भारत और मालदीव के द्विपक्षीय संबंधों में हाल ही में जो सकारात्मक बदलाव आया है, वह अचानक नहीं हुआ है। यह बदलाव भारत द्वारा उकसावे के बावजूद संयम बरतने, लगातार कूटनीतिक प्रयास करने और मालदीव की आर्थिक कठिनाइयों में समय पर सहायता देने की रणनीति का परिणाम है। ऐसे समय में जब अन्य क्षेत्रीय शक्तियाँ पीछे हट गई थीं, भारत ने अपने “पड़ोसी प्रथम” (Neighbourhood First) नीति को लागू करते हुए मालदीव के साथ मजबूत रिश्ते बनाए रखने का निर्णय लिया।
मालदीव में सत्ता परिवर्तन और भारत विरोधी रुख
2023 में मोहम्मद मुइज़्ज़ु के राष्ट्रपति बनने के साथ ही भारत-मालदीव संबंधों में तनाव की शुरुआत हुई थी। मुइज़्ज़ु ने “इंडिया आउट” अभियान की अगुवाई करते हुए सत्ता में कदम रखा था और चीन के साथ घनिष्ठ संबंधों को प्राथमिकता देना शुरू किया।
मुइज़्ज़ु सरकार का सबसे विवादास्पद निर्णय था मालदीव में तैनात भारतीय सैन्य कर्मियों को हटाने की मांग। ये 80 से अधिक भारतीय सैन्यकर्मी दो हेलीकॉप्टर और एक विमान का संचालन करते थे, जिनका मुख्य उपयोग मानवीय सहायता और आपदा राहत कार्यों में होता था। हालांकि यह एक संवेदनशील मुद्दा था, भारत ने तत्काल प्रतिक्रिया देने के बजाय संतुलित और शांत नीति अपनाई।
सैन्य कर्मियों की वापसी और नागरिक विशेषज्ञों की तैनाती
भारत ने मालदीव के साथ व्यापक और गहन विचार-विमर्श कर सैन्य कर्मियों को चरणबद्ध तरीके से हटा लिया और उनकी जगह नागरिक विशेषज्ञों को तैनात किया। यह कदम दर्शाता है कि भारत विवादों से टकराव के बजाय बातचीत के जरिए समाधान निकालने में विश्वास रखता है।
प्रधानमंत्री मोदी की रणनीति: स्थिरता के साथ आगे बढ़ना
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति की विशेषता रही है – धैर्य और निरंतरता। इसी का परिणाम था कि मुइज़्ज़ु को 2024 में प्रधानमंत्री मोदी के तीसरे कार्यकाल के शपथ ग्रहण समारोह में आमंत्रित किया गया। यह आमंत्रण तब आया जब मालदीव ने भारत के प्रति अपने रुख में नरमी नहीं दिखाई थी। इस कदम से यह संदेश गया कि भारत अपने द्विपक्षीय रिश्तों में अस्थायी उथल-पुथल के बावजूद, भविष्य की संभावनाओं को देखते हुए आगे बढ़ता है।
ऐतिहासिक निमंत्रण: प्रधानमंत्री मोदी को मालदीव का मुख्य अतिथि बनाया गया
मुइज़्ज़ु के सत्ता में आने के लगभग दो वर्षों बाद, 26 जून 2025 को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मालदीव की स्वतंत्रता की 60वीं वर्षगांठ के अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किए गए। यह निमंत्रण केवल औपचारिक नहीं था, बल्कि द्विपक्षीय संबंधों के बदलते परिदृश्य का प्रतीक था।
यह अवसर इस बात का प्रमाण था कि मालदीव की वर्तमान सरकार भी अब भारत के महत्व को स्वीकार कर रही है और रिश्तों को पुनः पटरी पर लाने के प्रयास कर रही है।
चीन की बढ़ती सक्रियता और भारत की प्रतिक्रिया
मुइज़्ज़ु सरकार ने चीन के साथ रक्षा सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसके तहत मालदीव को प्रशिक्षण और गैर-घातक सैन्य उपकरण दिए गए। साथ ही, चीन के निगरानी जहाज़ों को मालदीव में लंगर डालने की अनुमति भी दी गई, जिन्हें श्रीलंका ने अपने बंदरगाहों में घुसने से मना कर दिया था।
