आतंकवाद के खिलाफ उठती आवाज़ें
पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में दशकों से आतंकी संगठनों की जड़ें मजबूत रही हैं। लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद जैसे संगठनों ने यहां न सिर्फ ठिकाने बनाए, बल्कि स्थानीय आबादी को डर और धमकी के बल पर चुप भी कराया। मगर अब तस्वीर बदल रही है। आम लोग आतंकवाद के खिलाफ खुलकर बोलने लगे हैं। ताजा उदाहरण—लश्कर कमांडर की पीटाई और गांव से खदेड़ा जाना।
ऑपरेशन महादेव की सफलता और आतंकियों का खात्मा
हाल ही में भारतीय सेना ने जम्मू-कश्मीर के पहलगाम क्षेत्र में एक बड़ा ऑपरेशन चलाया, जिसे ‘ऑपरेशन महादेव’ नाम दिया गया। इस कार्रवाई में तीन पाकिस्तानी आतंकियों को मार गिराया गया, जो लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े हुए थे। इनमें हबीब ताहिर उर्फ ‘छोटू’ भी शामिल था, जो पाकिस्तान के पंजाब प्रांत से PoK होते हुए भारत में घुसा था।
भारतीय एजेंसियों के अनुसार, ये आतंकी अमरनाथ यात्रा को निशाना बनाने की फिराक में थे। लेकिन समय रहते सुरक्षाबलों की कार्रवाई ने उनके मंसूबों को नाकाम कर दिया।
छोटू के जनाज़े में फूटा गुस्सा
हबीब ताहिर उर्फ छोटू की मौत की खबर जब उसके गांव—पीओके के कोटली जिले के एक छोटे से गांव—में पहुंची, तो वहां पहले तो मातम छाया रहा। लेकिन जब लश्कर का कमांडर रिज़वान हनीफ अपने हथियारबंद साथियों के साथ जनाजे में शामिल होने पहुंचा, तो लोगों का गुस्सा फूट पड़ा।
लोगों ने उसे घेर लिया, उससे सवाल पूछे—”तुमने हमारे बच्चों को किस रास्ते पर डाला? क्यों भेजते हो इन्हें मौत के मुंह में?” और जब जवाब नहीं मिला, तो गांव वालों ने उसकी खुलेआम पिटाई कर दी।
कमांडर रिज़वान हनीफ की गांव से बेइज्ज़ती के साथ विदाई
गांव वालों ने न सिर्फ उसे पीटा, बल्कि उसके हथियारबंद साथियों के सामने ही उसे गांव से खदेड़ दिया। यह घटना कैमरे में कैद हो गई और सोशल मीडिया पर वायरल हो गई। वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि कैसे लश्कर का खौफ अब धीरे-धीरे खत्म हो रहा है।
लोग क्यों हो रहे हैं बाग़ी?
PoK के आम लोग अब सवाल उठा रहे हैं:
- हमारे नौजवानों को क्यों भड़काया जाता है?
- क्यों भेजा जाता है उन्हें भारत में मरने?
- क्यों नहीं मिलता है हमें बुनियादी हक?
यह विरोध महज भावनात्मक नहीं है, बल्कि एक सामाजिक विद्रोह बनता जा रहा है। बेरोजगारी, मूलभूत सुविधाओं की कमी, और प्रशासनिक उपेक्षा के बीच, जब आतंकी संगठन बच्चों को बहला-फुसलाकर अपने मकसद के लिए इस्तेमाल करते हैं, तो गुस्सा फूटना स्वाभाविक है।
बदलती मानसिकता और सोशल मीडिया की भूमिका
पिछले कुछ वर्षों में सोशल मीडिया ने PoK में जागरूकता बढ़ाई है। युवाओं को अब पता चल रहा है कि पाकिस्तान सरकार और आईएसआई आतंक के नाम पर उनके जीवन के साथ खेल रहे हैं। YouTube, Facebook और WhatsApp पर ऐसे कई वीडियो वायरल हो रहे हैं जिनमें लोग आतंकी संगठनों को सीधे चुनौती देते नजर आते हैं।
अंदर से टूट रहा है आतंकी तंत्र
लश्कर, जैश जैसे संगठनों की ताकत डर और भ्रम पर टिकी थी। अब जब लोग उनसे सवाल पूछने लगे हैं, तब उनके भीतर की दरारें सामने आने लगी हैं। सूत्रों के मुताबिक:
- लश्कर की नई भर्ती में भारी गिरावट आई है।
- फील्ड कमांडर अब अपने ही क्षेत्रों में असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।
- कई ग्रामीण इलाकों में इनके खिलाफ खुलेआम नारेबाजी हो रही है।
भारत के लिए क्या संकेत हैं ये घटनाएं?
