भूमिका
भारत के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ का अचानक दिया गया इस्तीफा राजनीतिक गलियारों में चर्चा का प्रमुख विषय बना हुआ है। एक ओर उन्होंने स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए पद से हटने की बात कही है, वहीं दूसरी ओर विपक्ष से लेकर सत्तापक्ष तक, सब इस निर्णय को लेकर हैरान हैं। महज 12 दिन पहले उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में आयोजित एक कार्यक्रम में साफ तौर पर कहा था, “मैं सही समय पर, यानी अगस्त 2027 में रिटायर हो जाऊंगा, जब तक कि कोई ईश्वरीय हस्तक्षेप न हो।” ऐसे में 74 वर्षीय उपराष्ट्रपति का अचानक और चुपचाप दिया गया इस्तीफा महज एक स्वास्थ्य संबंधी निर्णय नहीं लग रहा। आइए, इस पूरे घटनाक्रम को विस्तार से समझते हैं।
1. इस्तीफे की औपचारिकता और समय पर सवाल
धनखड़ का इस्तीफा संसद के मानसून सत्र के पहले ही दिन सामने आया, जब उन्होंने खुद विपक्ष द्वारा भेजे गए एक नोटिस को स्वीकार करते हुए न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा की बर्खास्तगी पर विचार करने की घोषणा की। इसके कुछ ही घंटों बाद उनके इस्तीफे की खबर सामने आई।
इस इस्तीफे के समय ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं:
- अगर स्वास्थ्य कारण इतने गंभीर थे, तो सत्र शुरू होने से पहले इस्तीफा क्यों नहीं दिया गया?
- उपराष्ट्रपति सचिवालय ने उसी दिन शाम 4 बजे एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की जिसमें धनखड़ के जयपुर दौरे की योजना का उल्लेख था – फिर अचानक इस्तीफा क्यों?
इन बातों ने इस पूरे इस्तीफे को एक रहस्यमयी रूप दे दिया है।
2. प्रधानमंत्री की चुप्पी और देरी से प्रतिक्रिया
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जिन्होंने एक समय जगदीप धनखड़ को “किसान पुत्र” और “प्रेरणादायक नेता” बताया था, उनके इस्तीफे के तुरंत बाद कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। करीब 15 घंटे तक सत्ता पक्ष की ओर से कोई औपचारिक बयान नहीं आया। न तो भाजपा के किसी वरिष्ठ मंत्री ने बयान दिया, न ही सोशल मीडिया पर कोई श्रद्धांजलिस्वरूप संदेश दिखाई दिया।
यह ‘रेडियो साइलेंस’ तब और रहस्यमयी लगने लगी जब बाद में पीएम मोदी ने औपचारिक तौर पर एक ट्वीट किया, लेकिन उसमें भी इस्तीफे की गहराई पर कोई संकेत नहीं दिया गया।
3. बिहार चुनावों से जुड़ा संभावित समीकरण
धनखड़ के इस्तीफे को बिहार की आगामी विधानसभा चुनावों से जोड़कर भी देखा जा रहा है।
अटकलें ये कहती हैं कि:
- भाजपा, जो अब तक बिहार में अकेले दम पर सरकार नहीं बना पाई है, अब वहां अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहती है।
- इसके लिए एक संभावित रणनीति यह हो सकती है कि नीतीश कुमार को उपराष्ट्रपति बना दिया जाए।
- नीतीश को उपराष्ट्रपति बनाकर भाजपा न केवल उन्हें सम्मानजनक विदाई देगी, बल्कि जेडीयू के भीतर मची असंतोष की लहर को भी साध पाएगी।
इस अटकल को और बल मिला जब भाजपा विधायक हरीभूषण ठाकुर ने मीडिया से कहा, “अगर नीतीश कुमार को उपराष्ट्रपति बनाया जाए, तो बिहार के लिए यह बहुत अच्छा होगा।”
4. संसद में हुई ‘बदसलूकी’ और संभावित अपमान
पहले दिन के घटनाक्रम को भी धनखड़ के इस्तीफे से जोड़ा जा रहा है।
- उपराष्ट्रपति ने विपक्ष द्वारा भेजे गए न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया।
- इसी दौरान लोकसभा में सरकार अपना प्रस्ताव ला रही थी – जिससे NDA की ‘ब्रैगिंग राइट्स’ यानी राजनीतिक लाभ पर पानी फिर गया।
- इसके बाद उपराष्ट्रपति द्वारा बुलाई गई राज्यसभा की Business Advisory Committee (BAC) की बैठक को भाजपा के वरिष्ठ नेता जेपी नड्डा और कानून मंत्री किरेन रिजिजू ने नजरअंदाज कर दिया।
कांग्रेस ने इसे सीधे-सीधे “उपराष्ट्रपति का अपमान” बताया। नड्डा ने राज्यसभा में उपराष्ट्रपति की ओर इशारा करते हुए कहा, “रिकॉर्ड में कुछ नहीं जाएगा, सिर्फ़ मेरी बात रिकॉर्ड में जाएगी।”
हालांकि, नड्डा ने बाद में कहा कि यह टिप्पणी विपक्ष के लिए थी, पर दृश्य संकेत कुछ और ही कहानी कहते हैं।
5. न्यायपालिका से लगातार टकराव
