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अब 3 दिन में पता चलेंगी बच्चों की दुर्लभ बीमारियां, नया ब्लड टेस्ट देगा तेज रिजल्ट

अब 3 दिन में पता चलेंगी बच्चों की दुर्लभ बीमारियां, नया ब्लड टेस्ट देगा तेज रिजल्ट

दुनिया भर में करीब 7,000 ऐसी दुर्लभ और गंभीर बीमारियां पाई जाती हैं जो 5,000 से ज्यादा जीन में बदलाव यानी म्यूटेशन की वजह से होती हैं। इनका असर लगभग 30 करोड़ लोगों पर पड़ता है, जिनमें बड़ी संख्या में बच्चे भी शामिल होते हैं। फिलहाल दुर्लभ बीमारियों से पीड़ित मरीजों में से करीब 50% मामलों में बीमारी की सही पहचान नहीं हो पाती है। कई बार जो टेस्ट किए जाते हैं, वे भी काफी धीमे और जटिल होते हैं, जिससे इलाज में देरी हो जाती है। लेकिन अब एडवांस्ड ब्लड टेस्टिंग तकनीक की मदद से इन बीमारियों की पहचान पहले से ज्यादा तेज़, सटीक और आसान तरीके से की जा सकेगी। यह तकनीक न केवल बच्चों की जिंदगी बचाने में मदद करेगी, बल्कि समय पर इलाज शुरू करने का भी मौका देगी।

इस तकनीक से किसी व्यक्ति के शरीर में मौजूद जीन में हुए बदलाव का असर सीधे तौर पर प्रोटीन के स्तर पर देखा जा सकता है। हमारे जीन आमतौर पर डीएनए के ज़रिए प्रोटीन बनाते हैं और यही प्रोटीन हमारे शरीर की कोशिकाओं में कई महत्वपूर्ण काम करते हैं। ऐसे में अगर किसी जीन में कोई म्यूटेशन होता है, तो उसका असर प्रोटीन के निर्माण और उनके कामकाज पर भी पड़ता है। यही तकनीक अब दुर्लभ बीमारियों की पहचान के लिए कारगर साबित हो सकती है।

यह तकनीक 50% से ज्यादा जेनेटिक और माइटोकॉन्ड्रियल बीमारियों से जुड़े जीन को कवर करती है और साथ ही यह उन जीन की भी पहचान करने में सक्षम है, जो अभी तक किसी बीमारी से जुड़े नहीं माने गए थे।” यह टेस्ट दुर्लभ बीमारियों की सटीक पहचान में मददगार साबित हो सकता है, खासतौर पर उन मामलों में जहां पारंपरिक जेनेटिक टेस्ट कोई ठोस नतीजा नहीं दे पाते।

यह तकनीक इसलिए खास है क्योंकि यह जीन के बजाय सीधे प्रोटीन को एनालाइज करती है। प्रोटीन हमारे शरीर की कोशिकाओं में असल काम करते हैं और किसी जीन में बदलाव का असर सबसे पहले इन्हीं प्रोटीन पर पड़ता है। इस तकनीक से यह समझने में मदद मिलती है कि जीन में आए बदलाव से प्रोटीन के कार्य में किस तरह की गड़बड़ी होती है और वह बीमारी का कारण कैसे बनती है। अगर किसी जीन के बदलाव को बीमारी की असली वजह साबित किया जा सके, तो यह तकनीक हजारों दुर्लभ बीमारियों की पहचान में क्रांतिकारी साबित हो सकती है। साथ ही, इससे कई नई बीमारियों का भी जल्द पता लगाया जा सकता है।

ट्रायो एनालिसिस एक खास जांच तकनीक है जो बेहद कम खून (सिर्फ 1 मिलीलीटर) से की जा सकती है और खास बात यह है कि गंभीर स्थिति में इलाज पा रहे बच्चों को इसकी रिपोर्ट सिर्फ तीन दिनों में मिल सकती है। रिसर्चर हॉक के मुताबिक, अगर यह टेस्ट बच्चे के साथ-साथ उसके माता-पिता – तीनों के खून के सैंपल पर की जाए, तो इसे “ट्रायो एनालिसिस” कहा जाता है। यह तकनीक न केवल समय की बचत करती है, बल्कि एक ही बार में सटीक रिजल्ट देती है, जिससे कई बार होने वाली अलग-अलग और महंगी जांचों की ज़रूरत नहीं पड़ती। इसका फायदा मरीजों को ही नहीं, अस्पतालों को भी होता है, क्योंकि इससे इलाज का खर्च काफी कम हो जाता है।

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