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खबर का शिकार

भारत, SCO और इज़राइल-ईरान संघर्ष: एक संतुलनकारी कूटनीति

India, SCO and the Israel-Iran conflict: A balancing diplomacy

1. भूमिका

भारत ने हाल ही में ईरान पर इज़राइल के हमलों की शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की निंदा से खुद को अलग कर लिया है। यह कदम ऐसे समय पर आया है जब पश्चिम एशिया में ईरान-इज़राइल संघर्ष अपने चरम पर है और वैश्विक शांति को खतरा पैदा कर रहा है। भारत का यह निर्णय SCO के भीतर संभावित मतभेदों की ओर इशारा करता है और साथ ही उसके रणनीतिक हितों की भी झलक देता है।

2. संघर्ष की पृष्ठभूमि

शुक्रवार को शुरू हुए संघर्ष के नए दौर में इज़राइल ने ईरान के सैन्य और परमाणु ठिकानों पर हमले किए, जिसके जवाब में तेहरान ने इज़राइल के प्रमुख शहरों पर सैकड़ों मिसाइलें और ड्रोन दागे। इन हमलों में ईरान में 80 से अधिक लोगों की मौत हुई, जिनमें IRGC के कमांडर और परमाणु वैज्ञानिक भी शामिल हैं। इज़राइल में भी इन हमलों से 13 लोगों की मौत हुई। इस घातक टकराव के बीच शनिवार को SCO ने इज़राइल की कार्रवाइयों की तीखी निंदा की और इन्हें अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र चार्टर का उल्लंघन बताया। लेकिन भारत ने इस बयान का समर्थन नहीं किया।

3. SCO का बयान और भारत की दूरी

SCO, जो एक प्रभावशाली यूरेशियन राजनीतिक और सुरक्षा ब्लॉक है, में भारत के साथ-साथ चीन, रूस, ईरान, पाकिस्तान और अन्य मध्य एशियाई देश शामिल हैं। ईरान हाल ही में भारत की अध्यक्षता में इस संगठन में शामिल हुआ था। वर्तमान में SCO की अध्यक्षता चीन के पास है, और उसी की अगुवाई में यह बयान जारी किया गया था। इसमें इज़राइल पर नागरिक क्षेत्रों और बुनियादी ढांचे को निशाना बनाने का आरोप लगाते हुए ईरान की संप्रभुता का उल्लंघन कहा गया।

भारत का इस बयान से खुद को अलग रखना कोई साधारण कूटनीतिक कदम नहीं है। भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने हाल ही में ईरानी समकक्ष से बात कर दोनों पक्षों से संयम बरतने और कूटनीति की वापसी का आह्वान किया था। भारत ने अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि वह स्थिति पर “गंभीरता से नज़र” रख रहा है और सभी पक्षों से बातचीत के मौजूदा चैनलों का इस्तेमाल करने की अपील करता है।

4. भारत की रणनीतिक मजबूरियाँ

भारत के इस तटस्थ रुख की जड़ें उसके रणनीतिक हितों में छिपी हैं। भारत एक ओर जहां इज़राइल का सबसे बड़ा रक्षा ग्राहक है, वहीं दूसरी ओर वह ईरान के चाबहार बंदरगाह के ज़रिए मध्य एशिया और अफगानिस्तान तक व्यापारिक पहुंच बनाना चाहता है। 2024 में भारत की हथियार कंपनियों ने गाज़ा युद्ध के दौरान इज़राइल को गोला-बारूद की आपूर्ति भी की थी।

यूएस के यूनिवर्सिटी ऑफ मैसाचुसेट्स-एमहर्स्ट की वरिष्ठ रिसर्च फेलो शांति डिसूजा के अनुसार, भारत की स्थिति बहुत संवेदनशील है क्योंकि वह दोनों देशों के साथ संबंध बनाए रखना चाहता है। उन्होंने कहा कि भारत इज़राइल और ईरान के बीच इस ताजा संघर्ष में एक नाज़ुक संतुलन बनाए हुए है।

5. कूटनीतिक संतुलन और आलोचना

SCO के बयान में भाग न लेने के भारत के निर्णय से यह भी संकेत मिलता है कि वह किसी एक पक्ष का समर्थन करने से बचना चाहता है। दक्षिण एशिया मामलों के विशेषज्ञ माइकल कुगेलमैन के अनुसार, यह रुख भारत-इज़राइल संबंधों के जटिल पहलुओं को उजागर करता है। उन्होंने यह भी कहा कि चूंकि ईरान अब SCO का सदस्य है, इसलिए संगठन की नीतियों में भारत का प्रभाव पहले की तुलना में थोड़ा कम हो सकता है।