धनखड़ अपने उपराष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान लगातार न्यायपालिका की आलोचना करते रहे। उन्होंने खासतौर पर राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) को सुप्रीम कोर्ट द्वारा रद्द किए जाने की तीखी आलोचना की थी।
उनकी प्रमुख टिप्पणियाँ थीं:
- “न्यायपालिका सीमाएं लांघ रही है”
- “लोकतंत्र में न्यायपालिका का अति-सक्रिय होना खतरनाक संकेत है”
- “न्यायपालिका को संविधान की मर्यादा में रहकर काम करना चाहिए”
धनखड़ की इस तेवरभरी शैली से सरकार खुद को कई बार असहज महसूस करती थी। उनके विचारों को सरकार का विचार मान लिया जाता था, जिससे भाजपा को विपक्ष की आलोचना झेलनी पड़ती थी।
6. विपक्ष के साथ लगातार टकराव
धनखड़ का कार्यकाल एक टकराव भरे दौर के रूप में याद किया जाएगा। राज्यसभा में विपक्षी नेताओं के साथ उनका बार-बार वाकयुद्ध हुआ।
- विपक्ष ने उन पर पक्षपात का आरोप लगाया।
- एक बार तो विपक्षी सांसदों ने उनके “इंपीचमेंट” (महाभियोग) की भी मांग की थी।
- कई बार उन्होंने राज्यसभा में विपक्ष के माइक बंद करवाए, या उन्हें सदन से बाहर निकलवाया।
इन सब घटनाओं ने उनकी भूमिका को एक निष्पक्ष सभापति के बजाय, सरकार के प्रवक्ता जैसा बना दिया – यह धारणा विपक्ष के साथ-साथ राजनीतिक विश्लेषकों में भी बनी।
7. NDTV इंटरव्यू और अन्य विवाद
धनखड़ का एक NDTV इंटरव्यू, जिसमें उन्होंने “न्यायपालिका में जवाबदेही लाने” की बात कही थी, खूब सुर्खियों में रहा। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट को “लोकतंत्र के ऊपर लोकतंत्र” बताने पर भी आलोचना झेली थी।
विपक्ष ने इस बयान को संविधान के “तीन स्तंभों की मर्यादा” पर हमला माना।
8. NDA की नई रणनीति: युवाओं, महिलाओं और क्षेत्रीय नेताओं को आगे बढ़ाना
भाजपा के रणनीतिकार अब धीरे-धीरे नई पीढ़ी के नेताओं, महिलाओं और क्षेत्रीय चेहरों को राष्ट्रीय राजनीति में उभार रहे हैं।
- राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का चुनाव इसी रणनीति का हिस्सा था।
- अब एक नया चेहरा उपराष्ट्रपति के तौर पर लाकर भाजपा:
- एक नया ‘नरेटिव’ बना सकती है
- विपक्ष की आलोचना को शांत कर सकती है
- और 2026-2029 की चुनावी रणनीति को मजबूत कर सकती है
9. क्या ये सिर्फ़ स्वास्थ्य कारण हैं?
धनखड़ के इस्तीफे की जो वजह बताई गई – “स्वास्थ्य संबंधी समस्या” – वो पूरी तरह से खारिज नहीं की जा सकती।
- इस वर्ष की शुरुआत में उन्हें कार्डियक इश्यूज के कारण इलाज करवाना पड़ा था।
- लंबे समय तक लगातार बैठकों और तनावपूर्ण कार्यशैली ने उनकी स्वास्थ्य स्थिति को प्रभावित किया हो – यह संभव है।
लेकिन अगर केवल यही वजह होती, तो पारदर्शिता और औपचारिक प्रेस कांफ्रेंस के साथ इस्तीफा दिया जाता। सत्र के पहले दिन और जयपुर यात्रा की योजना के बीच में किया गया यह निर्णय और भी संदेहास्पद बन जाता है।
10. निष्कर्ष: राजनीति की परतें और संकेत
कांग्रेस सांसद सुखदेव भगत ने ठीक ही कहा, “राजनीति में सब कुछ सीधा नहीं होता।”
धनखड़ का इस्तीफा भी भारतीय राजनीति की उन्हीं उलझी हुई परतों का हिस्सा लगता है।
- यह संभावित अपमान का नतीजा हो सकता है,
- यह बिहार चुनावों की सियासी बिसात का मोहरा भी हो सकता है,
- या फिर पार्टी के भीतर सत्ता के केंद्र में बदलाव का संकेत भी हो सकता है।
पर यह तो तय है कि यह इस्तीफा केवल स्वास्थ्य कारणों से प्रेरित नहीं है। इसके पीछे राजनीति है – और वह राजनीति भारतीय लोकतंत्र के आगामी अध्याय की भूमिका तय कर सकती है।
संभावित परिणाम और आगे की राह
- यदि नीतीश कुमार उपराष्ट्रपति बनते हैं: बिहार की राजनीति में भूचाल आ सकता है, जेडीयू में नेतृत्व परिवर्तन होगा।
- यदि कोई युवा चेहरा सामने आता है: भाजपा का “नया भारत” विज़न और मजबूत होगा।
- यदि कांग्रेस या विपक्षी गठबंधन किसी वरिष्ठ नेता को नामित करता है: 2026 में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव की दिशा तय हो सकती है।
जगदीप धनखड़ अब भले ही संवैधानिक पद पर न हों, लेकिन उनके इस्तीफे ने भारतीय राजनीति को कई संकेत और संभावनाएं दे दी हैं। आगे क्या होगा, ये आने वाला समय बताएगा – लेकिन फिलहाल, उपराष्ट्रपति पद एक बार फिर भारतीय लोकतंत्र का केंद्रबिंदु बन गया है।















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