भूमिका
22 जुलाई 2025, मंगलवार को संसद के मानसून सत्र का दूसरा दिन राजनीतिक बवंडर की भेंट चढ़ गया। लोकसभा और राज्यसभा – दोनों सदनों में विपक्ष के भारी विरोध के चलते कार्यवाही बार-बार स्थगित होती रही और अंततः पूरे दिन के लिए स्थगित कर दी गई। केंद्र में मुद्दा था: बिहार में चुनाव आयोग द्वारा की जा रही ‘स्पेशल इंटेंसिव रिविजन’ (SIR) यानी मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण।
विपक्षी सांसदों ने इसे “लोकतंत्र की हत्या”, “भारतीय मताधिकार की चोरी”, और “चुनावों में धांधली की तैयारी” करार दिया। संसद के भीतर और बाहर जोरदार विरोध प्रदर्शन हुआ। विपक्ष ने सरकार पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह विशेष पुनरीक्षण प्रक्रिया केवल बिहार तक क्यों सीमित है, और इसके पीछे सत्ताधारी दल की नीयत क्या है।
संसद में क्या हुआ?
लोकसभा में घटनाक्रम
- सुबह 11 बजे लोकसभा की कार्यवाही शुरू होते ही विपक्षी सांसदों ने नारेबाज़ी शुरू कर दी।
- लोकसभा अध्यक्ष ने व्यवस्था बनाने की कोशिश की, लेकिन हंगामा नहीं थमा।
- पहली बार कार्यवाही दोपहर 12 बजे तक स्थगित कर दी गई।
- जब 12 बजे कार्यवाही फिर शुरू हुई, तो विपक्षी सदस्य फिर से वेल में आ गए और SIR को लेकर नारेबाज़ी करने लगे।
- नतीजतन, लोकसभा को दोबारा 2 बजे तक स्थगित किया गया।
- लेकिन दोपहर बाद भी माहौल नहीं बदला, और आखिरकार कार्यवाही 23 जुलाई तक स्थगित कर दी गई।
राज्यसभा में क्या हुआ?
- राज्यसभा में भी सुबह से ही विपक्षी सांसदों ने जोरदार विरोध दर्ज किया।
- प्रश्नकाल के दौरान समाजवादी पार्टी के सांसद घनश्याम तिवारी ने एक और अहम घोषणा की: “गृह मंत्रालय की अधिसूचना के अनुसार, उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने संविधान के अनुच्छेद 67(a) के तहत तत्काल प्रभाव से इस्तीफा दे दिया है।”
- इस घोषणा के बावजूद विपक्ष ने हंगामा जारी रखा। उनकी मुख्य मांग थी – बिहार में SIR पर विस्तृत चर्चा।
- आखिर में राज्यसभा की कार्यवाही भी अगले दिन तक स्थगित कर दी गई।
संसद के बाहर: विपक्ष की एकजुटता
संसद के अंदर के घटनाक्रम जितने गरम थे, संसद भवन के बाहर भी उतनी ही राजनीतिक तपिश नजर आई।
- मकर द्वार (संसद का प्रवेश द्वार) पर राहुल गांधी, अखिलेश यादव, टीएमसी सांसद डेरेक ओ’ब्रायन, डीएमके नेता कनिमोझी और अन्य विपक्षी सांसद एक साथ खड़े हुए।
- सभी ने पोस्टर और तख्तियां थामी हुई थीं जिन पर लिखा था:
- “Death of Democracy”
- “Stealing of Indian Rights”
- “Stop SIR in Bihar”
विपक्ष ने स्पष्ट रूप से कहा कि जब तक बिहार SIR की वैधता पर चर्चा नहीं होती, वे संसद नहीं चलने देंगे।
बिहार SIR: आखिर क्या है विवाद?
स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) दरअसल, मतदाता सूची का एक विशेष और गहन पुनरीक्षण होता है, जिसे चुनाव आयोग समय-समय पर कराता है।
लेकिन बिहार में चल रही यह प्रक्रिया इसलिए विवादों में है क्योंकि:
- यह अन्य राज्यों के बजाय केवल बिहार में हो रही है।
- जुलाई के महीने में इस प्रक्रिया का आदेश आया, जब राज्य में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं।
- विपक्ष का आरोप है कि यह पुनरीक्षण भाजपा के इशारे पर हो रहा है, ताकि विपक्षी वोटरों के नाम हटाए जा सकें।
विपक्षी दलों ने इस प्रक्रिया को संविधान की भावना के खिलाफ और लोकतंत्र के मूलभूत सिद्धांतों पर हमला बताया है।
केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया
केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरन रिजिजू ने विपक्ष पर पलटवार करते हुए कहा:
“सरकार चर्चा के लिए तैयार है, लेकिन विपक्ष सिर्फ़ हंगामा कर रहा है और जनता के पैसे की बर्बादी कर रहा है।”
उन्होंने कहा कि विपक्ष संसद को बार-बार बाधित करके लोकतंत्र की ही गरिमा गिरा रहा है।
SIR पर विपक्ष के तर्क
- चयनात्मक प्रक्रिया – अगर मतदाता सूची का पुनरीक्षण जरूरी था, तो सिर्फ बिहार क्यों? क्या यह चुनावी दृष्टि से किया जा रहा है?
