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उत्तर भारत की तुलना में दक्षिण भारत में शिक्षा का स्तर अधिक, 1931 की जनगणना ने दिखाया फर्क

उत्तर भारत की तुलना में दक्षिण भारत में शिक्षा का स्तर अधिक, 1931 की जनगणना ने दिखाया फर्क

देश में इन दिनों जाति जनगणना को लेकर बहस तेज़ हो गई है। लेकिन क्या आपको पता है कि भारत में आखिरी बार जातिगत जनगणना साल 1931 में कराई गई थी? उस समय की जनगणना में सिर्फ जातियों की संख्या नहीं गिनी गई थी, बल्कि उनकी साक्षरता, सामाजिक हैसियत और आर्थिक स्थिति को भी ध्यान से रिकॉर्ड किया गया था। आमतौर पर ब्राह्मण और वैश्य जैसी सवर्ण जातियों को सबसे ज़्यादा पढ़ा-लिखा माना जाता है, लेकिन 1931 की जनगणना ने कुछ अलग ही तस्वीर पेश की थी। कई पिछड़ी और दलित जातियों की साक्षरता दर भी उम्मीद से ज्यादा पाई गई थी, जबकि कुछ सवर्ण जातियों की स्थिति उतनी मजबूत नहीं थी जितनी आम धारणा में मानी जाती थी। अब जब देश में दोबारा जातिगत जनगणना की मांग उठ रही है, तो यह जरूरी हो जाता है कि हम इतिहास को समझें और आंकड़ों के आधार पर ही भविष्य की नीतियों का निर्धारण करें।

1931 की जातिगत जनगणना के कुछ बेहद अहम आंकड़े आज भी चर्चा का विषय हैं। उस समय की रिपोर्ट बताती है कि पश्चिम बंगाल में वैद्य समुदाय सबसे पढ़े-लिखे जातीय समूहों में गिने जाते थे। इसी तरह महाराष्ट्र और गुजरात में कायस्थ समुदाय और केरल में नायर जाति साक्षरता के मामले में सबसे आगे थीं। इन जातियों ने पारंपरिक व्यवसायों के साथ-साथ आधुनिक शिक्षा, खासकर अंग्रेजी शिक्षा को भी अपनाया और नए क्षेत्रों में कारोबार फैलाया। 1931 की जनगणना के अनुसार, वैद्य समुदाय में पुरुषों की साक्षरता दर करीब 78% थी, जबकि महिलाओं की दर 48.6% थी। नायर समुदाय में पुरुषों की साक्षरता 60.2% और महिलाओं की 27.6% थी। वहीं कायस्थों में 60.7% पुरुष और 19.1% महिलाएं पढ़ी-लिखी थीं। ये आंकड़े बताते हैं कि उस दौर में भी कुछ जातियां शिक्षा और उद्यमिता के क्षेत्र में काफी आगे थीं, जो आज की सामाजिक-आर्थिक संरचना को समझने में मदद करते हैं।

1931 की जातिगत जनगणना में यह भी सामने आया कि देशभर में ब्राह्मण समुदाय साक्षरता के मामले में पांचवें स्थान पर था। ब्राह्मण जाति उत्तर में कश्मीर से लेकर दक्षिण में केरल तक फैली हुई थी। देशभर में ब्राह्मण पुरुषों की औसत साक्षरता दर 43.7% थी, जबकि महिलाओं में यह केवल 9.6% थी। हालांकि तब के बॉम्बे प्रांत में ब्राह्मण समुदाय की स्थिति बेहतर थी, जहां 78.8% पुरुष और 23.1% महिलाएं साक्षर थीं। पंजाब का खत्री समुदाय भी पढ़ा-लिखा माना जाता था। उनके पुरुषों की साक्षरता दर 45% और महिलाओं की 12.6% थी। वहीं, राजपूत समुदाय में पुरुषों की साक्षरता दर 15.3% और महिलाओं की मात्र 1.3% थी। इसके मुकाबले मराठा समुदाय की साक्षरता दर भी कम थी—22.3% पुरुष और 2.8% महिलाएं ही पढ़ी-लिखी थीं। ये आंकड़े बताते हैं कि जातियों के बीच शिक्षा का स्तर कितना असमान था, और यह असमानता आज भी कई स्तरों पर बनी हुई है।

अगर बात पिछड़ा वर्ग यानी OBC समुदायों की करें, तो 1931 की जनगणना के मुताबिक कुर्मी जाति उस दौर की सबसे पढ़ी-लिखी जातियों में से एक थी। कुर्मी समुदाय में पुरुषों की साक्षरता दर 12.6% और महिलाओं की 1.2% थी। यह उस समय की सामाजिक स्थिति को देखते हुए एक महत्वपूर्ण आंकड़ा था। वहीं, OBC वर्ग का एक और प्रमुख समुदाय—तेली—भी साक्षरता में पीछे नहीं था। तेली समुदाय में पुरुषों की साक्षरता दर 11.4% और महिलाओं की 0.6% थी। इन आंकड़ों से साफ होता है कि पिछड़ा वर्ग भी शिक्षा की दिशा में धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था, हालांकि महिलाओं की स्थिति अभी भी बेहद कमजोर थी। यह आंकड़े आज की सामाजिक नीतियों और आरक्षण व्यवस्था को समझने में ऐतिहासिक आधार प्रदान करते हैं।

