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राज ठाकरे बनाम निशिकांत दुबे: हिंदी-मराठी विवाद की सियासी तकरार और भाषा राजनीति की बदलती ज़मीन

Raj Thackeray vs Nishikant Dubey: The political tussle of the Hindi-Marathi dispute and the changing ground of language politics

भूमिका

भाषा का सवाल जब राजनीति की ज़मीन पर आता है, तो वह केवल लिपि, व्याकरण या बोली तक सीमित नहीं रहता — वह पहचान, वर्चस्व और वोट बैंक से जुड़ जाता है। ऐसा ही कुछ इन दिनों महाराष्ट्र की राजनीति में हो रहा है, जहाँ एक बार फिर हिंदी बनाम मराठी की बहस ने सियासी पारा बढ़ा दिया है।

19 जुलाई 2025 को भाजपा सांसद निशिकांत दुबे और मनसे प्रमुख राज ठाकरे के बीच तीखी बयानबाज़ी सामने आई, जिसने न केवल भाषा के सवाल को हवा दी, बल्कि यह भी दिखाया कि कैसे भाषाई अस्मिता को राजनीतिक हथियार बनाया जा रहा है।


🔷 विवाद की शुरुआत: ‘पटक पटक कर मारेंगे’ बनाम ‘समंदर में डुबो डुबो कर मारेंगे’

सारा विवाद तब शुरू हुआ जब हाल ही में एक सभा में निशिकांत दुबे ने महाराष्ट्र में हिंदी विरोधी रवैये को लेकर राज ठाकरे पर निशाना साधते हुए कहा:

“हम तुम्हें पटक पटक कर मारेंगे!”

इस तीखे हमले का जवाब राज ठाकरे ने एक कार्यक्रम में दिया, जिसमें उन्होंने हिंदी में ही पलटवार करते हुए कहा:

“तुम मुंबई आओ… मुंबई के समंदर में डुबो डुबो कर मारेंगे!”

राज ठाकरे का यह बयान इस बात को लेकर भी चर्चा में रहा कि उन्होंने हिंदी में जवाब देकर खुद की ही स्थापित भाषा नीति से अलग रुख अपनाया।


🔷 निशिकांत दुबे का व्यंग्य: “मैंने राज ठाकरे को हिंदी सिखाई”

राज ठाकरे द्वारा दिए गए हिंदी वक्तव्य को लेकर भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर कटाक्ष करते हुए लिखा:

“मैंने राज ठाकरे को हिंदी सिखाई?”

इस एक पंक्ति में कई स्तरों पर व्यंग्य छिपा था — एक ओर यह राज ठाकरे की हिंदी विरोधी छवि पर हमला था, तो दूसरी ओर मराठी भाषिक अस्मिता की राजनीति में हिंदी को स्वीकारने के विरोधाभास की ओर इशारा।


🔷 राज ठाकरे और मराठी अस्मिता की राजनीति

राज ठाकरे मनसे (महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना) के संस्थापक हैं और लंबे समय से ‘मराठी मानूस’ की पहचान को लेकर राजनीति करते रहे हैं। उनके शुरुआती राजनीतिक करियर में उत्तर भारतीयों के खिलाफ अभियान, विशेषकर हिंदी भाषी लोगों के प्रति कड़ा रुख, अक्सर सुर्खियों में रहा है।

उन्होंने कई बार सार्वजनिक रूप से:

  • उत्तर भारतीयों को ‘बाहरी’ कहा
  • रेलवे परीक्षाओं में हिंदी भाषियों को प्राथमिकता मिलने पर विरोध किया
  • मुंबई में हिंदी बोलने वालों के खिलाफ मनसे कार्यकर्ताओं को उकसाया

ऐसे में उनका हालिया हिंदी बयान राजनीतिक द्वैधता की तरह देखा जा रहा है।


🔷 मराठी बनाम हिंदी: शिक्षा में तीसरी भाषा नीति और विवाद

इस पूरे विवाद के पीछे एक नीतिगत निर्णय भी छिपा है। महाराष्ट्र की भाजपा-शिवसेना सरकार ने हाल ही में स्कूलों में प्रथम कक्षा से तीसरी भाषा (हिंदी) लागू करने का प्रस्ताव रखा था।

इस पर राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे दोनों ने खुलकर विरोध जताया। बाद में सार्वजनिक विरोध और विपक्ष के दबाव के चलते सरकार को यह प्रस्ताव वापस लेना पड़ा

यहाँ सवाल यह है कि जब महाराष्ट्र जैसे बहुभाषी राज्य में हिंदी को तीसरी भाषा के रूप में लाने की बात होती है, तो यह किन-किन वर्गों में असंतोष और असुरक्षा की भावना जगाती है?


