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“महादेव” और “शिव-शक्ति”… ऑपरेशन के नाम पर सियासी संग्राम क्यों?

Mahadev' and 'Shiv-Shakti'... Why a political battle in the name of an operation?

हाल ही में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम और पुंछ में दो बड़े सैन्य अभियानों को अंजाम देते हुए सुरक्षाबलों ने 5 आतंकियों को मार गिराया। इन अभियानों को क्रमशः ‘ऑपरेशन महादेव’ और ‘ऑपरेशन शिव-शक्ति’ नाम दिया गया। खास बात ये रही कि दोनों ही ऑपरेशन उन इलाकों में हुए जहां कुछ ही दिन पहले श्रद्धालुओं की निर्मम हत्या हुई थी। पहलगाम में अमरनाथ यात्रा के दौरान 26 सैलानियों की हत्या और पुंछ में घात लगाकर हमले की घटनाओं ने पूरे देश को झकझोर दिया था। सेना की प्रतिक्रिया तेज और सटीक रही — मगर उसके नामकरण ने अब नया विवाद खड़ा कर दिया है।

मुद्दा क्या है?

ऑपरेशन के नामों में ‘महादेव’ और ‘शिव-शक्ति’ जैसे धार्मिक शब्दों के प्रयोग को लेकर अब सियासी बहस छिड़ गई है। विपक्षी दलों का कहना है कि सैन्य अभियानों को धार्मिक रंग देने की कोशिश की जा रही है, जो एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की भावना के खिलाफ है। वहीं सत्ताधारी खेमे और राष्ट्रवादी विचारधारा से जुड़े संगठन इन नामों को ‘प्रेरणास्रोत’ और ‘संस्कृतिक सम्मान’ के प्रतीक मानते हैं।

अब सवाल ये है कि क्या सैन्य ऑपरेशन को धार्मिक नाम देना सही है? क्या यह देश की धर्मनिरपेक्ष छवि को प्रभावित करता है? या यह सिर्फ एक प्रतीकात्मक प्रतिक्रिया है? आइए इस पूरे घटनाक्रम, सियासी प्रतिक्रियाओं, सेना की परंपराओं और ऐतिहासिक दृष्टिकोण से इस विषय को समझते हैं।


1. ऑपरेशन महादेव और ऑपरेशन शिव-शक्ति: घटनाक्रम का विवरण

a. ऑपरेशन महादेव:
2 जुलाई 2025 को पहलगाम के जंगलों में सेना और जम्मू-कश्मीर पुलिस की साझा कार्रवाई में 3 आतंकियों को ढेर किया गया। यह वही इलाका था जहां जून के अंतिम सप्ताह में एक बस पर हमला कर 26 अमरनाथ श्रद्धालुओं की हत्या कर दी गई थी। मारे गए आतंकियों के पास से भारी मात्रा में हथियार और पाकिस्तानी लिंक वाले दस्तावेज बरामद हुए। सेना ने इस कार्रवाई को “ऑपरेशन महादेव” नाम दिया।

b. ऑपरेशन शिव-शक्ति:
इसके दो दिन बाद, पुंछ के सुरनकोट इलाके में एक और मुठभेड़ में 2 आतंकियों को मारा गया। सुरक्षा बलों ने इस ऑपरेशन को “ऑपरेशन शिव-शक्ति” नाम दिया। यह इलाका भी हाल के महीनों में आतंकी घुसपैठ और हमलों का केंद्र रहा है।

दोनों ही अभियानों में सेना की कार्यकुशलता और जवाबदेही की तारीफ हुई, लेकिन नामों को लेकर बहस छिड़ गई।


2. नामकरण पर सियासी तूफान: कौन क्या कह रहा है?

a. विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया:

कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, CPI(M), AAP और AIMIM जैसे दलों ने इन ऑपरेशनों के नामों पर कड़ा ऐतराज जताया। प्रमुख बयान कुछ इस तरह रहे:

  • जयराम रमेश (कांग्रेस):
    “सेना का काम आतंकवाद का खात्मा करना है, धर्म का प्रचार नहीं। ‘महादेव’ और ‘शिव-शक्ति’ जैसे नामों से एक सांप्रदायिक संदेश जाता है, जो संविधान के खिलाफ है।”
  • असदुद्दीन ओवैसी (AIMIM):
    “क्या अब ऑपरेशन का नाम ‘खलीफा’ या ‘हजरत अली’ भी होगा? धर्म को सेना से जोड़ना एक खतरनाक ट्रेंड है।”
  • डॉ. शशि थरूर (कांग्रेस):
    “सेना की तटस्थता सबसे बड़ा बल है। धार्मिक प्रतीकों से उसका नामकरण, राजनीतिक ध्रुवीकरण की ओर इशारा करता है।”

b. सरकार और समर्थकों की प्रतिक्रिया:

  • भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा:
    “ये भारत की संस्कृति और परंपरा से जुड़े नाम हैं। आतंकियों ने जिस पवित्र यात्रा को निशाना बनाया, उस पर करारा जवाब देना ‘शिव की शक्ति’ का प्रतीक है।”
  • रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह:
    “सेना के नामकरण पर राजनीति करना दुर्भाग्यपूर्ण है। यह ऑपरेशन भारत की आस्था पर हमले का जवाब थे। यह श्रद्धालुओं के प्रति श्रद्धांजलि थी।”
  • सेना के सूत्र:
    “हर ऑपरेशन का नाम उसके संदर्भ और उद्देश्य को ध्यान में रखकर रखा जाता है। इसमें प्रेरणा, मनोबल और प्रतीकवाद का महत्व होता है।”

3. क्या सेना हमेशा ऐसे नाम रखती है? नामकरण की परंपरा क्या कहती है?

