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कांवड़ यात्रा मार्ग पर ढाबों में QR कोड अनिवार्यता पर सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप: धार्मिक प्रोफाइलिंग बनाम सुरक्षा व्यवस्था का विवाद

Supreme Court's intervention on mandatory QR code at dhabas on Kanwar Yatra route: Religious profiling vs security dispute

भूमिका: QR कोड आदेश पर सुप्रीम कोर्ट की नई टिप्पणी

कांवड़ यात्रा के दौरान उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा ढाबों और खानपान की दुकानों पर QR कोड लगाने का निर्देश अब सुप्रीम कोर्ट के रडार पर है। मंगलवार, 15 जुलाई 2025 को शीर्ष अदालत ने इस मसले पर राज्य सरकार को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। यह मामला केवल तकनीकी निर्देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे जुड़े संवैधानिक अधिकारों, धार्मिक स्वतंत्रता और निजता के प्रश्न भी चर्चा में आ गए हैं।

दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अपूर्वानंद झा और सामाजिक कार्यकर्ता आकार पटेल द्वारा दाखिल याचिका में आरोप लगाया गया है कि यह निर्देश सुप्रीम कोर्ट के जुलाई 2023 के एक पूर्व आदेश का स्पष्ट उल्लंघन है और इस बार “डिजिटल धार्मिक प्रोफाइलिंग” के रूप में सामने आया है।


1. क्या है पूरा मामला?

उत्तर प्रदेश सरकार ने कांवड़ यात्रा मार्ग पर स्थित सभी ढाबों और खाद्य विक्रेताओं को एक निर्देश जारी किया है, जिसमें कहा गया है कि उन्हें अपने प्रतिष्ठान पर एक QR कोड प्रदर्शित करना होगा। इस कोड को स्कैन करने पर दुकान के मालिक और स्टाफ से जुड़ी जानकारी प्राप्त होगी।

सरकार का तर्क है कि यह व्यवस्था सुरक्षा के लिहाज से आवश्यक है ताकि किसी आपात स्थिति में प्रशासन को यह पता चल सके कि दुकान किसकी है और वहां कौन काम कर रहा है। लेकिन याचिकाकर्ताओं का मानना है कि यह कदम धार्मिक आधार पर व्यवसायियों को निशाना बनाने का एक तरीका है — खासकर तब, जब यह निर्देश केवल कांवड़ यात्रा मार्ग पर ही लागू हो रहा है।


2. याचिकाकर्ताओं की दलील: यह है डिजिटल धार्मिक प्रोफाइलिंग

अपूर्वानंद और आकार पटेल की याचिका में कहा गया है कि QR कोड लगाने की यह अनिवार्यता दरअसल सुप्रीम कोर्ट के 2023 के उस आदेश का “जानबूझकर उल्लंघन” है, जिसमें कहा गया था कि किसी भी विक्रेता या दुकानदार से उनकी पहचान या धर्म बताने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

मुख्य तर्क:

  • निजता का उल्लंघन: QR कोड स्कैन करते ही जो जानकारी मिलती है वह व्यक्ति की पहचान, धर्म और व्यवसायिक पृष्ठभूमि उजागर करती है।
  • धार्मिक प्रोफाइलिंग: केवल कांवड़ यात्रा मार्ग पर इस तरह के निर्देश लागू करने से यह संकेत जाता है कि प्रशासन एक खास धार्मिक समुदाय के व्यापारियों को निशाना बना रहा है।
  • पूर्व आदेश की अवहेलना: सुप्रीम कोर्ट ने पहले स्पष्ट किया था कि किसी भी दुकानदार से केवल यह पूछा जा सकता है कि वह किस प्रकार का भोजन बेच रहा है (शाकाहारी या मांसाहारी), न कि उसकी व्यक्तिगत जानकारी।

3. जुलाई 2023 का सुप्रीम कोर्ट का फैसला: पृष्ठभूमि समझना जरूरी

पिछले वर्ष जुलाई में, सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड सरकारों के उस आदेश पर अंतरिम रोक लगाई थी, जिसमें विक्रेताओं को अपने नाम और स्टाफ की सूची सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करने के लिए बाध्य किया गया था। कोर्ट ने तब कहा था:

“हम यह उपयुक्त समझते हैं कि संबंधित आदेशों को लागू करने पर अंतरिम रूप से रोक लगाई जाए। विक्रेताओं से केवल यह पूछा जा सकता है कि वह किस तरह का भोजन बेच रहे हैं — यह नहीं कि वे कौन हैं।”

इस आदेश का मूल भाव यही था कि किसी भी व्यवसायी से उसकी पहचान या धार्मिक पृष्ठभूमि जानना अनिवार्य नहीं बनाया जा सकता।


