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बेटे की मृत्यु के बाद वंशवृद्धि की जिद: बॉम्बे हाईकोर्ट में मां की याचिका, ‘फ्रीज़ स्पर्म’ विवाद के केंद्र में

The insistence on progeny after the death of the son: A mother's petition in the Bombay High Court, at the center of the 'freeze sperm' controversy

आज के वैज्ञानिक और तकनीकी युग में जब प्रजनन तकनीक (Assisted Reproductive Technology) तेजी से आगे बढ़ रही है, वहीं इससे जुड़े नैतिक, कानूनी और पारिवारिक मुद्दे भी सामने आने लगे हैं। बॉम्बे हाईकोर्ट में हाल ही में सामने आया एक मामला इस दिशा में नई बहस को जन्म दे रहा है, जहां एक माँ अपने मृत बेटे की संतति पैदा करना चाहती है

मामला क्या है?

मुंबई की एक महिला ने बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दायर की है, जिसमें उसने माँग की है कि उसके मृत बेटे के संरक्षित शुक्राणुओं (Frozen Semen) को नष्ट न किया जाए और उसे गुजरात के एक आईवीएफ सेंटर में स्थानांतरित करने की अनुमति दी जाए ताकि वह परिवार की वंश परंपरा को आगे बढ़ा सके।

महिला का बेटा अविवाहित था और कैंसर के इलाज (कीमोथेरेपी) के दौरान उसने अपने शुक्राणु एक प्रजनन केंद्र (Fertility Centre) में फ्रीज करवा दिए थे। उसने उस समय एक सहमति पत्र (Consent Form) पर हस्ताक्षर किए थे जिसमें उसने स्पष्ट रूप से कहा था कि उसकी मृत्यु के बाद उसके शुक्राणु नष्ट कर दिए जाएं। लेकिन अब उसकी माँ कह रही है कि यह निर्णय बिना परिवार से परामर्श किए लिया गया था और वह चाहती है कि इन शुक्राणुओं का उपयोग कर परिवार की वंशबेलि को आगे बढ़ाया जाए।

अदालत का रुख

बॉम्बे हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति मनीष पिताले की एकल पीठ ने 25 जून को मामले की सुनवाई करते हुए अंतरिम आदेश में फर्टिलिटी सेंटर को शुक्राणुओं को सुरक्षित रखने का निर्देश दिया। उन्होंने कहा कि यदि इस याचिका के अंतिम निर्णय से पहले शुक्राणु नष्ट कर दिए गए, तो यह मामला निरर्थक हो जाएगा।

अदालत ने अगली सुनवाई की तारीख 30 जुलाई निर्धारित की है और तब तक के लिए शुक्राणुओं को सुरक्षित रखने का निर्देश जारी किया है।

कानूनी पेच: ART अधिनियम 2021

यह मामला Assisted Reproductive Technology (Regulation) Act, 2021 के तहत आया है, जो भारत में प्रजनन क्लीनिक्स और तकनीकों को विनियमित करता है। इस अधिनियम का उद्देश्य है:

  • नैतिक तरीकों को सुनिश्चित करना
  • भ्रूण, अंडाणु, शुक्राणु आदि के दुरुपयोग को रोकना
  • ART तकनीकों का दायित्वपूर्ण उपयोग सुनिश्चित करना
  • प्रतिभागियों के अधिकारों की सुरक्षा करना

इस अधिनियम के तहत मृत व्यक्ति के शुक्राणुओं का उपयोग किसी विशेष अनुमति या स्पष्ट सहमति के बिना नहीं किया जा सकता। और चूंकि इस मामले में मृतक युवक ने स्पष्ट रूप से अपनी मृत्यु के बाद शुक्राणुओं को नष्ट करने की अनुमति दी थी, इसलिए फर्टिलिटी सेंटर ने माँ को शुक्राणु देने से इनकार कर दिया।

