भूमिका:
यह कहानी दिल्ली से पटना के एक सफर से शुरू हुई, जिसे मैंने यात्रा की घबराहट के बावजूद केवल इस जिज्ञासा के चलते तय किया कि बिहार में चुनाव आयोग द्वारा की जा रही “स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR)” प्रक्रिया में आखिर हो क्या रहा है? क्या यह प्रक्रिया निष्पक्ष है? या फिर यह अवैध प्रवासियों की राजनीति की आड़ में किसी विशेष समुदाय को निशाना बना रही है? इन सवालों ने मुझे सीमांचल के सुदूर इलाकों तक पहुंचा दिया।
पटना से सीमांचल तक की पड़ताल:
जब हम मुजफ्फरपुर होते हुए हाजीपुर पहुंचे, तो बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) ही भ्रम और विरोधाभास भरे जवाब देने लगे। SIR प्रक्रिया की वास्तविकता को समझना मुश्किल हो गया। सवाल यही था: वे नागरिक, जिन्होंने 2024 में वोट डाला था, उनका नाम 2025 की मतदाता सूची से कैसे गायब हो गया? और क्यों ये मामले मुख्यतः मुस्लिम, बंगाली मूल या शेरशहाबादी समुदाय से जुड़े लोगों तक सीमित हैं?
सिरी (SIR) बनाम समरी रिवीजन:
चुनाव आयोग ने यह SIR प्रक्रिया इस आधार पर शुरू की थी कि मृत, डुप्लिकेट और पलायन कर चुके मतदाताओं को हटाकर मतदाता सूची को अद्यतन किया जा सके। इससे पहले जून 2025 तक एक “समरी रिवीजन” प्रक्रिया चलाई गई थी, जो हर साल की नियमित प्रक्रिया होती है। इसमें नाम जोड़ना, सुधार करना या हटाना संभव होता है।
लेकिन जो जमीन पर दिख रहा है, वह यह है कि SIR के दौरान हजारों लोगों को बताया जा रहा है कि उनका नाम अब सिस्टम में है ही नहीं। सवाल उठता है कि ये नाम कब हटाए गए? समरी रिवीजन के दौरान या अब SIR की आड़ में?
मतदाता: हैरानी, भ्रम और डर:
2024 की सूची में नाम होने के बावजूद लोगों को कहा जा रहा है कि वे मौजूद ही नहीं हैं। BLO की कार्यप्रणाली क्षेत्र दर क्षेत्र बदल रही है। कहीं एक बूथ पर फॉर्म 6 जमा किया जा रहा है, तो कहीं लोगों को यह भी नहीं बताया जा रहा कि उन्हें क्या करना है।
सिस्टम की असंगतियां:
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब समरी रिवीजन जून 2025 में ही पूरा हुआ था, तब यदि कोई गलती हुई थी, तो उसे वहीं सुधार लिया जाना चाहिए था। अब SIR में जाकर अचानक नाम गायब पाए जा रहे हैं।
BLO की गवाही: जिलास्तरीय आदेश और समुदाय विशेष पर संदेह:
हाजीपुर के एक सरकारी स्कूल में तैनात BLO, जो पिछले 18 वर्षों से सिस्टम में हैं, ने बताया:
“2024 में वोट दिया, 2025 में नाम कट गया। डिलीशन जिला से हो रहा है। सिस्टम सिर्फ एक बार एड या डिलीट करने देता है। अभी तो ऐड भी नहीं हो रहा।”
उनसे पूछा गया कि जिनके पास सभी वैध दस्तावेज हैं, उनका नाम कैसे हट गया?
उन्होंने कहा: “कुछ ना कुछ गड़बड़ी तो मिली होगी। बिना वजह तो नाम नहीं हटता। लेकिन 60% लोग बाहरी हैं, सबको डर है कि उनका नाम भी हट जाएगा।”
जब उनसे पूछा गया कि क्या वे अवैध प्रवासियों को पहचान सकते हैं, तो वे हिचकिचाए और बोले: “सब बोलता है बंग्लादेशी नहीं है, बंगाल से है। लेकिन हमें शक है। एक आता है, तो पचास पीछे आते हैं।”
उन्होंने यह भी बताया कि कई लोग धमकी दे चुके हैं और उन्होंने SDM को शिकायत दी है।
मुजफ्फरपुर और हाजीपुर में बदलाव की शुरुआत:
सीमांचल के मुकाबले यहां का माहौल थोड़ा शांत था, लेकिन प्रक्रिया और भी अधिक संदिग्ध थी। BLO ने मोबाइल ऐप पर लाइव डेमो दिया कि कैसे SIR टैब में बिना किसी दस्तावेज के सिर्फ नाम, जन्मतिथि और फोटो अपलोड कर सकते हैं।
“हम स्थानीय हैं, हमें पता है कौन यहां का है। बाद में यदि कोई आपत्ति आती है या ERO दस्तावेज मांगता है, तब देखेंगे।”
सिस्टम का अविश्वसनीय पहलू:
इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि नामों का सत्यापन कहीं भी किसी भी मानक प्रक्रिया से नहीं हो रहा है। जिनके नाम हटे हैं, उन्हें कोई नोटिस नहीं मिला। उन्हें कोई मौका नहीं दिया गया कि वे अपनी बात रख सकें। बल्कि अब उनसे कहा जा रहा है कि वे दोबारा फॉर्म 6 भरें।
समुदाय विशेष का निशाना?
तेजी से यह धारणा बनती जा रही है कि यह प्रक्रिया मुस्लिम, बंगाली और शेरशहाबादी समुदाय को चुनावी प्रक्रिया से बाहर करने का एक प्रयास है। खासकर जब BLO जैसे अधिकारी सार्वजनिक रूप से संदेह व्यक्त करते हैं और सामूहिक रूप से पूरे समुदाय को “बाहरी” घोषित करते हैं, तो यह चिंता और बढ़ जाती है।
प्रशासनिक जवाबदेही का अभाव:
चुनाव आयोग ने अब तक इस मुद्दे पर कोई स्पष्ट वक्तव्य नहीं दिया है। जिला प्रशासन से लेकर ERO तक, सभी अधिकारी जिम्मेदारी से बचते नजर आ रहे हैं। BLO खुद कह रहे हैं कि डिलीशन जिला स्तर से हो रहा है, और उन्हें आदेशों की जानकारी नहीं है।
निष्कर्ष:
बिहार में SIR प्रक्रिया का उद्देश्य पारदर्शिता और लोकतांत्रिक शुद्धता होना चाहिए था। लेकिन वर्तमान स्थिति में यह प्रक्रिया एक छद्म ढांचे में तब्दील हो गई है, जहां नागरिकों को जानकारी दिए बिना मतदाता सूची से हटा दिया जा रहा है। और यह हटाव भी अधिकतर उन समुदायों को प्रभावित कर रहा है, जो पहले से ही हाशिए पर हैं।
लोकतंत्र की सबसे मूल भावना — “सभी को वोट देने का अधिकार” — अगर राजनीतिक नफरत और प्रशासनिक निष्क्रियता के हाथों कमजोर हो जाए, तो यह केवल एक राज्य की नहीं, पूरे देश की हार है।
अब जरूरी है कि चुनाव आयोग स्पष्टता से जनता के सामने आए, हर एक डिलीशन का दस्तावेजी आधार दे और इस प्रक्रिया में पूरी पारदर्शिता लाए। क्योंकि सवाल सिर्फ एक फॉर्म का नहीं है — यह सवाल है नागरिकता, अधिकार और लोकतंत्र की आत्मा का।
















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