4. सरकार का पक्ष: सुरक्षा बनाम निजता

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने अभी तक उत्तर प्रदेश सरकार से जवाब नहीं मांगा है, लेकिन प्रशासनिक सूत्रों का कहना है कि QR कोड का मकसद केवल ‘सुरक्षा और पहचान सत्यापन’ है। पिछले कुछ वर्षों में कांवड़ यात्रा के दौरान कई बार ऐसे मामले सामने आए हैं जिनमें स्थानीय ढाबों पर अस्थायी रूप से दुकानें खोलकर कुछ असामाजिक तत्वों ने गड़बड़ी करने की कोशिश की।

सरकार का अनुमान है कि:

  • QR कोड से पता चलेगा: दुकान स्थायी है या अस्थायी।
  • सुरक्षा बलों को मदद: यदि कोई घटना होती है, तो संबंधित व्यक्तियों की जानकारी तुरंत हासिल की जा सकेगी।
  • पारदर्शिता: व्यापारियों के बीच स्पष्टता बनी रहेगी।

लेकिन यहीं पर सवाल उठता है — क्या इस उद्देश्य के लिए निजता और धार्मिक स्वतंत्रता की अनदेखी की जा सकती है?


5. संवैधानिक प्रश्न: क्या यह आदेश मौलिक अधिकारों का हनन है?

भारत के संविधान में व्यक्तियों को कुछ बुनियादी अधिकार दिए गए हैं, जिनमें अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 19 (अभिव्यक्ति और व्यवसाय की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता) शामिल हैं। याचिकाकर्ता यही दावा कर रहे हैं कि QR कोड अनिवार्यता इन सभी अधिकारों का उल्लंघन करती है।

विशेषकर अनुच्छेद 21 के तहत ‘निजता का अधिकार’ एक मौलिक अधिकार है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 2017 के के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत सरकार फैसले में स्पष्ट किया था। यदि QR कोड से कोई ग्राहक एक विक्रेता की पहचान और धार्मिक पृष्ठभूमि जान सकता है, तो यह ‘अनुचित निगरानी’ (unreasonable surveillance) माना जा सकता है।


6. सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव: खतरनाक प्रवृत्ति की शुरुआत?

यह आदेश केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक संदेश भी देता है। यदि इसे लागू किया गया, तो भविष्य में यह अन्य धार्मिक आयोजनों और स्थानों पर भी दोहराया जा सकता है — जिससे अल्पसंख्यकों में असुरक्षा की भावना और अधिक गहराएगी।

कुछ विशेषज्ञों की राय:

  • प्रोफेसर हिलाल अहमद (सीएसडीएस): “QR कोड भले तकनीकी साधन हो, लेकिन इसका उपयोग जिस ढंग से हो रहा है, वह समाज में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को बढ़ा सकता है।”
  • वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह: “सुरक्षा के नाम पर धार्मिक पहचान सार्वजनिक कर देना लोकतंत्र के बुनियादी सिद्धांतों के खिलाफ है।”

7. मीडिया रिपोर्ट्स और ग्राउंड रियलिटी

मीडिया में आई कुछ रिपोर्टों के अनुसार, कई स्थानों पर QR कोड स्कैन करने पर उस दुकान के मालिक का नाम, पिता का नाम, आधार विवरण, लाइसेंस नंबर और मोबाइल नंबर तक उपलब्ध हो जाता है। इससे न केवल निजता प्रभावित होती है, बल्कि टारगेटिंग का खतरा भी उत्पन्न होता है।

वर्तमान राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में यह कदम संवेदनशील माना जा रहा है क्योंकि उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में धार्मिक आयोजनों के दौरान पहले से ही तनावपूर्ण वातावरण देखा जाता रहा है।


8. सुप्रीम कोर्ट की प्रतिक्रिया और आगे की राह

सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाओं पर संज्ञान लेते हुए उत्तर प्रदेश सरकार से जवाब मांगा है। अदालत का यह रुख इस ओर संकेत करता है कि वह इस मसले को केवल प्रशासनिक सुविधा के रूप में नहीं देख रही, बल्कि यह एक संवैधानिक और नैतिक प्रश्न है।

अब देखने की बात होगी कि:

  • क्या अदालत सरकार को इस आदेश को तत्काल प्रभाव से वापस लेने को कहेगी?
  • क्या यह मामला विस्तारित पीठ के सामने जाएगा ताकि निजता और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़ी व्यापक व्याख्या हो सके?

9. निष्कर्ष: तकनीक बनाम संवैधानिक मूल्य

QR कोड जैसी तकनीक को प्रशासनिक पारदर्शिता और सुरक्षा के लिए प्रयोग किया जा सकता है, लेकिन जब इसे सीमित धार्मिक आयोजनों और विशिष्ट मार्गों तक लागू किया जाता है, तब यह कई संवैधानिक और सामाजिक प्रश्न खड़े करता है।

भारत एक धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र है, जहां सरकार की जिम्मेदारी है कि वह सभी नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करे। यदि प्रशासनिक कदम अल्पसंख्यकों के प्रति भेदभावपूर्ण संदेश देते हैं, तो वे केवल संवैधानिक मूल्यों का उल्लंघन नहीं करते, बल्कि सामाजिक एकता को भी खतरे में डालते हैं।


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