UGC Anti-Discrimination Rules: यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन (UGC) द्वारा जारी Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026 को लेकर राजनीतिक हलकों में भी असहमति के स्वर तेज होने लगे हैं। शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे गुट) की सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने इन नियमों पर गंभीर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि प्रस्तावित व्यवस्था का दायरा स्पष्ट नहीं है और इसका क्रियान्वयन सभी वर्गों के लिए समान नहीं दिखता।
प्रियंका चतुर्वेदी ने आगाह किया है कि यदि इन नियमों को संतुलित और स्पष्ट तरीके से लागू नहीं किया गया, तो विश्वविद्यालय परिसरों में तनाव और टकराव की स्थिति पैदा हो सकती है। जनवरी 2026 में जारी UGC नोटिफिकेशन पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने सोशल मीडिया के जरिए कहा कि यह व्यवस्था सभी छात्रों को बराबर कानूनी सुरक्षा नहीं देती।
प्रियंका चतुर्वेदी ने क्या आपत्तियां दर्ज कीं?
UGC के नए नोटिफिकेशन पर टिप्पणी करते हुए सांसद ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर लिखा कि शिक्षा परिसरों में किसी भी तरह का जातिगत भेदभाव निंदनीय है और भारत इसके गंभीर परिणाम पहले ही देख चुका है।

उन्होंने सवाल उठाया कि क्या कोई कानून ऐसा नहीं होना चाहिए जो हर व्यक्ति को समान रूप से सुरक्षा दे? उन्होंने यह भी पूछा कि जब कानून लागू किया जाता है, तो उसमें चयनात्मक दृष्टिकोण क्यों अपनाया जाता है और सभी वर्गों को एक जैसी कानूनी ढाल क्यों नहीं मिलती।
UGC नियमों के संभावित दुरुपयोग पर चिंता
प्रियंका चतुर्वेदी ने इन नियमों में दुरुपयोग को रोकने के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपायों के अभाव की ओर भी ध्यान दिलाया। उन्होंने पूछा कि अगर कोई झूठा आरोप लगाया जाता है तो उसका क्या समाधान है? दोषी तय करने की प्रक्रिया क्या होगी?
उन्होंने यह भी स्पष्टता मांगी कि भेदभाव की पहचान किन आधारों पर होगी—क्या केवल शब्दों से, व्यवहार से या फिर सोच और इरादों से भी? उनका कहना है कि कानून का स्वरूप सभी के लिए स्पष्ट, निष्पक्ष और एक समान होना चाहिए।
इसी आधार पर उन्होंने सुझाव दिया कि विश्वविद्यालयों में अशांति बढ़ाने के बजाय बेहतर होगा कि UGC या तो इस नोटिफिकेशन को वापस ले या फिर इसमें जरूरी संशोधन करे।
UGC एक्ट का उद्देश्य क्या है?
UGC के अनुसार, Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026 का मकसद उच्च शिक्षा संस्थानों में भेदभाव के खिलाफ व्यवस्था को और मजबूत बनाना है।
इन नियमों के तहत कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में इक्विटी कमेटी, समान अवसर केंद्र, हेल्पलाइन और निगरानी तंत्र बनाना अनिवार्य किया गया है। साथ ही, भेदभाव की परिभाषा को व्यापक रूप दिया गया है, जिसमें सीधे तौर पर किया गया उत्पीड़न ही नहीं, बल्कि अप्रत्यक्ष पूर्वाग्रह और व्यवस्थित बहिष्कार भी शामिल हैं।
सामान्य वर्ग की मुख्य चिंताएं क्या हैं?
UGC का कहना है कि ये नियम 2019 से 2023 के बीच दर्ज की गई भेदभाव संबंधी शिकायतों में 118 प्रतिशत की बढ़ोतरी के मद्देनज़र तैयार किए गए हैं, जिनमें मुख्य रूप से SC, ST और OBC वर्ग से जुड़े मामले सामने आए थे।
हालांकि, सामान्य वर्ग के लोगों का मानना है कि यह ढांचा एकतरफा है। उनका तर्क है कि आरोप झेलने वालों के लिए पर्याप्त सुरक्षा नहीं है और ऊंची जातियों के छात्रों को गलत तरीके से निशाना बनाए जाने का खतरा बढ़ सकता है।
UGC एक्ट के समर्थन में क्या दलीलें हैं?
दूसरी ओर, इन नियमों का समर्थन करने वालों का कहना है कि यह कदम ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर रखे गए वर्गों को सुरक्षा देने के लिए जरूरी है। उनका तर्क है कि इसे रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन कहना सही नहीं होगा।
समर्थकों के अनुसार, नए नियम संस्थानों की जवाबदेही तय करते हैं। इसमें संस्थान प्रमुखों को उत्पीड़न की शिकायतों का समाधान करने और नियमित निगरानी के जरिए नियमों के पालन को सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी दी गई है।















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