हरियाणा सरकार ने हाल ही में भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सुभाष बराला के बेटे विकास बराला को असिस्टेंट एडवोकेट जनरल नियुक्त किया है। लेकिन यह नियुक्ति अब ज़बरदस्त विवादों में घिर गई है। वजह है विकास बराला पर लगे स्टॉकिंग और अपहरण की कोशिश जैसे गंभीर आरोप, जिसकी गूंज साल 2017 में पूरे देश में सुनाई दी थी।
इस नियुक्ति ने न सिर्फ विपक्ष को हमलावर बना दिया है, बल्कि महिला सुरक्षा, कानून व्यवस्था और नैतिकता के सवालों को भी एक बार फिर केंद्र में ला दिया है।
2017 की वह काली रात: जब देश ने जाना विकास बराला का नाम
विकास बराला का नाम 2017 में तब सुर्खियों में आया जब उस पर आईएएस अफसर की बेटी वर्णिका कुंडू का पीछा करने और अपहरण की कोशिश का आरोप लगा।
घटना 4 अगस्त 2017 की रात की है। वर्णिका ने आरोप लगाया था कि वह अपने घर चंडीगढ़ लौट रही थीं, तभी दो युवकों ने — जिनमें एक विकास बराला था — उसकी कार का पीछा किया, रोकने की कोशिश की, और बार-बार कार से उतर कर उसे डराने की कोशिश की। दोनों युवक नशे की हालत में थे।
वर्णिका ने हिम्मत दिखाते हुए न सिर्फ पुलिस को कॉल किया, बल्कि समय रहते खुद को बचाया और मामले को सार्वजनिक कर दिया। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए चंडीगढ़ पुलिस ने एफआईआर दर्ज की और बाद में विकास बराला को गिरफ़्तार किया गया।
क्या-क्या धाराएं लगी थीं विकास बराला पर?
विकास बराला पर भारतीय दंड संहिता (IPC) की जिन धाराओं के तहत मामला दर्ज हुआ, वे इस प्रकार थीं:
- धारा 354-D: पीछा करना (Stalking)
- धारा 365: अपहरण की कोशिश
- धारा 511: अपराध करने का प्रयास
- धारा 341: गलत तरीके से रास्ता रोकना
- धारा 34: साझा आपराधिक इरादा
इन धाराओं में से कई गंभीर गैर-जमानती अपराध की श्रेणी में आती हैं।
गिरफ्तारी और जेल यात्रा
विकास बराला और उसके मित्र आशीष कुमार को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया। विकास करीब 5 महीने तक जेल में रहा। हालांकि, बाद में उसे ज़मानत मिल गई। केस की सुनवाई अदालत में कई साल चली।
पीड़िता ने क्या कहा था?
वर्णिका कुंडू ने पूरी बहादुरी के साथ मामले को अंत तक लड़ा। उन्होंने कहा था, “मैं डरकर चुप नहीं बैठने वाली। अगर मैं चुप रह गई तो कल कोई और लड़की शिकार बन सकती है। मैं इस केस को आखिरी सांस तक लड़ूंगी।”
उनके इस स्टैंड की व्यापक सराहना हुई थी। महिला संगठनों, सिविल सोसाइटी और सोशल मीडिया ने वर्णिका का खुलकर समर्थन किया।
अब क्यों उठ रहा है बवाल?
अब जबकि हरियाणा सरकार ने विकास बराला को असिस्टेंट एडवोकेट जनरल नियुक्त किया है — जो राज्य सरकार का एक संवैधानिक और कानूनी पद होता है — तो सवाल उठ रहे हैं:
- क्या ऐसे व्यक्ति को जो महिलाओं के प्रति अपराधों में आरोपी रहा है, कानून की रक्षा की जिम्मेदारी दी जा सकती है?
- क्या यह महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान के साथ अन्याय नहीं है?
- क्या सरकार संदेश दे रही है कि गंभीर आरोपों का कोई असर नहीं?
विपक्ष का हमला
विकास बराला की नियुक्ति पर कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, और महिला संगठनों ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। कांग्रेस प्रवक्ता ने कहा, “एक ऐसा व्यक्ति जिसे स्टॉकिंग और अपहरण की कोशिश जैसे अपराध में जेल हो चुकी है, उसे एडवोकेट जनरल बनाना शर्मनाक है। यह महिलाओं की गरिमा के खिलाफ है।”
आम आदमी पार्टी ने भी ट्वीट किया:
“ये है भाजपा का ‘बेटी बचाओ’? महिलाओं का पीछा करने वाला अब सरकार का वकील है। वाह रे न्याय।”
सरकार का बचाव: “कोर्ट से बरी हुआ, अब दोषी नहीं”
विकास बराला की नियुक्ति पर सफाई देते हुए हरियाणा सरकार के प्रवक्ता ने कहा है, “विकास बराला को कोर्ट से राहत मिल चुकी है। वह अब दोषी नहीं हैं, इसलिए उनके कानूनी करियर में कोई रुकावट नहीं होनी चाहिए।”
हालांकि सरकार ने अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया है कि क्या नियुक्ति से पहले पृष्ठभूमि की जांच (background verification) की गई थी या नहीं।
हाई कोर्ट का फैसला क्या था?
