प्रस्तावना: बारिश नहीं, सिस्टम डूबा है
जम्मू-कश्मीर के ऊधमपुर ज़िले में भारी बारिश के बाद जो हालात सामने आए हैं, वे किसी प्राकृतिक आपदा से कम नहीं हैं — लेकिन सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इस संकट की जड़ें केवल आसमान से गिरती बारिश में नहीं, बल्कि ज़मीन पर बैठे सिस्टम की लापरवाही में भी छिपी हैं। बिरमा पुल संसू क्षेत्र में जलभराव की स्थिति ने न केवल स्थानीय निवासियों की दिनचर्या ठप कर दी है, बल्कि प्रशासनिक दावों और इंजीनियरिंग व्यवस्थाओं की भी बखिया उधेड़ कर रख दी है।
सड़कें बनीं तालाब, घर बने द्वीप
भारी बारिश के बाद बिरमा पुल क्षेत्र की सड़कों ने नालों का रूप ले लिया है। मुख्य मार्ग पर कमर तक पानी भर गया, जिससे दोपहिया वाहन तो दूर, बड़े वाहन भी चलने में असमर्थ हो गए। स्कूल जाने वाले बच्चों को कीचड़ और गंदे पानी से होकर गुजरना पड़ रहा है, जबकि बीमार लोगों को अस्पताल तक पहुंचाने में भारी मुश्किलें आ रही हैं।
स्थानीय निवासी सुषमा देवी बताती हैं, “हमने पहले कभी ऐसा जलभराव नहीं देखा। घरों में पानी घुस चुका है, फ्रिज और टीवी तक खराब हो चुके हैं। रात भर बच्चे जागते रहे, क्योंकि सोने की जगह नहीं बची थी।”
शिकायतें पुरानी, समाधान अधूरा
पूर्व नायब सरपंच पवनजीत मेहरा बताते हैं कि इस जलभराव का कारण सिर्फ बारिश नहीं, बल्कि पिछले छह महीनों से लटकता आ रहा ड्रेनेज सिस्टम का मुद्दा है। “हमने PWD और BRO को बार-बार लिखा, कॉल किया, मौके पर बुलाया — लेकिन हर बार जवाब मिला कि ‘आज करेंगे, कल करेंगे’। आखिर कब तक?”
पवनजीत मेहरा का आरोप है कि इस क्षेत्र में नालों की चौड़ाई पर्याप्त नहीं है। बरसात का पानी शहर से होकर नहीं निकल पाता, और नालियों के ऊपर अनाधिकृत निर्माणों ने भी जल निकासी को रोक दिया है। “ये नाला नाला नहीं, अब एक धीमा मौत बन चुका है।”
बीआरओ और इंजीनियरिंग विभाग पर उठे सवाल
बारिश ने BRO (Border Roads Organisation) की इंजीनियरिंग दक्षता पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि पुल के आसपास बनाए गए ड्रेनेज सिस्टम में कोई वैज्ञानिक सोच नहीं अपनाई गई, और जो निर्माण कार्य हुआ, वह भी मात्र कागज़ों में बेहतर दिखाने के लिए किया गया।
एक स्थानीय दुकानदार जगदीश कुमार कहते हैं, “BRO ने पुल तो बना दिया, लेकिन पानी के बहाव की दिशा और क्षमता का अध्ययन नहीं किया। अब देखिए, पुल के दोनों तरफ पानी ही पानी है।”
राजनीतिक चुप्पी: कोई प्रतिनिधि नहीं आया देखने
सबसे हैरानी की बात ये है कि जब सारा इलाका डूबा हुआ था, तब कोई ज़िला परिषद सदस्य, विधायक या अधिकारी मौके पर नहीं पहुंचा। स्थानीय निवासी महेश शर्मा नाराज़गी जताते हुए कहते हैं, “चुनावों के वक्त तो रोज़ गली में दिखते हैं नेता, पर जब ज़मीन पर संकट होता है, सब अपने AC ऑफिस में बैठ जाते हैं।”
अस्पतालों और स्कूलों पर भी असर
बिरमा पुल क्षेत्र के पास स्थित सरकारी स्कूलों और एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में भी जलभराव हो गया है। स्कूल प्रशासन को छुट्टी घोषित करनी पड़ी, जबकि स्वास्थ्य केंद्र के स्टाफ को जूते निकालकर घुटनों तक पानी में चलकर मरीजों को देखना पड़ा।
स्वास्थ्य केंद्र की एक ANM (सहायक नर्स मिडवाइफ) ने बताया, “हमने बिजली की सप्लाई बंद कर दी, क्योंकि पानी मशीनों तक पहुंच चुका था। अगर शॉर्ट सर्किट हो जाता, तो बड़ा हादसा हो सकता था।”
आपातकालीन व्यवस्था नदारद
जिला प्रशासन ने किसी प्रकार की आपातकालीन व्यवस्था लागू नहीं की। न तो पानी निकालने के लिए मोटर पंप भेजे गए, न ही राहत शिविर या खाद्य सामग्री वितरित की गई। स्थानीय स्वयंसेवकों और युवाओं ने ही ट्रैक्टर और प्लास्टिक की नावों से बुज़ुर्गों और बच्चों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया।
क्या है ड्रेनेज समस्या की जड़?