भारत के लिए यह बदलाव सकारात्मक संकेत है। वर्षों से पाकिस्तान पर यह आरोप लगता रहा है कि वह आतंकवाद को बढ़ावा देता है। अब खुद PoK की जनता ये कह रही है कि वे आतंक के खिलाफ हैं। यह पाकिस्तान के लिए कूटनीतिक रूप से भी शर्मिंदगी का कारण बनता जा रहा है।
अंतरराष्ट्रीय मंच पर असर
पिछले कुछ वर्षों में UN और FATF जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत ने बार-बार पाकिस्तान के आतंकवाद समर्थक रवैये की आलोचना की है। अब जब PoK की जनता खुद आतंकवाद के खिलाफ खड़ी हो रही है, तो भारत के पक्ष को वैश्विक समर्थन मिलने की संभावना और बढ़ जाती है।
PoK में लोगों के संघर्ष की लंबी कहानी
PoK के लोग लंबे समय से पाकिस्तान सरकार की उपेक्षा झेलते आए हैं। गिलगिट-बाल्टिस्तान और मुजफ्फराबाद में बुनियादी ढांचे की स्थिति खराब है। स्कूलों में शिक्षक नहीं, अस्पतालों में दवाएं नहीं, और सड़कों की हालत जर्जर है। ऐसे में जब आतंकी संगठन युवाओं को “जन्नत” का सपना दिखाकर मौत की ओर धकेलते हैं, तो आम लोग खुद को ठगा हुआ महसूस करते हैं।
PoK में पहले भी हुए हैं विरोध के सुर
यह पहली बार नहीं है कि PoK में आतंकियों के खिलाफ आवाज उठी हो। पिछले कुछ वर्षों में वहां कई बार विरोध प्रदर्शन हुए हैं।
- 2022 में मुजफ्फराबाद में बिजली संकट को लेकर बड़ा आंदोलन हुआ।
- 2023 में लश्कर के एक ठिकाने पर ग्रामीणों ने पथराव किया था।
- 2024 में चुनावों के दौरान मतदाता टर्नआउट बहुत कम रहा, जिससे असंतोष झलकता है।
सरकार की प्रतिक्रिया: दबाव में आई ISI?
इस घटना के बाद ISI और पाकिस्तान सरकार पर जबरदस्त दबाव बना है। उन्हें समझ में आ रहा है कि अब डर के सहारे PoK में शासन चलाना मुश्किल होता जा रहा है। सूत्र बताते हैं कि कई आतंकी कमांडरों को फिलहाल LoC से दूर स्थानांतरित किया जा रहा है।
क्या यह बदलाव स्थायी है?
यह सवाल सबसे अहम है। क्या यह विरोध एक क्षणिक भाव है या यह कोई स्थायी सामाजिक क्रांति बनने वाला है?
राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि:
- अगर PoK की जनता को सही नेतृत्व मिले और उनकी आवाज सुनी जाए तो यह विरोध स्थायी हो सकता है।
- भारत को चाहिए कि वह इन आवाज़ों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर और मुखर करे।
- पाकिस्तान के भीतर भी यदि नागरिक समाज इस दिशा में साथ आता है तो आतंकवाद को कमजोर किया जा सकता है।
निष्कर्ष: PoK में शुरू हुआ एक नया अध्याय
गांव वालों द्वारा लश्कर कमांडर की पिटाई कोई साधारण घटना नहीं है। यह PoK में बदलते जनमत और मानसिकता का प्रतीक है। ये सिर्फ एक कमांडर की हार नहीं, बल्कि आतंक के उस तंत्र की हार है जो वर्षों से मासूम जिंदगियों को मोहरा बना रहा था।
अब जब लोग सवाल पूछ रहे हैं, जवाब मांग रहे हैं, और प्रतिरोध कर रहे हैं—तो यह कहना गलत नहीं होगा कि PoK में एक नई शुरुआत हो चुकी है। एक ऐसी शुरुआत जो शायद आने वाले समय में पूरे क्षेत्र के लिए बदलाव की राह खोलेगी।















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