भारत की यह रणनीति उसके पुराने सिद्धांत ‘गुटनिरपेक्षता’ से प्रेरित लगती है, लेकिन आज के वैश्विक परिदृश्य में इसे ‘मल्टी-अलायंस बैलेंस’ कहा जा सकता है। भारत ऐसे समय में जब दुनिया दो ध्रुवों में बंटी दिख रही है, अपने हितों की रक्षा करते हुए हर पक्ष से रिश्ते बनाए रखने की कोशिश कर रहा है।

6.निष्कर्ष

इस मामले में भारत का उद्देश्य स्पष्ट है: वह ना तो अपने इज़राइल से रक्षा समझौतों को खतरे में डालना चाहता है और ना ही ईरान जैसे पड़ोसी और तेल-संपन्न देश से व्यापारिक और रणनीतिक संबंधों को बिगाड़ना चाहता है। यह स्थिति भारतीय कूटनीति की उस परिपक्वता को दर्शाती है जिसमें वह अंतरराष्ट्रीय दबावों के बावजूद अपने हितों की रक्षा करना जानता है।

हालांकि भारत के इस संतुलनकारी दृष्टिकोण को कुछ आलोचकों द्वारा ‘सुविधाजनक तटस्थता’ के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन वैश्विक शक्ति समीकरणों में इस तरह की रणनीति ही उसे दीर्घकालिक लाभ पहुंचा सकती है। विशेष रूप से उस स्थिति में जब भारत खुद को एक वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है।

SCO में भारत की यह स्थिति यह भी दिखाती है कि क्षेत्रीय संगठनों के भीतर आम सहमति प्राप्त करना कितना चुनौतीपूर्ण हो सकता है, खासकर तब जब सदस्य देशों के हित एक-दूसरे से टकराते हों।

7. निष्कर्ष की पुनर्पुष्टि

संक्षेप में, भारत ने SCO के बयान से खुद को अलग करके यह संकेत दिया है कि वह इज़राइल-ईरान विवाद में किसी एक पक्ष का खुला समर्थन नहीं करेगा। इसके पीछे उसकी रक्षा, ऊर्जा और रणनीतिक हितों की मजबूरी है। भारत का यह रुख कूटनीतिक रूप से जोखिमभरा ज़रूर हो सकता है, लेकिन फिलहाल यही उसका सबसे संतुलित रास्ता है।भारत, SCO और इज़राइल-ईरान संघर्ष: एक संतुलनकारी कूटनीति

1. भूमिका

भारत ने हाल ही में ईरान पर इज़राइल के हमलों की शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की निंदा से खुद को अलग कर लिया है। यह कदम ऐसे समय पर आया है जब पश्चिम एशिया में ईरान-इज़राइल संघर्ष अपने चरम पर है और वैश्विक शांति को खतरा पैदा कर रहा है। भारत का यह निर्णय SCO के भीतर संभावित मतभेदों की ओर इशारा करता है और साथ ही उसके रणनीतिक हितों की भी झलक देता है।

2. संघर्ष की पृष्ठभूमि

शुक्रवार को शुरू हुए संघर्ष के नए दौर में इज़राइल ने ईरान के सैन्य और परमाणु ठिकानों पर हमले किए, जिसके जवाब में तेहरान ने इज़राइल के प्रमुख शहरों पर सैकड़ों मिसाइलें और ड्रोन दागे। इन हमलों में ईरान में 80 से अधिक लोगों की मौत हुई, जिनमें IRGC के कमांडर और परमाणु वैज्ञानिक भी शामिल हैं। इज़राइल में भी इन हमलों से 13 लोगों की मौत हुई। इस घातक टकराव के बीच शनिवार को SCO ने इज़राइल की कार्रवाइयों की तीखी निंदा की और इन्हें अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र चार्टर का उल्लंघन बताया। लेकिन भारत ने इस बयान का समर्थन नहीं किया।

3. SCO का बयान और भारत की दूरी

SCO, जो एक प्रभावशाली यूरेशियन राजनीतिक और सुरक्षा ब्लॉक है, में भारत के साथ-साथ चीन, रूस, ईरान, पाकिस्तान और अन्य मध्य एशियाई देश शामिल हैं। ईरान हाल ही में भारत की अध्यक्षता में इस संगठन में शामिल हुआ था। वर्तमान में SCO की अध्यक्षता चीन के पास है, और उसी की अगुवाई में यह बयान जारी किया गया था। इसमें इज़राइल पर नागरिक क्षेत्रों और बुनियादी ढांचे को निशाना बनाने का आरोप लगाते हुए ईरान की संप्रभुता का उल्लंघन कहा गया।