इस स्थिति में भारत ने कोई जल्दबाजी में जवाब नहीं दिया। न कोई तीखी आलोचना, न ही कोई जवाबी कार्रवाई। इसके बजाय, भारत ने कूटनीतिक चैनलों के जरिए मालदीव के साथ बातचीत जारी रखी और सहायता देने की नीति को बरकरार रखा। यह शांत, संतुलित और दीर्घकालिक रणनीति अब रंग ला रही है।
आर्थिक सहयोग और समर्थन: संकट के समय भारत बना मददगार
जब मालदीव भुगतान असंतुलन (balance of payments) संकट से जूझ रहा था, तब भारत ही एकमात्र ऐसा पड़ोसी देश था जिसने खुलकर आर्थिक मदद दी। इसमें दो प्रमुख मुद्रा विनिमय (currency swap) समझौते शामिल हैं – एक 400 मिलियन अमेरिकी डॉलर का और दूसरा ₹3,000 करोड़ का। इसके अलावा, भारत ने मालदीव को बजटरी सपोर्ट और विकास सहयोग भी जारी रखा।
सामरिक और समुद्री साझेदारी
भारत और मालदीव के बीच अक्टूबर 2024 में संयुक्त दृष्टिकोण (Joint Vision for Comprehensive Economic and Maritime Security Partnership) पर सहमति बनी थी। इसके तहत:
- मालदीव के कोस्ट गार्ड और रक्षा बलों को भारत के सैन्य अकादमियों में विशेष प्रशिक्षण दिया गया,
- सामुद्रिक सुरक्षा और निगरानी पर सहयोग बढ़ाया गया,
- आपदा प्रबंधन और समुद्री खोज एवं बचाव अभियानों में सहयोग सुनिश्चित किया गया।
व्यापार और निवेश में मजबूती
वर्तमान में भारत और मालदीव के बीच द्विपक्षीय व्यापार लगभग $500 मिलियन तक पहुंच चुका है।
- पर्यटन, परिवहन, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में भारतीय निवेशकों की उपस्थिति लगातार बढ़ रही है।
- दोनों देश मुक्त व्यापार समझौते (Free Trade Agreement) और निवेश संधि (Investment Treaty) पर बातचीत कर रहे हैं।
- 13 महत्वपूर्ण समझौतों (MoUs) पर हस्ताक्षर किए गए हैं, जिनमें मालदीव के द्वीपों के बीच फेरी सेवा विस्तार प्रमुख है।
विदेश सचिव विक्रम मिस्री का बयान: “रिश्तों पर मेहनत का नतीजा”
विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने हाल ही में एक मीडिया ब्रीफिंग में कहा:
“यह संबंधों पर निरंतर और उच्च स्तर पर दिए गए ध्यान का परिणाम है। हमने इस रिश्ते को बनाए रखने और मजबूत करने के लिए लगातार प्रयास किया है, और अब उसका नतीजा सामने है।”
उन्होंने यह भी जोड़ा:
“हमने मालदीव के अपने साझेदारों से निकट संवाद कायम रखा, यह स्पष्ट किया कि भारत द्विपक्षीय संबंधों को किस दिशा में ले जाना चाहता है। परिणाम आज आपके सामने है।”
निष्कर्ष: रणनीति, धैर्य और कूटनीति की जीत
भारत और मालदीव के बीच हालिया सामरिक सामंजस्य इस बात का प्रमाण है कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में जल्दबाज़ी या आक्रोश के बजाय दूरदर्शिता और कूटनीतिक संतुलन कहीं अधिक प्रभावी होता है। जब चीन जैसे देश आक्रामक रणनीति अपना रहे हैं, भारत की संयमित, सहयोगात्मक और दीर्घकालिक दृष्टि ने मालदीव जैसे महत्वपूर्ण रणनीतिक पड़ोसी को फिर से अपने नज़दीक लाने में सफलता प्राप्त की है।
प्रधानमंत्री मोदी की मालदीव यात्रा और वहां उनका स्वागत, केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं बल्कि भारत की विदेश नीति की सफलता की कहानी है – एक ऐसी कहानी जो धैर्य, निरंतरता और विश्वास पर आधारित है।















Leave a Reply