भारत-पाकिस्तान संबंधों के एक बेहद संवेदनशील और रणनीतिक पहलू—सिंधु जल संधि—को लेकर अब भारत का रुख और अधिक सख्त होता दिखाई दे रहा है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने टाइम्स ऑफ इंडिया को दिए एक साक्षात्कार में स्पष्ट कर दिया है कि यह संधि अब बहाल नहीं की जाएगी। शाह ने साफ-साफ कहा, “नहीं, इसे कभी बहाल नहीं किया जाएगा। हम नहर बनाकर पाकिस्तान की ओर बहने वाले पानी को राजस्थान की ओर मोड़ देंगे। पाकिस्तान को वह पानी नहीं मिलेगा जो उसे अनुचित तरीके से मिल रहा है।”
सिंधु जल संधि: अब तक की पृष्ठभूमि
सिंधु जल संधि 1960 में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल अय्यूब खान के बीच हस्ताक्षरित एक अंतरराष्ट्रीय समझौता है, जिसकी मध्यस्थता विश्व बैंक ने की थी। इस संधि के तहत भारत ने तीन पूर्वी नदियों—रावी, ब्यास और सतलज—का पूर्ण नियंत्रण अपने पास रखा, जबकि तीन पश्चिमी नदियों—झेलम, चिनाब और सिंधु—का उपयोग पाकिस्तान को देने का निर्णय किया गया, हालांकि भारत को इन पर सीमित गैर-उपभोग अधिकार (जैसे सिंचाई, पनबिजली उत्पादन) प्राप्त रहे।
क्यों हुआ निलंबन?
22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में एक आत्मघाती हमले में 26 निर्दोष नागरिकों की मौत के बाद भारत सरकार ने इस संधि को ‘स्थगित’ कर दिया। भारत का कहना है कि सीमा पार आतंकवाद के लिए पाकिस्तान की ज़िम्मेदारी तय है और ऐसे हालात में विश्वास आधारित किसी भी समझौते को जारी रखना संभव नहीं है।
गृह मंत्री शाह ने अपने बयान में स्पष्ट कर दिया कि भारत अब “बातचीत और आतंकवाद एक साथ नहीं” की नीति पर दृढ़ है। यह नीति भारत ने 2016 उरी हमले और 2019 पुलवामा हमले के बाद भी अपनाई थी।
पाकिस्तान का विरोध और बार-बार अपील
पाकिस्तान इस निर्णय से बौखलाया हुआ है। वहां के जल संसाधन सचिव सैयद अली मुर्तजा ने भारत सरकार को अब तक कम से कम चार पत्र लिखे हैं, जिनमें भारत से सिंधु जल संधि को बहाल करने की मांग की गई है। पाकिस्तान का कहना है कि संधि का कोई भी एकतरफा निलंबन अंतरराष्ट्रीय संधियों के उल्लंघन के दायरे में आता है।
इस्लामाबाद ने इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाने की भी कोशिश की है, लेकिन अब तक उसे भारत की ओर से कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली।
भारत का जवाब: आतंकवाद के साथ संधि संभव नहीं
भारत ने पाकिस्तान को 24 अप्रैल को संधि के स्थगन की औपचारिक सूचना दे दी थी। जल संसाधन सचिव देबाश्री मुखर्जी ने अपने पत्र में लिखा—
“किसी संधि का सम्मान सद्भावनापूर्वक करने का दायित्व उस संधि के लिए मौलिक है। लेकिन पाकिस्तान की ओर से जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद को लगातार समर्थन देना इस संधि की आत्मा के खिलाफ है।”
भारत का कहना है कि पाकिस्तान एक ओर तो भारत से जल साझा करने की बात करता है, वहीं दूसरी ओर वह उन्हीं क्षेत्रों में आतंकवाद को पोषित करता है जहां से ये नदियाँ बहती हैं।
रणनीतिक संकेत: राजस्थान की ओर पानी मोड़ने की योजना
गृह मंत्री शाह का यह बयान—कि पानी को राजस्थान की ओर मोड़ा जाएगा—इस बात का संकेत है कि भारत अब पश्चिमी नदियों के उपयोग के अपने अधिकारों को अधिक सक्रिय रूप से लागू करेगा। इसका मतलब है कि भारत:
- नहरों और जल भंडारण परियोजनाओं का निर्माण तेज़ी से करेगा।
- झेलम और चिनाब जैसी नदियों पर पनबिजली परियोजनाएं विकसित करेगा।
- पाकिस्तान को बहने वाले अनयूज्ड पानी को सीमित करने की रणनीति पर आगे बढ़ेगा।
क्या सिंधु जल संधि अब इतिहास बनने जा रही है?
इस सवाल का जवाब अब भारत की राजनीतिक इच्छाशक्ति और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर निर्भर करता है। संधि के स्थगन और अमित शाह के दो टूक बयान के बाद, यह तय माना जा सकता है कि मौजूदा स्वरूप में यह संधि अतीत की बात हो चुकी है।
वहीं पाकिस्तान के लिए यह एक बड़ा झटका है। उसकी कृषि अर्थव्यवस्था सिंधु जल पर अत्यधिक निर्भर है। यदि भारत ने भविष्य में पश्चिमी नदियों पर बड़े पैमाने पर जल भंडारण और सिंचाई परियोजनाएं शुरू कीं, तो पाकिस्तान की पानी पर निर्भर खेती और अर्थव्यवस्था को बड़ा नुकसान हो सकता है।
निष्कर्ष: पानी भी अब कूटनीतिक हथियार
जहां पहले सिंधु जल संधि को भारत-पाक संबंधों में स्थायित्व की मिसाल माना जाता था, वहीं अब यह संकट और अविश्वास का केंद्र बनती जा रही है। भारत का सख्त रुख यह स्पष्ट करता है कि अब आतंकवाद को नजरअंदाज कर सौहार्द नहीं निभाया जाएगा।
अमित शाह का बयान इस बात की पुष्टि करता है कि अब पानी भी भारत की कूटनीति का एक ताकतवर औजार बन चुका है। आने वाले दिनों में यह मामला और अधिक अंतरराष्ट्रीय ध्यान खींच सकता है, लेकिन भारत का संदेश साफ है—“आतंकवाद के साथ कोई समझौता नहीं होगा, चाहे वो पानी हो या बातचीत।”
















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