- दस्तावेज़ों की वैधता पर संदेह – विपक्ष का आरोप है कि कई योग्य मतदाताओं के नाम मनमाने तरीके से हटाए जा रहे हैं।
- राजनीतिक हस्तक्षेप – INDIA गठबंधन ने यह भी आरोप लगाया कि भाजपा नेताओं और प्रशासनिक अफसरों के बीच इस प्रक्रिया को प्रभावित करने की बातचीत हुई है।
- राज्य सरकार की असहमति – बिहार सरकार ने चुनाव आयोग को पत्र लिखकर SIR की टाइमिंग और पद्धति पर आपत्ति दर्ज कराई थी।
INDIA गठबंधन की रणनीति
‘INDIA’ (Indian National Developmental Inclusive Alliance) गठबंधन ने यह साफ कर दिया है कि वे इस सत्र को SIR पर बहस के बिना नहीं चलने देंगे।
- विपक्षी दलों की एक साझा बैठक बुलाई गई है जिसमें सत्र को अवरुद्ध करने की आगे की रणनीति तय की जाएगी।
- संयुक्त बयान जारी किया जाएगा जिसमें SIR को “असंवैधानिक” और “सत्ताधारी दल की चाल” बताया जाएगा।
- कई विपक्षी सांसद चुनाव आयोग के खिलाफ प्रदर्शन करने की योजना भी बना रहे हैं।
राजनीतिक निहितार्थ: बिहार चुनाव और जातीय समीकरण
बिहार में साल के अंत तक विधानसभा चुनाव संभावित हैं। वहां की राजनीति में जातीय समीकरण, वोट बैंक और मुस्लिम-दलित-पिछड़ा समीकरण की अहम भूमिका होती है।
- विपक्ष को आशंका है कि SIR के जरिए ओबीसी और मुस्लिम वोटरों को टारगेट किया जा रहा है।
- भाजपा पर EWS और सवर्ण वोट बैंक को प्राथमिकता देने का आरोप लग रहा है।
- अगर विपक्ष के दावे सही साबित होते हैं, तो यह मामला राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है।
चुनाव आयोग की स्थिति
अब तक चुनाव आयोग ने केवल यह कहा है कि:
“SIR एक नियमित प्रक्रिया है और इसे कानून के तहत कराया जा रहा है। इससे किसी वर्ग विशेष को नुकसान नहीं होगा।”
लेकिन आयोग पर पहले भी कई बार सत्ताधारी दल के पक्ष में झुकाव के आरोप लगते रहे हैं, जिससे उसकी निष्पक्षता सवालों के घेरे में आ जाती है।
जगदीप धनखड़ का इस्तीफा: समांतर झटका
उसी दिन संसद में एक और बड़ी खबर ने हलचल मचा दी – उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने तत्काल प्रभाव से इस्तीफा दे दिया।
- घनश्याम तिवारी ने राज्यसभा में इस इस्तीफे की घोषणा की।
- हालांकि धनखड़ ने स्वास्थ्य कारण बताए, लेकिन राजनीतिक गलियारों में कई और अटकलें भी तैर रही हैं।
इस इस्तीफे की टाइमिंग ने विपक्ष को और बल दिया कि सरकार के अंदर कुछ बड़ा असंतोष चल रहा है।
विपक्ष को क्या मिला इस हंगामे से?
- मीडिया और जनता का ध्यान केंद्रित किया गया – SIR अब राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बन चुका है।
- INDIA गठबंधन की एकजुटता को दिखाया गया – राहुल गांधी और अखिलेश यादव जैसे नेता एक मंच पर आए।
- लोकसभा-राज्यसभा को ठप करके सरकार पर दबाव बनाया गया।
भविष्य की राह: क्या हो सकता है आगे?
- चुनाव आयोग को जवाब देना होगा – अगर आयोग SIR पर पारदर्शिता नहीं दिखाता, तो उसकी साख को गहरी चोट लग सकती है।
- संसद का कामकाज बाधित रहेगा – जब तक SIR पर बहस नहीं होती, विपक्ष पीछे हटने को तैयार नहीं है।
- सुप्रीम कोर्ट में याचिका संभव – विपक्ष SIR को चुनौती देने के लिए कोर्ट का रुख कर सकता है।
- राजनीतिक ध्रुवीकरण – भाजपा और INDIA गठबंधन के बीच का टकराव और तीखा हो सकता है।
निष्कर्ष
22 जुलाई 2025 का दिन भारतीय संसद और लोकतंत्र के इतिहास में एक यादगार दिन बन गया – जब बिहार की एक प्रशासनिक प्रक्रिया ने राष्ट्रीय स्तर पर सियासी तूफान खड़ा कर दिया।
लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही ठप हो गई, विपक्षी नेता सड़कों पर उतर आए, और उपराष्ट्रपति का इस्तीफा एक और रहस्य बन गया।
अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार और चुनाव आयोग इस संकट से कैसे निपटते हैं और विपक्ष अपने आंदोलन को कितना आगे ले जाता है। एक बात तो तय है – बिहार चुनाव अब केवल एक राज्य का चुनाव नहीं रहेगा, बल्कि यह भारत के लोकतंत्र की दिशा और ईमानदारी की परीक्षा बन चुका है।















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