मुद्दा सिर्फ कुत्तों का नहीं, मानसिकता का है
दिल्ली NCR की ज्यादातर सोसायटियों और मोहल्लों में स्ट्रे डॉग्स हैं। इनमें से कई शांति से रहते हैं, लेकिन कुछ आक्रामक व्यवहार भी दिखाते हैं। असली चुनौती तब आती है जब कुछ ‘कथित’ डॉग लवर्स बिना समुदाय की सहमति के, इन्हें अपनी निजी जिम्मेदारी की बजाय पब्लिक स्पेस में पालने जैसा व्यवहार करने लगते हैं।
5% बनाम 95% – असमान शक्ति समीकरण
आंकड़े भले ही आधिकारिक न हों, लेकिन जमीनी हकीकत ये है:
- किसी भी सोसायटी में मुश्किल से 5% लोग ऐसे होते हैं जो खुलेआम स्ट्रे डॉग्स को खाना खिलाते हैं, उनके लिए अस्थायी शेल्टर बनाते हैं और अपने विचारों को ‘जानवरों के अधिकार’ की लड़ाई के रूप में पेश करते हैं।
- बाकी 95% निवासी इनसे सहमत नहीं होते, क्योंकि उनके बच्चों की सुरक्षा, बुजुर्गों की सुविधा और आम नागरिकों के रोजमर्रा के काम प्रभावित होते हैं।
सुप्रीम कोर्ट का दृष्टिकोण
सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक आदेश में कहा था:
- स्ट्रे डॉग्स को भी जीने का अधिकार है।
- अगर कोई व्यक्ति इन्हें खिलाने या देखभाल करने की कोशिश करता है और कोई रुकावट डालता है, तो उस रुकावट पर भी कार्रवाई हो सकती है।
समस्या: यह आदेश नेक इरादे से दिया गया, लेकिन जमीनी स्तर पर इसका मतलब यह बन गया कि कथित डॉग लवर्स को ‘कानूनी सुरक्षा कवच’ मिल गया, जबकि बाकी लोग चुपचाप सहते रहें।
जमीनी हकीकत – सुरक्षा बनाम करुणा
दिल्ली NCR में पिछले कुछ सालों में कई गंभीर घटनाएं हुई हैं:
- बच्चों पर हमले – कई मामलों में स्कूली बच्चों को स्ट्रे डॉग्स ने काटा।
- बुजुर्गों की चोटें – अचानक भौंकने या पीछा करने से गिरने और चोट लगने की घटनाएं।
- डिलीवरी एजेंट्स और जॉगर्स पर हमले – रात के समय विशेष रूप से।
कथित डॉग लवर्स इन घटनाओं को या तो ‘अलग-थलग केस’ कहते हैं या पीड़ित पर ही गलती मढ़ते हैं।
सोसायटी में तनाव और विभाजन
स्ट्रे डॉग्स का मुद्दा कई जगहों पर सोसायटी मीटिंग्स में झगड़े का कारण बन चुका है।
- एक पक्ष कहता है: “इन बेजुबानों को भी जीने का हक है, उन्हें प्यार और खाना दो।”
- दूसरा पक्ष कहता है: “जीने का हक सबको है, लेकिन पब्लिक स्पेस में असुरक्षा नहीं होनी चाहिए।”
कानूनी और प्रशासनिक पेचीदगी
- एनिमल वेलफेयर बोर्ड ऑफ इंडिया (AWBI) की गाइडलाइन्स के अनुसार, स्ट्रे डॉग्स को उनके मूल स्थान से हटाया नहीं जा सकता।
- म्युनिसिपल कॉरपोरेशन्स की जिम्मेदारी है कि वे उनका टीकाकरण और नसबंदी कराएं।
- लेकिन, कई बार नसबंदी प्रोग्राम आधे-अधूरे होते हैं और आक्रामक डॉग्स पर तुरंत कार्रवाई नहीं हो पाती।
डॉग लवर्स एक्टिविज्म का ‘डार्क साइड’
कुछ कथित डॉग लवर्स:
- अपनी सोच को ‘नैतिक श्रेष्ठता’ के रूप में पेश करते हैं।
- बहस में बाकी लोगों को ‘क्रूर’ या ‘संवेदनहीन’ कहकर नीचा दिखाते हैं।
- कानूनी धमकी का इस्तेमाल करते हैं ताकि कोई उनके खिलाफ आवाज न उठा सके।
असली समाधान – संतुलित दृष्टिकोण
मुद्दा डॉग्स से नफरत या प्यार का नहीं है, बल्कि सुरक्षा, स्वास्थ्य और सामुदायिक सहमति का है।
संभावित समाधान:
- सोसायटी स्तर पर ‘फीडिंग जोन’ तय हों, जो रिहायशी गलियारों से दूर हों।
- म्युनिसिपल कॉरपोरेशन द्वारा 100% टीकाकरण और नसबंदी।
- आक्रामक कुत्तों को तुरंत कैप्चर कर शेल्टर में भेजना।
- कानूनी भाषा में संशोधन ताकि दोनों पक्षों के अधिकार संतुलित रहें।
मीडिया और सोशल मीडिया की भूमिका
- कुछ मीडिया रिपोर्ट्स डॉग लवर्स को ‘हीरो’ और बाकी लोगों को ‘विलेन’ की तरह पेश करती हैं।
- सोशल मीडिया पर ‘इमोशनल कार्ड’ खेलकर असली समस्या को ढक दिया जाता है।
निष्कर्ष – टकराव नहीं, सहअस्तित्व चाहिए
स्ट्रे डॉग्स भारत के शहरी इकोसिस्टम का हिस्सा हैं। उन्हें खत्म करने की बात न तो नैतिक है, न कानूनी। लेकिन, कथित डॉग लवर्स का एकतरफा एक्टिविज्म भी उतना ही खतरनाक है क्योंकि यह सामुदायिक संतुलन को बिगाड़ता है। असली जरूरत है भावनाओं और व्यावहारिकता के बीच संतुलन बनाने की।















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