मायावती की छत्रछाया में पले आकाश आनंद
बसपा प्रमुख मायावती की गोद में पले-बढ़े आकाश आनंद को उन्होंने अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी तक घोषित कर दिया था। मायावती ने आठ साल तक उन्हें राजनीति का ककहरा सिखाया और बसपा के तौर-तरीकों से वाकिफ कराया। लेकिन जैसे ही आकाश आनंद ने राजनीति में ऊंची उड़ान भरनी शुरू की, मायावती ने उन्हें तुरंत जमीन पर उतार दिया।
बसपा से निकाले गए आकाश आनंद और अशोक सिद्धार्थ
मायावती ने पहले अपने समधी अशोक सिद्धार्थ को पार्टी से बाहर निकाला और अब अपने भतीजे आकाश आनंद को भी पार्टी से निकाल दिया। पहले उन्हें राष्ट्रीय समन्वयक (नेशनल कोऑर्डिनेटर) पद से हटाया गया और फिर पार्टी से भी बाहर कर दिया गया।
बसपा में नंबर दो की कुर्सी पर बैठने वालों की होती रही है ‘बलि’
यह पहली बार नहीं है जब बसपा में नंबर दो की कुर्सी पर बैठे नेता को बाहर का रास्ता दिखाया गया हो। इससे पहले भी जिसने भी उड़ने की कोशिश की, उसे मायावती ने तुरंत किनारे कर दिया। फर्क सिर्फ इतना है कि पहली बार मायावती के परिवार का कोई सदस्य इसकी चपेट में आया है।
मायावती ने खुद को उत्तराधिकारी घोषित किया
2008 में लखनऊ की एक रैली में मायावती ने बिना किसी का नाम लिए कहा था कि उन्होंने अपना उत्तराधिकारी तय कर लिया है, जो उनसे 18-20 साल छोटा और दलित समुदाय से है, लेकिन उनके परिवार से नहीं है। उन्होंने दावा किया था कि इस नाम को एक सीलबंद लिफाफे में सुरक्षित रखा गया है, जिसे उनकी मृत्यु या कारावास की स्थिति में ही खोला जाएगा।
लेकिन अब मायावती ने साफ कर दिया कि वह जीते जी किसी को भी अपना उत्तराधिकारी नहीं बनाएंगी।
बसपा में नंबर दो की कुर्सी क्यों बनी ‘कांटों का ताज’
बसपा में आकाश आनंद और अशोक सिद्धार्थ से पहले भी कई नेता नंबर दो की हैसियत में रहे, लेकिन जैसे ही उन्होंने ज्यादा प्रभाव दिखाने की कोशिश की, उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।
बसपा से निकाले गए प्रमुख नेता:
- राजा राम – राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और नेशनल कोऑर्डिनेटर थे, लेकिन बाहर कर दिए गए।
- जुगल किशोर – बसपा सरकार (2007-2012) में प्रभावशाली नेता थे, लेकिन मायावती ने किनारे कर दिया।
- वीर सिंह और जय प्रकाश – मायावती के उत्तराधिकारी माने जाने लगे थे, लेकिन पार्टी से निकाल दिए गए।
- गयादीन दिनकर और दद्दू प्रसाद – कांशीराम के करीबी रहे, लेकिन बाहर कर दिए गए।
- नसीमुद्दीन सिद्दीकी, बाबू सिंह कुशवाहा, स्वामी प्रसाद मौर्य – बसपा के मजबूत नेता थे, लेकिन मायावती के प्रकोप का शिकार हुए।
- गांधी आजाद और बलिहारी बाबू – आजमगढ़ के प्रभावशाली बसपा नेता, लेकिन बाहर कर दिए गए।
- इंद्रजीत सरोज और सतीश चंद्र मिश्रा – बसपा में मजबूत पकड़ थी, लेकिन साइडलाइन कर दिए गए।
कांशीराम ने रखी बुनियाद, मायावती ने दिया विस्तार

कांशीराम ने दलित, ओबीसी और अल्पसंख्यकों को जोड़कर 1984 में बसपा की स्थापना की। मायावती के नेतृत्व में बसपा ने 1993 में सपा के साथ गठबंधन कर सरकार बनाई और 2007 में पूर्ण बहुमत से सरकार बनाई। लेकिन इस सफर में कांशीराम के साथ चलने वाले कई नेता मायावती के खिलाफ खड़े होने के बाद पार्टी से बाहर होते गए।
मायावती के फैसले हमेशा अप्रत्याशित
बसपा में किसी भी नेता को यह अंदाजा नहीं होता कि मायावती कब, किस वजह से नाराज हो जाएंगी। मायावती जब भी किसी नेता को बाहर करती हैं तो यह कहती हैं कि वह आंदोलन के साथ कोई समझौता नहीं करेंगी।
कांशीराम के बाद मायावती ने किसी चुनौती को टिकने नहीं दिया
कांशीराम ने 2001 में मायावती को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था। इसके बाद मायावती बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष बनीं और पार्टी पर उनका पूर्ण नियंत्रण हो गया। कांशीराम के साथी मायावती की नीतियों से असहमत होने लगे, लेकिन उन्होंने किसी को भी अपने खिलाफ टिकने नहीं दिया।
कांशीराम के साथी भी मायावती के निशाने पर
बसपा की शुरुआत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले कई नेताओं को मायावती ने किनारे कर दिया:
- राज बहादुर (कोरी समाज के बड़े नेता) – मायावती के प्रभाव बढ़ने के बाद बाहर कर दिए गए।
- डॉ. मसूद अहमद (मुस्लिम चेहरा) – मतभेद के कारण पार्टी से बाहर कर दिए गए।
- बरखूराम वर्मा (कुर्मी समाज के नेता) – मायावती के कोप का शिकार हुए।
- रमाशंकर पाल, राजा राम पाल, एसपी सिंह बघेल – पाल समाज से आने वाले ये नेता भी मायावती की नज़रों से बच नहीं सके।
- तेजेंद्र सिंह झल्ली (पंजाब) और दाउ राम रत्नाकर (मध्य प्रदेश) – जब खुद को नंबर दो समझने लगे, तो बाहर कर दिए गए।
बसपा में नंबर दो होना ‘कांटों का ताज’
बसपा में जिसने भी नंबर दो की हैसियत पाने की कोशिश की, उसे पार्टी से बाहर होना पड़ा। मायावती ने अपने समधी अशोक सिद्धार्थ और भतीजे आकाश आनंद को भी नहीं बख्शा। यह साफ संदेश है कि बसपा में सिर्फ एक ही नेता का दबदबा रहेगा – और वह हैं मायावती।















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