भारत के आर्थिक अपराधियों की लंबी सूची में मोनिका कपूर एक ऐसा नाम है जो पिछले ढाई दशकों से कानून की आंखों में धूल झोंकती रही। लेकिन अब केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) ने आखिरकार इस भगोड़ी को अमेरिका से प्रत्यर्पित कर भारत लाने में सफलता हासिल की है। यह केवल एक कानूनी सफलता नहीं बल्कि न्यायिक व्यवस्था की दृढ़ता और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की मिसाल है।
बुधवार को सीबीआई ने एक बयान में जानकारी दी कि मोनिका कपूर को अमेरिका की एजेंसियों से मंगलवार को हिरासत में लेकर भारत लाया जा रहा है। वह एक अमेरिकन एयरलाइंस की उड़ान से बुधवार रात तक भारत पहुंचेगी।
कौन है मोनिका कपूर?
मोनिका कपूर ‘मोनिका ओवरसीज’ नामक फर्म की मालिक थी। उसने अपने दो भाइयों राजन खन्ना और राजीव खन्ना के साथ मिलकर फर्जी दस्तावेजों के आधार पर भारी आयात-निर्यात धोखाधड़ी को अंजाम दिया। इन लोगों ने आभूषणों के लेनदेन के लिए जाली शिपिंग बिल, चालान और बैंक प्रमाण पत्र बनवाए। इन जाली दस्तावेजों के आधार पर इन्होंने सरकार से शुल्क मुक्त आयात लाइसेंस प्राप्त किए।
सीबीआई की जांच के अनुसार, इन लाइसेंसों को प्रीमियम पर ‘डीप एक्सपोर्ट्स, अहमदाबाद’ नामक कंपनी को बेच दिया गया। इस कंपनी ने उन लाइसेंसों का उपयोग करके शुल्क-मुक्त सोना आयात किया जिससे भारत सरकार के खजाने को ₹1.44 करोड़ यानी लगभग $6,79,000 का नुकसान हुआ।
मामले की जांच और चार्जशीट
सीबीआई ने इस मामले की जांच 2002 में शुरू की और 31 मार्च 2004 को मोनिका कपूर और उसके दोनों भाइयों के खिलाफ आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी और जालसाजी के आरोपों में चार्जशीट दाखिल की। जबकि दोनों भाइयों को 2017 में दोषी ठहराया गया, मोनिका कपूर 1999 से ही फरार थी। उसने न तो जांच में सहयोग किया और न ही अदालत में पेश हुई। 13 फरवरी 2006 को उसे आधिकारिक रूप से ‘घोषित अपराधी’ (Proclaimed Offender) घोषित कर दिया गया।
प्रत्यर्पण की कानूनी लड़ाई
भारत सरकार ने अक्टूबर 2010 में अमेरिका से मोनिका कपूर के प्रत्यर्पण की औपचारिक मांग की। यह अनुरोध भारत और अमेरिका के बीच 1997 में हुए प्रत्यर्पण संधि के तहत किया गया। इस पर 2012 में न्यूयॉर्क की ईस्टर्न डिस्ट्रिक्ट कोर्ट ने प्रत्यर्पण को मंजूरी दी।
लेकिन मोनिका कपूर ने अदालत के इस फैसले को चुनौती दी। उसने अमेरिकी विदेश मंत्रालय को अर्जी देकर दावा किया कि भारत में उसके साथ प्रताड़ना हो सकती है और यह ‘यूनाइटेड नेशंस कन्वेंशन अगेंस्ट टॉर्चर’ (UN-CAT) का उल्लंघन होगा। उसने अमेरिका के ‘फॉरेन अफेयर्स रिफॉर्म एंड रिस्ट्रक्चरिंग एक्ट ऑफ 1998’ (FARRA) का हवाला देते हुए प्रत्यर्पण को रोकने की अपील की।
हालांकि अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने इन दलीलों को खारिज कर दिया और प्रत्यर्पण वारंट पर हस्ताक्षर कर दिए। इसके बाद भी कपूर ने कई कानूनी विकल्प अपनाए और अमेरिकी अदालतों में चुनौती दी। लेकिन मार्च 2025 में अमेरिका की ‘सेकंड सर्किट कोर्ट ऑफ अपील्स’ ने प्रत्यर्पण को अंतिम रूप से वैध ठहराया।
CBI की लगातार कोशिशें और सफलता
CBI और प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने संयुक्त रूप से इस केस पर वर्षों तक कार्य किया। इंटरपोल के सहयोग से मोनिका कपूर के खिलाफ रेड कॉर्नर नोटिस जारी किया गया था। CBI ने पिछले 3-4 वर्षों में 120 से अधिक ऐसे अपराधियों को प्रत्यर्पण या निर्वासन के माध्यम से भारत वापस लाने में सफलता हासिल की है।
हाल ही में 4 जुलाई को नीरव मोदी के भाई नेहाल मोदी को भी अमेरिका में गिरफ्तार किया गया था। यह भी एक बड़ा अंतरराष्ट्रीय आर्थिक अपराधी था, जो वर्षों से फरार था।
क्या होगा अब?
मोनिका कपूर को भारत लाने के बाद उसे संबंधित अदालत में पेश किया जाएगा। चूंकि वह घोषित अपराधी थी और लंबे समय तक फरार रही, इसलिए उस पर कड़ी निगरानी रहेगी और जमानत मिलने की संभावना बेहद कम होगी।
अब सीबीआई उसके खिलाफ लंबित ट्रायल को पुनः गति देगा और सरकार को हुए आर्थिक नुकसान की भरपाई के लिए भी अलग से वसूली की प्रक्रिया चल सकती है।
इस केस के व्यापक प्रभाव
- प्रत्यर्पण संधियों की मजबूती: यह घटना दर्शाती है कि भारत की प्रत्यर्पण नीति अब केवल दस्तावेजों तक सीमित नहीं, बल्कि सख्ती से क्रियान्वित हो रही है।
- आर्थिक अपराधियों में भय:अब यह संदेश स्पष्ट है कि कितनी भी बड़ी योजना बनाकर कोई देश छोड़कर भागे, भारत सरकार और एजेंसियां उसे अंतरराष्ट्रीय मंचों से लाकर न्याय के कटघरे में खड़ा कर सकती हैं।
- CBI और ED की प्रतिष्ठा: दोनों एजेंसियों की साख और कार्यप्रणाली पर उठते सवालों के बीच यह एक बड़ी नैतिक और कानूनी जीत है।
निष्कर्ष
मोनिका कपूर का प्रत्यर्पण न केवल एक भगोड़ी को न्याय के समक्ष लाने का मामला है, बल्कि यह भारत की वैश्विक स्तर पर बढ़ती कूटनीतिक और न्यायिक ताकत का भी परिचायक है। यह केस एक उदाहरण है कि अब भारत अपने आर्थिक अपराधियों को विदेशों में छिपने नहीं देगा।
इस तरह की सफलताओं से जनता का कानून और न्यायपालिका में विश्वास मज़बूत होता है और यह संदेश जाता है कि अपराध कितना भी संगीन या सुनियोजित क्यों न हो, उसकी सज़ा जरूर मिलेगी।
















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