

जफर अली की गिरफ्तारी और अब रिहाई को लेकर संभल की सियासत में दो धाराएं साफ देखी जा रही हैं। एक तरफ जफर को ‘झूठा फंसाया गया’ मानने वाले लोग हैं, वहीं दूसरी ओर भाजपा और कुछ अन्य दलों का कहना है कि “यह कानून के साथ खिलवाड़ है।”

मुस्लिम युवाओं में बढ़ा प्रभाव

रिहाई के बाद जफर अली को लेकर सोशल मीडिया पर भारी चर्चा हो रही है। खासकर मुस्लिम युवाओं में उनके प्रति सहानुभूति और समर्थन दिखाई दे रहा है। कुछ पोस्टों में उन्हें ‘नई आवाज़’, ‘कौम का लीडर’ और ‘संविधान का सिपाही’ तक बताया गया है। यह बदलाव उनके राजनीतिक भविष्य की जमीन तैयार कर सकता है।

प्रशासन की चिंता और सख्ती

जफर अली की रिहाई को लेकर स्थानीय प्रशासन अलर्ट मोड में है। एक सीनियर अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि “हम हर गतिविधि पर नजर रख रहे हैं। अगर कोई कानून व्यवस्था भंग करने की कोशिश करता है, तो उस पर तत्काल कार्रवाई होगी।”

विपक्ष की प्रतिक्रिया

समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के कुछ स्थानीय नेताओं ने जफर की गिरफ्तारी को ‘राजनीतिक षड्यंत्र’ करार दिया है। समाजवादी नेता ने कहा, “सरकार अल्पसंख्यकों को दबाने का काम कर रही है, जफर अली जैसे लोग उस दमन के खिलाफ खड़े हो रहे हैं।” वहीं भाजपा के विधायक ने कहा, “जफर की रिहाई से स्पष्ट है कि कानून में खामियां हैं, हमें इस पर संसद में चर्चा करनी चाहिए।”

क्या बनेगा नया राजनीतिक चेहरा?

अब यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या जफर अली किसी दल में शामिल होंगे या खुद की कोई नई राजनीतिक पार्टी बनाएंगे? समर्थकों के अनुसार वे “जमीनी आंदोलन” की राजनीति करना चाहते हैं और जल्द ही एक जनसभा का आयोजन किया जाएगा, जिसमें वे अपनी योजनाओं का खुलासा कर सकते हैं।

निष्कर्ष

संभल हिंसा के आरोपी जफर अली की रिहाई ने उत्तर प्रदेश की सियासत को एक बार फिर गरमा दिया है। एक तरफ प्रशासनिक सतर्कता है, तो दूसरी ओर जनता के बीच उनकी लोकप्रियता बढ़ रही है। राजनीति में उनके आने की संभावनाओं को नकारा नहीं जा सकता। अब देखना होगा कि वे खुद को ‘मजहब के नेता’ तक सीमित रखते हैं या ‘समाज के प्रतिनिधि’ के रूप में स्थापित करने का प्रयास करते हैं।

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