ईरान और इज़राइल के बीच सैन्य संघर्ष ने जहां वैश्विक कूटनीति और सुरक्षा को चुनौती दी है, वहीं इसके सबसे संवेदनशील शिकार वे छात्र बन रहे हैं जो पढ़ाई के लिए अपने देश से हजारों किलोमीटर दूर ईरान में हैं। ईरान के विभिन्न शहरों, खासकर राजधानी तेहरान में रह रहे सैकड़ों भारतीय मेडिकल छात्र आज डरे हुए, बेसहारा और अपने वतन वापसी की गुहार लगा रहे हैं।
🔺 “धमाकों की आवाज़ से नींद टूटी, बेसमेंट में भागे”
तेहरान में स्थित शहीद बेहेश्ती विश्वविद्यालय के एमबीबीएस तृतीय वर्ष के छात्र इम्तिसाल मोहिदीन ने बताया कि 2:30 बजे रात को वह तेज धमाकों की आवाज़ सुनकर जागे और तुरंत जान बचाने के लिए बेसमेंट की ओर भागे। उनके अनुसार तब से छात्र सो भी नहीं पाए हैं।
मोहिदीन जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा ज़िले के हंदवाड़ा से हैं और 350 से ज़्यादा भारतीय छात्रों के साथ उसी विश्वविद्यालय में पढ़ाई कर रहे हैं। विश्वविद्यालय प्रशासन ने सुरक्षा स्थिति को देखते हुए कक्षाएं भी स्थगित कर दी हैं।
वह बताते हैं,
“हम अपने अपार्टमेंट के बेसमेंट में फंसे हुए हैं। एक धमाका तो महज 5 किलोमीटर दूर हुआ था। डर के कारण हम तीन रातों से सो भी नहीं सके।”
यह स्थिति सिर्फ राजधानी तक सीमित नहीं है।
🔺 केरमान, शीराज़, और अन्य शहरों में भी डर का माहौल
केरमान यूनिवर्सिटी ऑफ मेडिकल साइंसेज में एमबीबीएस प्रथम वर्ष के छात्र फैजान नबी बताते हैं कि अपेक्षाकृत सुरक्षित माने जाने वाले क्षेत्रों में भी हालात भयावह होते जा रहे हैं।
वे कहते हैं,
“हमने आज अपने शहर में गोलियों की आवाज़ सुनी। हमें 3-4 दिन के लिए पीने का पानी स्टोर करने की सलाह दी गई है। हालात वाकई में बुरे हैं।”
फैजान श्रीनगर से हैं। वे बताते हैं कि उनके माता-पिता दिन में 10 बार कॉल करते हैं। लेकिन इंटरनेट इतना धीमा है कि उन्हें जल्दी से एक व्हाट्सएप मैसेज भेजना भी मुश्किल हो जाता है।
“हम डॉक्टर बनने के लिए आए थे… अब सिर्फ जिंदा रहने की कोशिश कर रहे हैं।”
🔺 “विस्फोट सिर्फ कुछ किलोमीटर दूर हुए थे”
ईरान यूनिवर्सिटी ऑफ मेडिकल साइंस, तेहरान में एमबीबीएस के चौथे वर्ष के छात्र मिदहत, जो कि जम्मू-कश्मीर के सोपोर से हैं, बताते हैं कि संघर्ष की पहली रात सबसे भयावह थी।
“विस्फोट ज़्यादा दूर नहीं थे—बस कुछ किलोमीटर दूर। हम घबरा गए थे। परिवार लगातार हालचाल पूछ रहा है। हम हर खबर पर नज़र गड़ाए हुए हैं।”
छात्रों के मुताबिक, विश्वविद्यालयों द्वारा उन्हें पर्याप्त सहायता नहीं दी जा रही है। अधिकतर छात्र दूतावास द्वारा भेजे जा रहे संदेशों और सुरक्षा सलाह पर ही निर्भर हैं।
🔺 निकासी की मांग और भारत सरकार से उम्मीद
ईरान में भारतीय दूतावास ने सुरक्षा को लेकर हेल्पलाइन नंबर और दिशा-निर्देश साझा किए हैं और नागरिकों से घर के अंदर रहने की अपील की है। हालांकि, छात्रों का कहना है कि स्थिति दिन-प्रतिदिन और भयावह होती जा रही है, और अब केवल परामर्श पर्याप्त नहीं है।
मोहिदीन कहते हैं:
“दूतावास लगातार संपर्क में है, लेकिन हमें निकालने की कोई स्पष्ट योजना अब तक नहीं मिली है। हम अनुरोध करते हैं कि सरकार जल्द से जल्द हम सभी को सुरक्षित भारत वापस लाए।”
छात्रों का सबसे बड़ा डर यह है कि ईरान का हवाई क्षेत्र अस्थिर बना हुआ है। कई फ्लाइटें रद्द हो चुकी हैं और ऐसे में वे नहीं जानते कि वे कब और कैसे वापसी कर पाएंगे।
🔺 सरकार के लिए चुनौती: ऑपरेशन ‘गंगा’ की याद
इस संकट की स्थिति में भारतीय सरकार पर फिर से वैसा ही व्यापक राहत अभियान चलाने का दबाव है, जैसा कि उसने रूस-यूक्रेन युद्ध के समय ऑपरेशन ‘गंगा’ के तहत किया था।
उस समय हजारों भारतीय छात्रों को युद्धग्रस्त यूक्रेन से सुरक्षित निकाला गया था। अब ऐसे ही प्रयासों की उम्मीद ईरान में फंसे छात्र और उनके परिजन कर रहे हैं।
🔺 परिजन की चिंता: “हर कॉल दिल की धड़कन बढ़ा देता है”
छात्रों के माता-पिता भारत में बेहद चिंतित हैं। दिनभर टीवी और इंटरनेट पर ईरान की खबरें देखते हैं। किसी भी विस्फोट या हमले की खबर दिल दहला देती है।
हंदवाड़ा निवासी एक माता-पिता ने स्थानीय मीडिया से कहा,
“हमने अपने बच्चे को डॉक्टर बनाने का सपना देखा था, अब वह कहता है कि वह जीना चाहता है। सरकार से बस यही गुहार है कि उसे और बाकी छात्रों को सुरक्षित निकाल लिया जाए।”
🔺 निष्कर्ष: यह सिर्फ एक संघर्ष नहीं, एक पीढ़ी का संकट है
ईरान-इज़राइल संघर्ष अब एक अंतरराष्ट्रीय सैन्य विवाद बन चुका है, लेकिन इसका सबसे खतरनाक असर उन लोगों पर हो रहा है जिनका इससे कोई लेना-देना नहीं—जैसे ये भारतीय छात्र।
ये छात्र भारत के भविष्य के डॉक्टर हैं, जिन्होंने अपने सपनों के लिए घर छोड़ा था, लेकिन आज अपने ही अपार्टमेंट के बेसमेंट में शरण लिए हर रात धमाकों की आवाज़ के बीच नींद की तलाश कर रहे हैं।
अब समय है कि भारत सरकार तेज़ और निर्णायक कदम उठाए—जैसे वह यूक्रेन युद्ध के दौरान उठा चुकी है। यदि जल्द प्रयास नहीं हुए, तो यह संकट और गंभीर हो सकता है।
इन बच्चों को डॉक्टर बनने से पहले ज़िंदा रहना है—और यह भारत की ज़िम्मेदारी है।
















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