सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि बिहार में चल रही मतदाता सूची की विशेष पुनरीक्षण प्रक्रिया (Special Intensive Revision – SIR) के दौरान मतदाताओं की पहचान साबित करने के लिए आधार कार्ड और मतदाता फोटो पहचान पत्र (EPIC) को स्वीकार्य दस्तावेजों के रूप में मानने पर विचार करे। यह आदेश ऐसे समय आया है जब राज्य में SIR प्रक्रिया को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं।
बिहार में यह विशेष पुनरीक्षण अभियान 24 जून से शुरू किया गया है। चुनाव आयोग (ECI) के अनुसार, इस प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची को अपडेट करने के लिए 11 प्रकार के दस्तावेजों को वैध माना गया है। इन दस्तावेजों में निम्नलिखित शामिल हैं:
- किसी नियमित कर्मचारी या पेंशनभोगी को जारी कोई पहचान पत्र या पेंशन भुगतान आदेश,
- 1 जुलाई 1987 से पहले भारत में जारी कोई भी पहचान पत्र/प्रमाणपत्र,
- जन्म प्रमाणपत्र,
- पासपोर्ट,
- मैट्रिकुलेशन या अन्य शैक्षणिक प्रमाणपत्र,
- स्थायी निवास प्रमाणपत्र,
- ओबीसी/एससी/एसटी या कोई जाति प्रमाणपत्र,
- राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC),
- पारिवारिक रजिस्टर,
- सरकार द्वारा जारी कोई भी भूमि/घर आवंटन प्रमाणपत्र,
- कोई अन्य स्वीकार्य दस्तावेज जो पात्रता को साबित करे।
लेकिन इन दस्तावेजों की सूची में आधार कार्ड और EPIC का स्पष्ट रूप से उल्लेख नहीं किया गया है, जिसके चलते मतदाताओं और सामाजिक संगठनों ने चिंता जताई है।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: आधार और EPIC की वैधता
सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने यह टिप्पणी की कि जबकि राशन कार्डों में फर्जीवाड़े की संभावना हो सकती है, आधार और EPIC कार्डों में स्वाभाविक प्रामाणिकता होती है और इन्हें पहचान पत्र के रूप में मान्यता मिलनी चाहिए। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग द्वारा दाखिल जवाबी हलफनामे में भी इन दस्तावेजों की स्वीकार्यता को स्वीकार किया गया है।
अंतिम सुनवाई और अंतरिम राहत पर रुख
इस मामले में याचिकाकर्ता एनजीओ की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया कि मतदाता सूची को अंतिम रूप देने और ड्राफ्ट रोल प्रकाशित करने की प्रक्रिया को फिलहाल रोक दिया जाए। लेकिन कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने पहले किसी अंतरिम राहत की मांग नहीं की थी, इसलिए अब इसे प्रदान नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि 29 जुलाई को इस मामले की अंतिम सुनवाई होगी, जहां पूरे मुद्दे पर विस्तृत रूप से बहस होगी।
चुनाव आयोग का दावा और चुनौती
चुनाव आयोग के अनुसार, इस विशेष पुनरीक्षण प्रक्रिया में बिहार के कुल 7.89 करोड़ मतदाताओं में से 7.24 करोड़ ने भाग लिया है, जो कि लगभग 92% की भागीदारी दर को दर्शाता है। लेकिन इस आंकड़े को लेकर कई विरोधाभासी रिपोर्टें सामने आई हैं।
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) और अन्य याचिकाकर्ताओं ने दावा किया है कि यह आंकड़ा भ्रामक है और इसमें भारी गड़बड़ी हुई है। उनकी रिपोर्टों के अनुसार:
- बूथ लेवल ऑफिसर्स (BLOs) ने मतदाताओं की सहमति के बिना बड़ी संख्या में नामांकन फॉर्म ऑनलाइन अपलोड किए,
- मृत व्यक्तियों को भी फॉर्म भरने वाला दिखाया गया,
- कई क्षेत्रों में एक ही BLO ने 2,000 से अधिक फॉर्म अपलोड कर दिए,
- कई मतदाताओं को यह तक पता नहीं कि उनके नाम सूची में हैं या नहीं।
इन दावों से SIR प्रक्रिया की पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगे हैं। इससे पहले भी बिहार में मतदाता सूची से नाम गायब होने की शिकायतें आती रही हैं। अब इन आरोपों ने राज्य की चुनावी प्रक्रिया पर गंभीर संदेह खड़ा कर दिया है।
चुनाव आयोग का बचाव: “स्पीकिंग ऑर्डर” और अपील प्रक्रिया
चुनाव आयोग ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि किसी भी मतदाता का नाम सूची से बिना पूर्व सूचना और उचित आदेश के नहीं हटाया जाएगा। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि:
- 1 अगस्त को ड्राफ्ट वोटर लिस्ट प्रकाशित की जाएगी,
- इसके बाद 1 सितंबर तक कोई भी मतदाता या राजनीतिक दल अपनी आपत्ति या दावा प्रस्तुत कर सकता है,
- किसी नाम को हटाने से पहले संबंधित व्यक्ति को नोटिस भेजा जाएगा,
- अंतिम निर्णय तक व्यक्ति को अपनी बात रखने का पूरा मौका मिलेगा,
- यदि किसी को BLO या ERO के निर्णय पर आपत्ति हो तो वह जिला मजिस्ट्रेट या राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) के पास अपील कर सकता है।
यह प्रक्रिया चुनावी पारदर्शिता को सुनिश्चित करने के लिए जरूरी है, लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या वास्तविकता में इस पर अमल हो रहा है?