🔷 मनसे की रणनीति: भाषाई उग्रता से सियासी पुनर्जीवन

मनसे बीते कुछ वर्षों से राजनीतिक रूप से हाशिये पर चली गई थी। न नगर पालिका चुनावों में कोई खास प्रदर्शन, न विधानसभा में कोई उपस्थिति।

ऐसे में भाषा, क्षेत्रीय अस्मिता और आक्रामक बयानों के ज़रिए पार्टी फिर से चर्चा में आना चाहती है।

राज ठाकरे का उद्देश्य हो सकता है:

  • मराठी वोट बैंक को फिर से संगठित करना
  • भाजपा और शिंदे गुट पर दबाव बनाना
  • उद्धव ठाकरे से गठबंधन के ज़रिए 2029 लोकसभा चुनाव में सीटें निकालना

🔷 भाजपा की रणनीति: हिंदी बनाम क्षेत्रीय अस्मिता की बहस को साधना

भाजपा लंबे समय से खुद को राष्ट्रीय दल के रूप में प्रस्तुत करती रही है, जिसकी राजनीति हिंदी पट्टी से निकलकर दक्षिण और पश्चिम भारत तक फैली है। लेकिन क्षेत्रीय अस्मिता की राजनीति भाजपा के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकती है, खासकर जब यह सवाल भाषा से जुड़ा हो।

निशिकांत दुबे का बयान दो मकसद साधता है:

  1. हिंदी भाषी जनता को राजनीतिक-सांस्कृतिक रूप से सम्मानित करना
  2. राज ठाकरे जैसे नेताओं की भाषाई कट्टरता को हास्यास्पद और पाखंडी साबित करना

🔷 क्या राज ठाकरे का हिंदी में बोलना रणनीतिक था?

यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है — क्या राज ठाकरे ने जानबूझकर हिंदी में जवाब दिया?

विश्लेषकों का मानना है कि:

  • आज की युवा पीढ़ी चाहे मराठी हो या हिंदी भाषी, हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों बोलने में सहज है
  • राज ठाकरे का हिंदी में बोलना बड़े वर्ग तक अपनी बात पहुँचाने की रणनीति हो सकती है
  • यह उनके और उद्धव ठाकरे के भाजपा-विरोधी मोर्चे के राष्ट्रीयकरण का संकेत भी हो सकता है

🔷 मुंबई में हिंदी विरोध और हिंसा: मनसे की कार्यशैली पर सवाल

हाल ही में मनसे कार्यकर्ताओं द्वारा हिंदी बोलने वालों के साथ बदसलूकी की खबरें सामने आईं। एक वायरल ऑडियो क्लिप में राज ठाकरे ने कार्यकर्ताओं से कहा:

“अगर किसी को पीटना हो, तो वीडियो मत बनाना!”

यह बयान न केवल आपराधिक उकसावे जैसा था, बल्कि संवैधानिक अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सीधा प्रहार भी।


🔷 संविधान, भाषा और भारत की विविधता

भारतीय संविधान के अनुसार:

  • भारत की 22 अनुसूचित भाषाएं हैं
  • हिंदी को राजभाषा का दर्जा प्राप्त है, लेकिन कोई ‘राष्ट्रीय भाषा’ नहीं है
  • राज्यों को अपनी आधिकारिक भाषा चुनने की आज़ादी है
  • अनुच्छेद 19 और 29 नागरिकों को संस्कृति और भाषा को बनाए रखने का अधिकार देता है

इसका अर्थ यह है कि:

  • मराठी का संरक्षण जरूरी है, परंतु हिंदी भाषियों के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता
  • भारत में भाषा विविधता एकता की नींव है, न कि विभाजन का औजार

🔷 निष्कर्ष: क्या भाषा राजनीति का नया चुनावी हथियार है?

राज ठाकरे बनाम निशिकांत दुबे का यह नया विवाद कोई साधारण राजनीतिक बयानबाज़ी नहीं है — यह 2029 के लोकसभा चुनाव की पूर्व गूंज है।
जहाँ एक ओर राज ठाकरे क्षेत्रीय अस्मिता और मराठी गौरव की बात कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर निशिकांत दुबे जैसे नेता राष्ट्रीय पहचान, हिंदी और एकरूपता की बात कर रहे हैं।

लेकिन सवाल यह है:

  • क्या भाषा के नाम पर लोगों को लड़ाना या धमकाना राजनीतिक पुनर्जीवन का साधन होना चाहिए?
  • क्या हिंदी बोलने वालों को महाराष्ट्र में डर और असुरक्षा के साथ रहना चाहिए?
  • और क्या नेताओं को भाषाई कट्टरता को प्रोत्साहित करना चाहिए, या उसे कमज़ोर करना?

🔷 अंतिम बात

भाषा हमारी संस्कृति और अस्मिता का हिस्सा है, लेकिन जब यही भाषा राजनीतिक हथियार बन जाती है, तो समाज में दरारें पैदा होती हैं।

राज ठाकरे हों या निशिकांत दुबे — दोनों को चाहिए कि भाषा को विभाजन की रेखा नहीं, बल्कि संवाद का सेतु बनाएं।

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