दलाई लामा द्वारा अपने उत्तराधिकारी को लेकर घोषणा किए जाने के एक दिन बाद भारत सरकार ने गुरुवार को स्पष्ट किया कि तिब्बती बौद्ध धर्मगुरु के उत्तराधिकारी का चयन सिर्फ वर्तमान दलाई लामा की इच्छा और पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार ही होगा। यह बयान चीन को स्पष्ट संकेत माना जा रहा है, जो लगातार दावा करता आया है कि दलाई लामा के भविष्य के अवतार को उसकी अनुमति से ही मान्यता दी जाएगी।
भारत ने दिया सख्त संदेश
नई दिल्ली में संवाददाताओं से बात करते हुए केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि दलाई लामा “बौद्ध अनुयायियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण और परिभाषित करने वाला संस्थान” हैं, और उनके उत्तराधिकारी का फैसला उनके द्वारा और स्थापित परंपराओं के अनुसार ही किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा—
“जो भी लोग दलाई लामा को मानते हैं, वे जानते हैं कि उनका अवतार (Incarnation) सिर्फ पारंपरिक प्रक्रिया और स्वयं दलाई लामा की इच्छा के अनुसार ही निर्धारित होता है। किसी और को इस पर निर्णय लेने का अधिकार नहीं है।”
रिजिजू स्वयं भी एक बौद्ध अनुयायी हैं और 6 जुलाई को धर्मशाला में होने वाले दलाई लामा के 90वें जन्मदिन समारोह में भारत सरकार की ओर से भाग लेंगे। उनके साथ केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह भी शामिल होंगे।
दलाई लामा की घोषणा: उत्तराधिकारी का फैसला गदेन फोद्रांग ट्रस्ट करेगा
बुधवार को 14वें दलाई लामा ने औपचारिक रूप से कहा कि उनके उत्तराधिकारी की मान्यता का अधिकार केवल गदेन फोद्रांग ट्रस्ट को होगा, जो उनकी आधिकारिक संस्था है। यह बयान तिब्बती समुदाय और वैश्विक स्तर पर उनके समर्थकों के लिए एक ऐतिहासिक कदम के रूप में देखा जा रहा है। कई तिब्बती इस बात को लेकर आशंकित थे कि भविष्य में उनके पास एक आध्यात्मिक और राजनीतिक नेता नहीं होगा, लेकिन इस घोषणा ने उन शंकाओं को काफी हद तक दूर कर दिया।
दलाई लामा पूर्व में यह कह चुके हैं कि अगर जनभावना यह चाहती है कि यह संस्था (दलाई लामा का संस्थान) आगे भी जारी रहे, तो यह रहेगा। लेकिन अंतिम फैसला उन्हीं के द्वारा और पारंपरिक प्रक्रियाओं से ही होगा।
चीन की आपत्ति और भारत का सीधा संदेश
चीन ने दलाई लामा की घोषणा के तुरंत बाद बयान जारी करते हुए कहा कि भविष्य में दलाई लामा का अवतार तभी मान्य होगा, जब उसे चीन की केंद्रीय सरकार से अनुमति प्राप्त होगी। चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने कहा—
“पुनर्जन्म की प्रक्रिया बीजिंग द्वारा स्वीकृत होनी चाहिए और यह ‘गोल्डन अर्न’ (स्वर्ण कलश) से लॉटरी द्वारा संपन्न की जाएगी।”
यह गोल्डन अर्न बीजिंग के पास रखा गया है, लेकिन दलाई लामा पहले ही इस प्रक्रिया की आध्यात्मिक वैधता पर सवाल उठा चुके हैं। उन्होंने कहा था कि जब इस प्रणाली का दुरुपयोग होता है, तो इसमें कोई भी आध्यात्मिक गुणवत्ता नहीं बचती।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: निर्वासन और तिब्बती संघर्ष
दलाई लामा, जिनका आधिकारिक नाम तेनजिन ग्यात्सो है, को तिब्बती परंपरा के अनुसार दलाई लामा का 14वां अवतार माना जाता है। वे 1959 में ल्हासा में हुए चीनी दमन के बाद हजारों तिब्बतियों के साथ भारत के हिमाचल प्रदेश स्थित धर्मशाला में शरण लेने को मजबूर हुए थे। धर्मशाला आज तिब्बती निर्वासन सरकार और तिब्बती धर्म के वैश्विक केंद्र के रूप में कार्य करता है।
1995 में चीन ने पनचेन लामा (Panchen Lama) के रूप में एक व्यक्ति को मान्यता दी थी, जबकि दलाई लामा द्वारा मान्यता प्राप्त 6 वर्षीय लड़के को गायब कर दिया गया था। मानवाधिकार संगठनों ने इस बच्चे को “दुनिया का सबसे कम उम्र का राजनीतिक कैदी” बताया है।
दलाई लामा की भूमिका और वैश्विक महत्व
दलाई लामा न केवल तिब्बतियों के आध्यात्मिक नेता हैं, बल्कि वे अहिंसा, करुणा और संस्कृतिक पहचान के प्रतीक भी माने जाते हैं। उन्हें 1989 में नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उनकी शिक्षाएं और वैश्विक मंचों पर उनके विचार मानवता, सह-अस्तित्व और सहिष्णुता की भावना को बल देते हैं।
भारत-चीन संबंधों में नया अध्याय?
भारत के इस स्पष्ट रुख को चीन के लिए एक राजनयिक झटका माना जा रहा है। भारत ने पहली बार इतनी मुखरता से यह कहा है कि दलाई लामा के उत्तराधिकारी पर निर्णय का अधिकार सिर्फ उन्हें और उनकी परंपरा को है, न कि किसी राजनीतिक सत्ता को।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह बयान केवल धार्मिक मुद्दा नहीं, बल्कि चीन की धार्मिक और सांस्कृतिक दखलअंदाजी के खिलाफ एक कड़ा रुख है। भारत का यह रुख चीन द्वारा बार-बार लद्दाख सीमा पर की जा रही घुसपैठ और तिब्बती संस्कृति पर हो रहे दमन के विरुद्ध एक कूटनीतिक संकेत भी है।
निष्कर्ष
दलाई लामा के उत्तराधिकारी को लेकर भारत सरकार की सख्त और स्पष्ट प्रतिक्रिया ने यह साबित कर दिया है कि धार्मिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रता के मामले में भारत चीन की तरह दखलअंदाजी नहीं करता, बल्कि परंपराओं और आत्मनिर्णय के सिद्धांतों को मान्यता देता है।
दलाई लामा की यह घोषणा और भारत का समर्थन न केवल तिब्बती समुदाय के लिए बल देने वाला है, बल्कि यह वैश्विक मंच पर भारत को धार्मिक स्वतंत्रता और अंतरराष्ट्रीय नैतिकता का पक्षधर भी बनाता है। आने वाले वर्षों में यह मुद्दा और गहराता दिखाई दे सकता है, विशेषकर जब 14वें दलाई लामा उम्र के अंतिम चरण में हैं और चीन अपनी दखलअंदाजी और मजबूत करने की कोशिश करेगा।v
















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