1931 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, दलित समुदायों में साक्षरता की स्थिति बेहद चिंताजनक थी। सामाजिक भेदभाव और शिक्षा पर लगी पाबंदियों की वजह से इन समुदायों में पढ़ाई-लिखाई तक पहुंच सीमित थी। हालांकि डॉ. भीमराव अंबेडकर जिस महार समुदाय से आते थे, वह साक्षरता के मामले में अनुसूचित जाति-जनजाति (SC-ST) वर्ग में सबसे आगे था। महार जाति में पुरुषों की साक्षरता दर 4.4% और महिलाओं की केवल 0.4% थी। वहीं यादव जाति की स्थिति और भी कमजोर थी—जहां सिर्फ 3.9% पुरुष साक्षर थे और महिलाओं की साक्षरता दर मात्र 0.2% थी। ये आंकड़े उस दौर की सामाजिक असमानता और शिक्षा की पहुंच में जातिगत भेदभाव को स्पष्ट रूप से उजागर करते हैं।

1931 की जनगणना से यह बात भी सामने आई थी कि उत्तर भारत के मुकाबले दक्षिण भारत में साक्षरता का स्तर ज्यादा था। खासकर ब्राह्मण समुदाय में यह अंतर और साफ दिखाई देता है। उत्तर भारत के ब्राह्मणों में जहां धार्मिक शिक्षा का बोलबाला था, वहीं दक्षिण भारत के ब्राह्मणों ने आधुनिक और अंग्रेजी शिक्षा को तेजी से अपनाया। यही कारण था कि वहां की साक्षरता दर अधिक रही। इसके अलावा, बिहार और ओडिशा जैसे राज्यों में भी साक्षरता अन्य उत्तरी राज्यों की तुलना में बेहतर थी। इन राज्यों में ब्राह्मणों के बाद भूमिहार और राजपूत जातियां पढ़ाई-लिखाई के मामले में आगे थीं।

अब करीब 95 साल बाद देश एक बार फिर जातिगत जनगणना की ओर बढ़ रहा है। सरकार ने ऐलान किया है कि भारत में अगली जनगणना 1 मार्च 2027 से शुरू होगी, जबकि जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्यों में यह प्रक्रिया अक्टूबर 2026 से शुरू की जाएगी। गौरतलब है कि पिछली जनगणना 2011 में हुई थी, जिसमें देश की जनसंख्या करीब 121 करोड़ थी। अब अनुमान है कि यह आंकड़ा 140 करोड़ के पार पहुंच चुका है। ऐसे में नई जनगणना से न सिर्फ जनसंख्या का अद्यतन डेटा मिलेगा, बल्कि जाति और सामाजिक-आर्थिक असमानताओं को भी समझने में मदद मिलेगी।1931 की जनगणना से यह बात भी सामने आई थी कि उत्तर भारत के मुकाबले दक्षिण भारत में साक्षरता का स्तर ज्यादा था। खासकर ब्राह्मण समुदाय में यह अंतर और साफ दिखाई देता है। उत्तर भारत के ब्राह्मणों में जहां धार्मिक शिक्षा का बोलबाला था, वहीं दक्षिण भारत के ब्राह्मणों ने आधुनिक और अंग्रेजी शिक्षा को तेजी से अपनाया। यही कारण था कि वहां की साक्षरता दर अधिक रही। इसके अलावा, बिहार और ओडिशा जैसे राज्यों में भी साक्षरता अन्य उत्तरी राज्यों की तुलना में बेहतर थी। इन राज्यों में ब्राह्मणों के बाद भूमिहार और राजपूत जातियां पढ़ाई-लिखाई के मामले में आगे थीं।

अब करीब 95 साल बाद देश एक बार फिर जातिगत जनगणना की ओर बढ़ रहा है। सरकार ने ऐलान किया है कि भारत में अगली जनगणना 1 मार्च 2027 से शुरू होगी, जबकि जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्यों में यह प्रक्रिया अक्टूबर 2026 से शुरू की जाएगी। गौरतलब है कि पिछली जनगणना 2011 में हुई थी, जिसमें देश की जनसंख्या करीब 121 करोड़ थी। अब अनुमान है कि यह आंकड़ा 140 करोड़ के पार पहुंच चुका है। ऐसे में नई जनगणना से न सिर्फ जनसंख्या का अद्यतन डेटा मिलेगा, बल्कि जाति और सामाजिक-आर्थिक असमानताओं को भी समझने में मदद मिलेगी।

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