- अधूरी योजना: क्षेत्र में ड्रेनेज विस्तार योजना बनी थी लेकिन बजट पास नहीं हुआ।
- अनधिकृत निर्माण: नालों के ऊपर लोगों ने अवैध तरीके से घर और दुकानों का निर्माण किया।
- रख-रखाव में लापरवाही: महीनों से नालों की सफाई नहीं हुई, जिससे कूड़ा-कचरा जमा होकर पानी के बहाव को रोक रहा है।
- तकनीकी त्रुटियां: जलनिकासी के पाइप की ढलान और आकार दोनों अपर्याप्त हैं, जिससे पानी रुकता है।
प्रशासन की प्रतिक्रिया
जब इस मुद्दे पर PWD और BRO अधिकारियों से प्रतिक्रिया मांगी गई, तो BRO के एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “हमने पुल निर्माण तो समय पर पूरा किया, लेकिन ड्रेनेज की जिम्मेदारी नगर परिषद की है। हमें स्पष्ट निर्देश नहीं मिले कि पानी निकासी के लिए कौन विभाग अग्रणी होगा।”
वहीं ज़िला प्रशासन ने एक सामान्य बयान जारी कर कहा, *“जलभराव की समस्या पर गौर किया जा रहा है, और टीम को भेजा गया है।” लेकिन कब, कैसे, और किस कार्ययोजना के साथ — यह नहीं बताया गया।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं
विपक्षी दलों ने इस आपदा को लेकर सत्तारूढ़ प्रशासन पर हमला बोला है। एक स्थानीय कांग्रेस नेता ने कहा, “मुख्यमंत्री विकास की बातें तो करते हैं, लेकिन ज़मीन पर एक नाला नहीं सुधारा जा सकता।”
वहीं भाजपा के एक पदाधिकारी ने कहा कि, “विपक्ष इस मुद्दे को राजनीतिक रंग दे रहा है। हम समस्या का समाधान जल्द निकालेंगे।”
स्थानीय लोगों की मांगें
- तत्काल ड्रेनेज विस्तार और सफाई कार्य
- BRO और PWD में समन्वय स्थापित किया जाए
- जलभराव वाले इलाकों में आपातकालीन राहत कैम्प बनाए जाएं
- स्थायी समाधान के लिए भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण
- उत्तरदायी इंजीनियरों पर कार्रवाई
निष्कर्ष: यह केवल एक मौसम की कहानी नहीं है
ऊधमपुर के बिरमा पुल क्षेत्र में आई यह जलभराव की त्रासदी हमें ये बताती है कि भारत में बुनियादी ढांचे की योजना और कार्यान्वयन में कितनी गहरी खामियां हैं। यहाँ न तो भविष्य को ध्यान में रखकर निर्माण होता है, न ही रख-रखाव को प्राथमिकता दी जाती है। और जब संकट आता है, तो प्रशासन हाथ पर हाथ धरे बैठा दिखाई देता है।
यह ज़रूरी है कि हम बारिश को दोष देने से पहले खुद से पूछें — क्या हम अपने शहरों को जल-संवेदनशील बना पा रहे हैं? क्या हम योजनाओं को लागू करने में उतनी ही ईमानदारी बरतते हैं, जितनी घोषणाओं में दिखाते हैं?
अगर नहीं, तो ऊधमपुर जैसे हालात भविष्य में और भी शहरों में दिखाई देंगे — और तब यह ‘खबर’ नहीं, आम ज़िंदगी बन जाएगी।















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