यह ध्यान देने योग्य है कि इस मामले में अभी तक कोई अंतिम सज़ा नहीं हुई है। विकास बराला को ज़मानत मिल चुकी है और केस कई वर्षों से चलता रहा है। हालांकि मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार वर्णिका कुंडू ने अदालत में गवाही दी थी और मुकदमा कमजोर नहीं था।
कुछ रिपोर्ट्स में यह भी आया कि प्रेसर और राजनीतिक प्रभाव के कारण जांच कमजोर हुई, गवाहों पर दबाव पड़ा और केस लंबा खिंचता चला गया।
असिस्टेंट एडवोकेट जनरल का क्या काम होता है?
‘असिस्टेंट एडवोकेट जनरल’ किसी भी राज्य सरकार की कानूनी टीम का हिस्सा होता है, जो:
- सरकार की ओर से कोर्ट में दलील देता है
- सरकारी नीतियों का बचाव करता है
- कानूनी सलाह देता है
यानी, यह पद सिर्फ एक वकील का नहीं बल्कि सरकार का प्रतिनिधित्व करने का होता है। ऐसे में सवाल उठता है — क्या एक पूर्व आरोपी, जिस पर महिलाओं से जुड़े अपराध के संगीन आरोप लगे हों, इस पद के योग्य है?
कानून और नैतिकता का द्वंद्व
तकनीकी रूप से देखा जाए, तो जब तक किसी व्यक्ति को दोषी सिद्ध न किया जाए, वह निर्दोष माना जाता है। लेकिन, नैतिकता और सार्वजनिक सेवा के मानदंडों की भी एक अहम भूमिका होती है।
भारत में जनसेवकों और सरकारी पदों पर नियुक्तियों के लिए केवल तकनीकी योग्यता नहीं, बल्कि नैतिक छवि और सामाजिक संदेश भी मायने रखता है। यही वजह है कि जब-जब किसी दागी नेता या अफसर की नियुक्ति होती है, जनता और विपक्ष सवाल खड़ा करता है।
सोशल मीडिया पर लोगों की प्रतिक्रिया
विकास बराला की नियुक्ति ने सोशल मीडिया पर भी हलचल मचा दी है। कुछ प्रतिक्रियाएं:
- “महिलाओं की सुरक्षा की बात करने वाली सरकार अब उन्हीं पर अत्याचार करने वालों को प्रमोट कर रही है।”
- “क्या अब अपराधी ही कानून की रक्षा करेंगे?”
- “ये तो न्याय प्रणाली का मज़ाक है।”
यह सिर्फ एक नियुक्ति नहीं, एक संदेश है
विकास बराला को असिस्टेंट एडवोकेट जनरल बनाने का मामला सिर्फ एक नियुक्ति का नहीं है — यह इस बात का प्रतीक बन गया है कि हमारी व्यवस्था में नैतिकता और जवाबदेही कितनी महत्वपूर्ण हैं। यह सवाल भी खड़ा करता है कि क्या सत्ता में होना ही सब कुछ है?
क्या सत्ता में बैठे लोग अपने ‘प्रियजनों’ को संवैधानिक पदों पर बैठाकर जन विश्वास और न्याय प्रणाली का मज़ाक नहीं उड़ा रहे?
निष्कर्ष
- विकास बराला पर लगे आरोप भले ही कानूनी प्रक्रिया से बाहर निकल आए हों, लेकिन समाज में उनकी छवि पर आज भी प्रश्नचिह्न हैं।
- महिला सुरक्षा जैसे गंभीर मुद्दे पर सरकार को ज़्यादा संवेदनशीलता दिखानी चाहिए थी।
- असिस्टेंट एडवोकेट जनरल जैसे अहम पद पर नियुक्ति सिर्फ योग्यता नहीं, सार्वजनिक आचरण और चरित्र पर भी आधारित होनी चाहिए।
जब तक सत्ता, नैतिकता और न्याय के बीच संतुलन नहीं बनेगा — ऐसी नियुक्तियां जनता की नज़र में सिर्फ ‘इनसाफ के खिलाफ साजिश’ लगेंगी।















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