भारत का इस बयान से खुद को अलग रखना कोई साधारण कूटनीतिक कदम नहीं है। भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने हाल ही में ईरानी समकक्ष से बात कर दोनों पक्षों से संयम बरतने और कूटनीति की वापसी का आह्वान किया था। भारत ने अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि वह स्थिति पर “गंभीरता से नज़र” रख रहा है और सभी पक्षों से बातचीत के मौजूदा चैनलों का इस्तेमाल करने की अपील करता है।

4. भारत की रणनीतिक मजबूरियाँ

भारत के इस तटस्थ रुख की जड़ें उसके रणनीतिक हितों में छिपी हैं। भारत एक ओर जहां इज़राइल का सबसे बड़ा रक्षा ग्राहक है, वहीं दूसरी ओर वह ईरान के चाबहार बंदरगाह के ज़रिए मध्य एशिया और अफगानिस्तान तक व्यापारिक पहुंच बनाना चाहता है। 2024 में भारत की हथियार कंपनियों ने गाज़ा युद्ध के दौरान इज़राइल को गोला-बारूद की आपूर्ति भी की थी।

यूएस के यूनिवर्सिटी ऑफ मैसाचुसेट्स-एमहर्स्ट की वरिष्ठ रिसर्च फेलो शांति डिसूजा के अनुसार, भारत की स्थिति बहुत संवेदनशील है क्योंकि वह दोनों देशों के साथ संबंध बनाए रखना चाहता है। उन्होंने कहा कि भारत इज़राइल और ईरान के बीच इस ताजा संघर्ष में एक नाज़ुक संतुलन बनाए हुए है।

5. कूटनीतिक संतुलन और आलोचना

SCO के बयान में भाग न लेने के भारत के निर्णय से यह भी संकेत मिलता है कि वह किसी एक पक्ष का समर्थन करने से बचना चाहता है। दक्षिण एशिया मामलों के विशेषज्ञ माइकल कुगेलमैन के अनुसार, यह रुख भारत-इज़राइल संबंधों के जटिल पहलुओं को उजागर करता है। उन्होंने यह भी कहा कि चूंकि ईरान अब SCO का सदस्य है, इसलिए संगठन की नीतियों में भारत का प्रभाव पहले की तुलना में थोड़ा कम हो सकता है।

भारत की यह रणनीति उसके पुराने सिद्धांत ‘गुटनिरपेक्षता’ से प्रेरित लगती है, लेकिन आज के वैश्विक परिदृश्य में इसे ‘मल्टी-अलायंस बैलेंस’ कहा जा सकता है। भारत ऐसे समय में जब दुनिया दो ध्रुवों में बंटी दिख रही है, अपने हितों की रक्षा करते हुए हर पक्ष से रिश्ते बनाए रखने की कोशिश कर रहा है।

6.निष्कर्ष

इस मामले में भारत का उद्देश्य स्पष्ट है: वह ना तो अपने इज़राइल से रक्षा समझौतों को खतरे में डालना चाहता है और ना ही ईरान जैसे पड़ोसी और तेल-संपन्न देश से व्यापारिक और रणनीतिक संबंधों को बिगाड़ना चाहता है। यह स्थिति भारतीय कूटनीति की उस परिपक्वता को दर्शाती है जिसमें वह अंतरराष्ट्रीय दबावों के बावजूद अपने हितों की रक्षा करना जानता है।

हालांकि भारत के इस संतुलनकारी दृष्टिकोण को कुछ आलोचकों द्वारा ‘सुविधाजनक तटस्थता’ के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन वैश्विक शक्ति समीकरणों में इस तरह की रणनीति ही उसे दीर्घकालिक लाभ पहुंचा सकती है। विशेष रूप से उस स्थिति में जब भारत खुद को एक वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है।

SCO में भारत की यह स्थिति यह भी दिखाती है कि क्षेत्रीय संगठनों के भीतर आम सहमति प्राप्त करना कितना चुनौतीपूर्ण हो सकता है, खासकर तब जब सदस्य देशों के हित एक-दूसरे से टकराते हों।

7. निष्कर्ष की पुनर्पुष्टि

संक्षेप में, भारत ने SCO के बयान से खुद को अलग करके यह संकेत दिया है कि वह इज़राइल-ईरान विवाद में किसी एक पक्ष का खुला समर्थन नहीं करेगा। इसके पीछे उसकी रक्षा, ऊर्जा और रणनीतिक हितों की मजबूरी है। भारत का यह रुख कूटनीतिक रूप से जोखिमभरा ज़रूर हो सकता है, लेकिन फिलहाल यही उसका सबसे संतुलित रास्ता है।

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