माँ की दलील

याचिका दायर करने वाली महिला का कहना है कि उसके बेटे ने परिवार से परामर्श किए बिना यह निर्णय लिया था और अब, जब वह नहीं रहा, तो उसकी माँ होने के नाते उसे यह अधिकार होना चाहिए कि वंश परंपरा को बनाए रखने के लिए वह उसके शुक्राणुओं का उपयोग कर सके।

महिला चाहती हैं कि शुक्राणु एक गुजरात स्थित आईवीएफ क्लिनिक में स्थानांतरित किए जाएं, जहां आवश्यक प्रक्रिया के माध्यम से वह एक बच्चा उत्पन्न करा सकें।

यह मामला भावनात्मक दृष्टि से जितना जटिल है, कानूनी और नैतिक रूप से उतना ही संवेदनशील भी।


अहम सवाल जो इस मामले से उठते हैं:

1. क्या मृतक की सहमति अंतिम मानी जाएगी?

अगर किसी व्यक्ति ने स्पष्ट रूप से लिखा है कि उसकी मृत्यु के बाद उसका जैविक नमूना (शुक्राणु) नष्ट कर दिया जाए, तो क्या उसके परिवार के सदस्य, विशेषकर माता-पिता, इस पर आपत्ति कर सकते हैं? क्या उनकी भावनात्मक इच्छा कानूनी सहमति से ऊपर होगी?

2. क्या माता-पिता को ‘वंश चलाने’ के लिए ऐसा अधिकार दिया जा सकता है?

भारतीय समाज में वंश परंपरा का महत्व बहुत अधिक है। लेकिन क्या किसी अविवाहित, मृत व्यक्ति के शुक्राणुओं से कृत्रिम गर्भधारण कर एक बच्चा पैदा करना नैतिक रूप से स्वीकार्य है? वह बच्चा किसके नाम पर होगा? उसका कानूनी संरक्षक कौन होगा?

3. क्या यह ‘जैविक अधिकार’ है या ‘सामाजिक अपेक्षा’?

क्या मां की इच्छा जैविक अधिकार है या फिर सामाजिक दबाव और वंश परंपरा की अपेक्षा? और क्या इस तरह के निर्णय समाज में महिलाओं और बच्चों के अधिकारों पर असर डाल सकते हैं?

4. क्या यह निर्णय उस बच्चे के अधिकारों का उल्लंघन नहीं होगा जो भविष्य में जन्म लेगा?

क्या उस बच्चे को यह जानने का अधिकार नहीं होगा कि उसका पिता मर चुका था, और वह किस उद्देश्य से अस्तित्व में लाया गया? क्या यह ‘उचित पेरेंटिंग’ का हिस्सा होगा?


निष्कर्ष: अदालत का फैसला क्यों महत्वपूर्ण है?

यह मामला अकेले एक माँ और एक मृत बेटे तक सीमित नहीं है। यह हमारे देश में ART तकनीकों से जुड़े कानूनों और नैतिकता की गहराई को उजागर करता है। बॉम्बे हाईकोर्ट का यह निर्णय इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह एक नया दृष्टिकोण स्थापित करेगा — कि मृत व्यक्ति के जैविक नमूनों पर उनका अधिकार मृत्यु के बाद भी कितना वैध है, और पारिवारिक भावनाएं उस अधिकार से कितना ऊपर या नीचे हैं।

30 जुलाई को जब इस याचिका पर अगली सुनवाई होगी, तब संभवतः अदालत इस मामले में कुछ ठोस दिशा-निर्देश भी निर्धारित कर सकती है, जो भविष्य में ऐसे संवेदनशील मामलों के लिए एक नज़ीर बनेंगे।

यह कहना गलत नहीं होगा कि यह सिर्फ एक कानूनी याचिका नहीं, बल्कि आधुनिक विज्ञान, पारिवारिक भावना और नैतिक मूल्यों के टकराव की एक जीवंत मिसाल है — और इसका असर समाज, कानून और विज्ञान — तीनों पर पड़ेगा।

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