भूमिका
निमिषा प्रिया, केरल के पलक्कड़ की एक नर्स, जिन्हें यमन की अदालत द्वारा एक स्थानीय नागरिक की हत्या के आरोप में मौत की सज़ा सुनाई गई है, अब मौत के मुहाने पर खड़ी हैं। उनकी फांसी 16 जुलाई 2025 को तय की गई है, और भारत सरकार की ओर से इस सज़ा को रोकने की संभावनाएं बेहद सीमित बताई गई हैं। यह मामला अब भारत के सर्वोच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका के माध्यम से पहुंचा है, जिसमें केंद्र सरकार से हस्तक्षेप की मांग की गई है।
भारत सरकार की सीमित भूमिका
14 जुलाई 2025 को अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणि ने सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया कि यमन की राजनीतिक अस्थिरता और वहां भारत की राजनयिक मान्यता न होने के कारण केंद्र सरकार की भूमिका सीमित है।
उन्होंने कहा:
“हमने जो कुछ भी संभव था, वह किया है। यमन दुनिया के किसी अन्य हिस्से जैसा नहीं है। हम नहीं चाहते थे कि यह मामला सार्वजनिक होकर और जटिल हो। हम निजी स्तर पर, वहां के प्रभावशाली लोगों और शेखों के माध्यम से प्रयास कर रहे हैं।”
सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई
जनहित याचिका में यह मांग की गई कि भारत सरकार तुरंत कदम उठाए ताकि निमिषा की फांसी को टाला जा सके। जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने मामले की गंभीरता को स्वीकार किया, लेकिन तत्काल कोई निर्देश जारी नहीं किया। अदालत ने इस मामले को 18 जुलाई के लिए सूचीबद्ध किया है।
ब्लड मनी (दिया) के ज़रिए समाधान की कोशिश
यमन के शरीयत कानून के तहत दोषी को मौत की सज़ा से बचने का एकमात्र रास्ता ब्लड मनी या ‘दिया’ है, यानी पीड़ित परिवार को आर्थिक मुआवज़ा देना। निमिषा प्रिया की मां, प्रेमा कुमारी, इस समय यमन में ही हैं और पीड़ित के परिजनों से बातचीत कर रही हैं।
यह बताया गया कि लगभग 1 मिलियन अमेरिकी डॉलर (करीब 8.6 करोड़ रुपये) की पेशकश की गई है। लेकिन परिवार आर्थिक रूप से बेहद कमजोर है। याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया:
“फंड जुटाना हमारी ज़िम्मेदारी है। इस समय एकमात्र विकल्प यही है कि पीड़ित परिवार को मना लिया जाए। सरकार सिर्फ सहायक भूमिका निभा सकती है।”
न्यायालय की चिंता और सीमाएं
जस्टिस संदीप मेहता ने कहा:
“यह बेहद संवेदनशील मामला है। असली चिंता इस बात की है कि अगर मां अपनी बेटी को खो देती हैं, तो यह अत्यंत दुखद होगा।”
जब याचिकाकर्ता ने अनुरोध किया कि अदालत सरकार को निर्देश दे कि वह जेल अधिकारियों से संपर्क में रहे, तो अटॉर्नी जनरल ने जवाब दिया:
“ऐसा हो रहा है।”
हालांकि जब कोर्ट से यह कहा गया कि अगर पीड़ित परिवार से बातचीत का कोई लिंक बनता है, तो फांसी को स्थगित करने का आदेश दिया जाए, जस्टिस मेहता ने कहा:
“हम ऐसा आदेश कैसे दे सकते हैं? उसे मानेगा कौन?”
सरकार की अनौपचारिक कूटनीति
अदालत में यह स्पष्ट किया गया कि भारत सरकार इस मामले को पूरी तरह निजी और अनौपचारिक कूटनीतिक चैनलों से देख रही है।
“यह एक अनौपचारिक संवाद ही रहने दें,” – जस्टिस मेहता
“हम सभी प्रार्थना करते हैं कि कुछ सकारात्मक हो,” – अटॉर्नी जनरल
केरल सरकार की अपील
केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने इस मामले को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री एस. जयशंकर को पत्र लिखा है, जिसमें उन्होंने मानवीय आधार पर हस्तक्षेप की मांग की है। कई धार्मिक और राजनीतिक नेताओं, जैसे कंथापुरम एपी अबूबकर मुसलियार और कुछ सांसदों ने भी निमिषा के पक्ष में अपील की है।
मामला क्या है?
निमिषा प्रिया एक प्रशिक्षित नर्स हैं, जो 2008 में नौकरी के सिलसिले में यमन गई थीं। 2017 में उनकी मुलाकात एक स्थानीय नागरिक तालाल अब्दो महदी से हुई, जो उनके बिज़नेस पार्टनर बने।
महदी ने कथित तौर पर निमिषा का पासपोर्ट जब्त कर लिया और शारीरिक तथा मानसिक उत्पीड़न करने लगा। दस्तावेज़ वापस लेने के लिए निमिषा ने उसे बेहोश करने की कोशिश में नींद की दवा का इंजेक्शन दिया, लेकिन ओवरडोज़ से उसकी मृत्यु हो गई।
इसके बाद निमिषा को गिरफ्तार किया गया और नवंबर 2023 में यमन के सर्वोच्च न्यायिक परिषद ने उनकी मौत की सज़ा को बरकरार रखा। यमन के राष्ट्रपति रशाद अल-अलीमी ने फांसी की मंजूरी दी है।
भारत के लिए चुनौती क्यों?
यमन में लंबे समय से गृह युद्ध और राजनीतिक अस्थिरता बनी हुई है। भारत की वहां कोई दूतावास या कूटनीतिक मिशन सक्रिय नहीं है। भारत यमन की वर्तमान सत्ता को राजनयिक मान्यता भी नहीं देता, जिससे आधिकारिक हस्तक्षेप बेहद कठिन हो जाता है।
संभावनाएं और विकल्प
निमिषा प्रिया की जान बचाने का फिलहाल एकमात्र रास्ता है कि पीड़ित परिवार ब्लड मनी स्वीकार करे और अदालत से ‘माफीनामा’ दिया जाए। इसके लिए फंड जुटाना और स्थानीय बातचीत में मदद करना ज़रूरी है।
याचिकाकर्ता का कहना है:
“अगर यह प्रयास 0.1% भी असर डाल सकता है, तो धनराशि को बाधा नहीं बनना चाहिए।”
निष्कर्ष
निमिषा प्रिया का मामला केवल एक कानूनी या कूटनीतिक मसला नहीं है, यह एक मानवीय त्रासदी बन चुका है। जहां एक ओर भारत सरकार की सीमाएं स्पष्ट हैं, वहीं दूसरी ओर एक मां अपनी बेटी की जान बचाने के लिए यमन की जमीन पर संघर्ष कर रही है।
सर्वोच्च न्यायालय ने यह तो स्पष्ट कर दिया है कि वह यमन की न्यायपालिका पर कोई आदेश नहीं दे सकता, लेकिन उसने यह भी संकेत दिया है कि सरकार के अनौपचारिक प्रयासों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
अब पूरा देश प्रार्थना कर रहा है कि 16 जुलाई से पहले कोई चमत्कार हो जाए — जिससे एक भारतीय नागरिक की जान बच सके और न्याय तथा दया का संतुलन बना रहे।
















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