भारतीय सेना में ऑपरेशन के नाम किसी भी धार्मिक या राजनीतिक झुकाव से औपचारिक रूप से तय नहीं होते। नाम अक्सर इन पहलुओं पर आधारित होते हैं:

  • मनोबल और प्रतीकात्मकता (Ex: ऑपरेशन विजय – कारगिल युद्ध)
  • स्थान से जुड़ा नाम (Ex: ऑपरेशन मेघदूत – सियाचिन)
  • रणनीतिक संदेश (Ex: ऑपरेशन ब्लू स्टार – अमृतसर)
  • कभी-कभी सांस्कृतिक संदर्भ (Ex: ऑपरेशन देवी शक्ति – अफगानिस्तान से रेस्क्यू मिशन)

ऐसे में ‘महादेव’ या ‘शिव-शक्ति’ जैसे नाम पूरी तरह नए नहीं हैं, लेकिन साथ ही यह भी सच है कि इस तरह के नाम धार्मिक भावना को भी जगाते हैं।


4. धर्म और राष्ट्रवाद की राजनीति: एक बड़ा परिप्रेक्ष्य

a. मोदी युग की ‘संस्कृतिक राष्ट्रवाद’ की छाया:

2014 के बाद से भारत की राजनीति में ‘हिंदू प्रतीकों’ का राजनीतिक इस्तेमाल तेज हुआ है। राम मंदिर, काशी कॉरिडोर, महाकाल लोक, सनातन धर्म पर बहस — ये सब भाजपा की सांस्कृतिक राष्ट्रवाद नीति के उदाहरण हैं। ऐसे में जब सैन्य कार्रवाई को भी ‘महादेव’ से जोड़ दिया जाता है, तो इसे राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जाता है।

b. विपक्ष की मुश्किल:
विपक्षी दलों के लिए यह एक दोधारी तलवार है — वे सेना पर सीधे सवाल नहीं उठा सकते, पर नामकरण की आलोचना कर अपने धर्मनिरपेक्ष रुख को कायम रखने की कोशिश करते हैं।

c. जनता की प्रतिक्रिया:
सोशल मीडिया पर इन ऑपरेशनों के नामों को लेकर बड़ा समर्थन दिखा। #HarHarMahadev, #OperationShivShakti जैसे ट्रेंड चलने लगे। इससे साफ है कि एक बड़ा वर्ग इस नामकरण से भावनात्मक जुड़ाव महसूस करता है।


5. सेना का धर्मनिरपेक्ष चरित्र बनाम भावनात्मक नामकरण

भारतीय सेना ने हमेशा खुद को धर्मनिरपेक्ष और राजनीतिक रूप से तटस्थ संस्था के रूप में प्रस्तुत किया है। उसका आदर्श वाक्य है – “Service before self”

हालांकि प्रेरणा और मनोबल के लिए सांस्कृतिक प्रतीक इस्तेमाल होते रहे हैं, लेकिन उसमें धार्मिक रंग देने से यह खतरा होता है कि अल्पसंख्यक समुदाय के जवानों और नागरिकों के बीच ‘अपनापन’ कम हो सकता है।

क्या सेना का एक मुस्लिम जवान भी ‘ऑपरेशन महादेव’ में वैसी ही सहजता महसूस करेगा?
यह सवाल संवेदनशील है, और इसलिए सेना में नामकरण को बहुत सोच-समझकर किया जाता रहा है।


6. अंतरराष्ट्रीय छवि और रणनीतिक संदेह

भारत खुद को एक धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करता है। ऐसे में सैन्य कार्रवाइयों को धार्मिक नाम देना, पाकिस्तान जैसे देशों को प्रोपेगेंडा का अवसर दे सकता है — जहां भारत को “हिंदू राष्ट्र” बताने की कोशिश की जाती रही है।

इसके अलावा, कश्मीर जैसे संवेदनशील इलाके में धार्मिक प्रतीकों का सैन्य इस्तेमाल आतंकियों के लिए “नफरत का ईंधन” भी बन सकता है।


7. समाधान क्या है? रास्ता क्या निकले?

  • सेना को पूरी स्वतंत्रता होनी चाहिए कि वह अपने ऑपरेशनों को प्रेरणास्रोत नाम दे सके — पर वह नाम सांप्रदायिक भावना से परे हो।
  • रक्षा मंत्रालय को नामकरण की एक नैतिक आचार संहिता बनानी चाहिए, जिससे कोई भी नाम धार्मिक या राजनीतिक विवाद में ना फंसे।
  • विपक्ष को भी अपनी प्रतिक्रिया में सेना के मनोबल को चोट पहुंचाने से बचना चाहिए।
  • मीडिया को भी चाहिए कि वह नामों पर फोकस करने की जगह ऑपरेशन की सफलता और रणनीति पर ध्यान केंद्रित करे।

निष्कर्ष:

‘ऑपरेशन महादेव’ और ‘ऑपरेशन शिव-शक्ति’ जैसे नाम सेना की तत्परता और आतंकवाद के खिलाफ कड़ा संदेश जरूर देते हैं, लेकिन इनका धार्मिक प्रतीकवाद राजनीति और समाज में विवाद की जड़ बन सकता है। भारत की ताकत उसकी विविधता और धर्मनिरपेक्षता में है। ऐसे में देश की सेना — जो सभी धर्मों के जवानों का संगठित रूप है — उससे यह अपेक्षा की जाती है कि वह हर नागरिक में समान विश्वास उत्पन्न करे।

नाम प्रेरणादायक हो सकते हैं, लेकिन उनमें ऐसा कुछ न हो जो विभाजन पैदा करे। ‘महादेव’ की शक्ति सिर्फ एक धर्म की नहीं, पूरे भारत की शक्ति बनकर उभरे — यही इस बहस का सार होना चाहिए।

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