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UGC Circular Controversy: UGC के सर्कुलर से क्यों आमने-सामने आए GEN और OBC? वे दो प्रावधान जिनसे सवर्ण समाज में बढ़ा असंतोष

UGC Circular Controversy

UGC Circular Controversy: देश के संविधान ने न्याय, समानता, स्वतंत्रता और सहयोग को हमारे सामाजिक जीवन की बुनियाद माना है, लेकिन बीते कुछ दिनों से समानता की इसी अवधारणा को लेकर देश में तीखी बहस छिड़ी हुई है। विवाद का केंद्र बना है यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन (UGC) का एक नया नियम, जिसे सामान्य वर्ग यानी जनरल कैटेगरी के लोग अपने खिलाफ बताया जा रहा है।

सवर्ण समाज के लाखों छात्रों और अभिभावकों का कहना है कि यह नियम समानता को बढ़ावा देने के बजाय एक नए तरह के भेदभाव को जन्म देगा। उनका आरोप है कि इस प्रावधान का इस्तेमाल भविष्य में जनरल कैटेगरी के खिलाफ एक कानूनी हथियार की तरह किया जा सकता है।

सामान्य वर्ग क्यों कर रहा है विरोध?

UGC Circular Controversy

UGC के जिस नियम को समानता से जुड़ा बताया जा रहा है, उसे ही सामान्य वर्ग के छात्र भेदभावपूर्ण मान रहे हैं। उनका कहना है कि यह नियम उन्हें नुकसान पहुंचाने वाला है और इसी वजह से इसे वापस लेने की मांग की जा रही है। छात्रों ने सरकार को चेतावनी तक दे दी है कि अगर नियम वापस नहीं लिया गया तो आंदोलन तेज किया जाएगा।

यह मामला अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। UGC Regulations, 2026 की धारा 3(C) को शीर्ष अदालत में चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता मृत्युंजय तिवारी की ओर से दाखिल याचिका में कहा गया है कि यह नियम केवल SC, ST और OBC समुदायों के खिलाफ हुए जातिगत भेदभाव को ही मान्यता देता है।

याचिका के मुताबिक, इस व्यवस्था में सामान्य वर्ग के लोगों को जाति आधारित भेदभाव की शिकायत दर्ज कराने का अधिकार ही नहीं दिया गया है। इसे संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 के तहत दिए गए मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताया गया है। मांग की गई है कि Regulation 3(C) को असंवैधानिक घोषित कर इस पर तुरंत रोक लगाई जाए।

राजनीतिक प्रतिक्रियाएं

यह मुद्दा सामाजिक रूप से बेहद संवेदनशील माना जा रहा है। इसी कारण राजनीतिक दलों के नेता या तो खुलकर बोलने से बच रहे हैं या बेहद संतुलित बयान दे रहे हैं।
एक रिपोर्ट के अनुसार, हरियाणा प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष राव नरेंद्र सिंह ने UGC के नए नियमों की तीखी आलोचना की है। उन्होंने इन्हें देश के संघीय ढांचे के लिए खतरा बताया और कहा कि शिक्षा भले ही समवर्ती सूची में आती हो, लेकिन केंद्र सरकार UGC के जरिए विश्वविद्यालयों पर एकतरफा नियंत्रण थोप रही है, जिससे राज्यों के अधिकार प्रभावित हो रहे हैं।

2012 के नियमों से कितने अलग हैं 2026 के नए प्रावधान?

UGC द्वारा लागू किए गए नए नियमों का नाम है Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026। ये सभी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों पर लागू होंगे।

नए नियमों में जातिगत भेदभाव की परिभाषा का विस्तार किया गया है। अब SC और ST के साथ-साथ OBC समुदाय को भी इसमें शामिल किया गया है। यानी इन वर्गों के साथ भेदभाव पाए जाने पर कार्रवाई की जाएगी। जबकि 2012 के नियमों में OBC समुदाय को इस दायरे में नहीं रखा गया था।

इसके अलावा, हर उच्च शिक्षण संस्थान में एक इक्विटी कमेटी बनाना अनिवार्य किया गया है, जिसमें SC, ST, OBC और महिला प्रतिनिधियों की मौजूदगी जरूरी होगी।

शिकायत प्रणाली और सख्त समय सीमा

नए नियमों के तहत शिकायत दर्ज कराने के लिए हेल्पलाइन की व्यवस्था होगी। शिकायत मिलने के 24 घंटे के भीतर कार्रवाई शुरू करनी होगी और 60 दिनों के अंदर जांच पूरी करनी होगी।
अगर आरोप सही पाए जाते हैं तो दोषी के खिलाफ चेतावनी, आर्थिक दंड, निलंबन या निष्कासन जैसी सख्त कार्रवाई की जा सकती है।

ये नियम सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद बनाए गए हैं। 2012 के भेदभाव विरोधी नियमों पर सुनवाई के दौरान अदालत ने UGC को नए और मजबूत नियम तैयार करने को कहा था। हालांकि, अधिसूचना जारी होते ही विरोध शुरू हो गया।

वे दो प्रावधान जिनसे बढ़ा आक्रोश

सामान्य वर्ग के छात्रों का आरोप है कि नए नियम उन्हें पहले से ही दोषी मानकर चलते हैं, जबकि SC/ST और OBC को स्वतः पीड़ित मान लिया जाता है। अगर कोई जनरल कैटेगरी का छात्र जातिगत भेदभाव का शिकार होता है, तो उसके लिए कोई स्पष्ट सुरक्षा तंत्र नहीं है।

दूसरा बड़ा कारण यह है कि नियमों के ड्राफ्ट और अंतिम अधिसूचना में कई अहम बदलाव किए गए।
ड्राफ्ट में जहां OBC को जातिगत भेदभाव की परिभाषा में शामिल नहीं किया गया था, वहीं अंतिम नियमों में उन्हें जोड़ दिया गया।
इसके अलावा, ड्राफ्ट में झूठी शिकायत करने पर जुर्माने का प्रावधान था, जिसे अंतिम संस्करण से हटा दिया गया। इससे छात्रों को डर है कि फर्जी शिकायतों के जरिए किसी का करियर खराब किया जा सकता है।

छात्रों का कहना है कि अगर छोटी-छोटी बातों पर जांच में उलझना पड़ा, तो पढ़ाई पर गंभीर असर पड़ेगा। इसी वजह से 26 जनवरी तक UGC को नोटिफिकेशन वापस लेने का अल्टीमेटम दिया गया है।

विरोध के बावजूद UGC अपने फैसले पर अडिग है। आयोग का कहना है कि ये नियम कैंपस को सुरक्षित और समावेशी बनाने के लिए जरूरी हैं। साथ ही चेतावनी दी गई है कि जो संस्थान नियमों को लागू नहीं करेंगे, उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

UGC के इन्हीं बदलावों को लेकर अब GEN बनाम OBC की नई बहस ने जोर पकड़ लिया है।

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