आधार कार्ड की भूमिका: पहचान बनाम अधिकार
यह मुद्दा केवल दस्तावेजों की सूची का नहीं है, बल्कि इससे मतदाता के लोकतांत्रिक अधिकारों का भी सीधा संबंध है। आधार कार्ड को भारत में नागरिक पहचान का सबसे व्यापक दस्तावेज माना जाता है। सुप्रीम कोर्ट भी पहले अपने विभिन्न आदेशों में यह स्पष्ट कर चुका है कि आधार एक प्रामाणिक और सुरक्षित पहचान दस्तावेज है, हालांकि इसे मतदान के लिए अनिवार्य नहीं बनाया जा सकता।
लेकिन जब कोई व्यक्ति अपनी पहचान साबित करने के लिए आधार कार्ड प्रस्तुत करता है, और फिर भी उसे अस्वीकार किया जाता है, तो यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया में बाधा बनता है। यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर इस मुद्दे पर चुनाव आयोग को स्पष्टता प्रदान करने के लिए कहा है।
डिजिटल अपलोड और ब्लॉक स्तर पर समस्या
ADR द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों और मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, SIR प्रक्रिया में तकनीकी और प्रशासनिक स्तर पर कई गड़बड़ियां सामने आई हैं:
- कई BLOs ने ग्रामीण क्षेत्रों में बिना किसी जनसंवाद के स्वयं ही फॉर्म भर दिए,
- डिजिटल साक्षरता की कमी और नेटवर्क की अनुपलब्धता के कारण कई वास्तविक मतदाता पीछे छूट गए,
- BLOs को टारगेट पूरा करने का दबाव था, जिसके चलते उन्होंने बिना प्रमाण या सहमति के फॉर्म अपलोड कर दिए,
- इसमें से कई फॉर्म ऐसे व्यक्तियों के थे जो या तो मृत थे या बिहार में ही नहीं रहते।
यह प्रक्रिया यदि बिना निगरानी और पारदर्शिता के होती है तो यह चुनावी लोकतंत्र को ही कमजोर करती है।
बिहार के लिए इसके निहितार्थ
बिहार जैसे राज्य में, जहां जातीय समीकरण, माइग्रेशन और डेमोग्राफिक बदलाव चुनाव परिणामों पर सीधा प्रभाव डालते हैं, वहां मतदाता सूची की शुद्धता अत्यंत आवश्यक है। यदि लाखों वास्तविक मतदाता सिर्फ दस्तावेजों की अस्पष्टता या BLOs की लापरवाही के कारण मताधिकार से वंचित हो जाते हैं, तो यह सिर्फ चुनावी गड़बड़ी नहीं बल्कि एक लोकतांत्रिक अपराध बन जाता है।
इस पृष्ठभूमि में आधार और EPIC जैसे दस्तावेजों को अनिवार्य रूप से मान्यता देना ही उचित विकल्प लगता है, ताकि कोई भी पात्र व्यक्ति मतदान से वंचित न हो।
राजनीतिक प्रतिक्रिया
राजनीतिक दलों ने भी इस मुद्दे को गंभीरता से उठाया है। विपक्षी दलों ने आरोप लगाया है कि SIR के जरिए कुछ वर्गों को योजनाबद्ध तरीके से मतदाता सूची से हटाया जा रहा है।
कांग्रेस और RJD जैसे दलों ने चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने कहा है कि जातिगत और वर्गीय संतुलन को प्रभावित करने के लिए यह प्रक्रिया चुपचाप संचालित की जा रही है। वहीं सत्तारूढ़ दलों ने इसे सुधारात्मक प्रक्रिया बताया है।
निष्कर्ष
बिहार में चल रही SIR प्रक्रिया फिलहाल एक संवेदनशील मोड़ पर खड़ी है। सुप्रीम कोर्ट की सक्रियता और हस्तक्षेप लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत है। चुनाव आयोग को यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई भी मतदाता सिर्फ तकनीकी कारणों या BLO स्तर की गलतियों के चलते अपने मताधिकार से वंचित न हो।
आधार कार्ड और EPIC को वैध दस्तावेज मानना और पारदर्शी प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची को अपडेट करना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता बन चुकी है।
29 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई इस पूरे मामले की दिशा तय कर सकती है। तब तक यह देखना होगा कि चुनाव आयोग अपने ही हलफनामे के अनुरूप आधार और EPIC को दस्तावेजों की सूची में औपचारिक रूप से शामिल करता है या नहीं।















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