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दिल्ली हाईकोर्ट ने ‘एक से अधिक यौन अपराध शिकायतों का डेटाबेस’ बनाने की याचिका खारिज की, फैसला पुलिस पर छोड़ा

Delhi High Court rejects plea to create 'database of multiple sexual crime complaints', leaves decision to police
  • मूल मांग
    याचिकाकर्ता, पुरुषवादी (men’s rights activist) शोनी कपूर ने PIL दाखिल कर अदालत से निर्देश माँगे कि संबंधित प्राधिकरण—विशेष रूप से दिल्ली पुलिस—ऐसे व्यक्तियों की सूची बनाएं जिन्होंने एक से अधिक बार यौन अपराध (rape या अन्य समान आरोप) दर्ज कराए हैं। याचिका में सुझाव था की उस सूची में उनकी पहचान (जैसे आधार कार्ड) अनिवार्य रूप से शामिल की जाए ताकि “निष्पक्ष” नागरिकों को सुरक्षा मिल सके और कथित झूठे/दुर्व्यवहारात्मक आरोपों पर रोक लग सके।
    यह PIL पाँच अगस्त 2025 के आसपास सुना गया।

उच्च न्यायालय का रुख और फैसला

  • न्यायालय का दृष्टिकोण
    दिल्ली उच्च न्यायालय की बेंच—मुख्य न्यायाधीश डी. के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तुषार राव गेडेला—ने यह स्पष्ट किया कि यह विषय पुलिस और प्रशासन के अधिकार क्षेत्र का है, और “वे जानते हैं कि policing कैसे करनी है।” अदालत ने कोर्ट निर्देश जारी करने से इनकार करते हुए याचिका को निस्तारित (disposed of) कर दिया, लेकिन साथ ही दिल्ली पुलिस और अन्य प्राधिकरणों को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता का ऑन-एम-रिकॉर्ड हिस्सा (representation) तत्काल और सूझ-बूझ के साथ देखें। अदालत ने इस पर अपनी धारणा या राय नहीं व्यक्त की, बल्कि प्रक्रिया पर ज़ोर दिया।

कानूनी और संवैधानिक विश्लेषण

  1. कॉर्ट का रिमिट (सीमाएं)
    • अदालत स्पष्ट रूप से इस मामले में न्यायिक हस्तक्षेप से दूरी बनाए रखने की जिक्र करती है—जब तक पुलिस या प्रशासन की कार्रवाई में विशेष देरी, बिचौलियापन या असंगति न हो—तब तक यह प्रशासनिक क्षेत्र ही बना रहना चाहिए।
  2. डेटा सुरक्षा और गोपनीयता का जोखिम
    • याचिका में आधार कार्ड जैसी व्यक्तिगत पहचान का उपयोग सुझाया गया था—यह संवैधानिक रूप से उचित नहीं माना जा सकता क्योंकि इससे निजता का उल्लंघन, डेटा दुरुपयोग और लिंग-आधारित भेदभाव का खतरा उत्पन्न हो सकता है।
  3. भ्रष्ट आरोपों और नुकसान का दोहरा पक्ष
    • याचिकाकर्ता ने अदालत को यह तर्क दे कहा कि कई बार आरोप व्यक्तिगत प्रतिकार या ब्लैकमेल के दायरे में आते हैं। लेकिन कानूनी प्रणाली में सभी दर्ज शिकायतों को गंभीरता पूर्वक जांचा जाता है, फिर चाहे कोई व्यक्ति एक या अनेक बार शिकायत करता हो।
  4. भविष्य के लिए प्रशासनिक संभावनाएँ
    • अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि याचिकाकर्ता या किसी नागरिक को लगता है कि पुलिस इस मामले में निष्क्रिय है या प्रभावित हो रही है, तो वह न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है।

समाज और न्याय-प्रणाली के बीच का संतुलन

  • यौन अपराधों का प्रकृति
    यौन अपराध सार्वजनिक चरित्र के होते हैं और इनके प्रति व्यापक संवेदनशीलता होती है, विशेषकर पीड़ित पक्ष की सुरक्षा और प्रतिष्ठा के लिहाज से। ऐसे मामलों में घटनालाई अभी सार्वजनिक पद पर बनाए रखना पीड़ित पर दोहरा आघात हो सकता है।
  • झूठे आरोपों की वास्तविकता
    कुछ विश्लेषणों और अध्ययनों के अनुसार, झूठे यौन अपराध शिकायतों का प्रतिशत बहुत ही कम होता है—लगभग 2 % से भी कम। इसलिए इसे आधार मानकर डेटाबेस बनाना समग्र न्याय-तंत्र के लिए हानिकारक हो सकता है।
  • पुलिसिंग का स्वरूप और प्रशिक्षण
    policing में मूल सिद्धांत होता है—“चरित्र या प्रवृत्ति पर आधारित मूल्यांकन नहीं, बल्कि तथ्य और सबूत आधारित कार्रवाई”। डेटाबेस आधारित निर्णय अप्रवासी या अल्पसंख्यक वर्गों के साथ भेदभावपूर्ण पुलिसिंग को जन्म दे सकते हैं।

संभावित विवाद और आलोचना

  • लिंग-आधारित भेदभाव
    केवल महिलाओं पर केंद्रित डेटाबेस प्रस्ताव से, अदालत ने एक पुरुषवादी एजेंडा के रूप में तुलना की जा सकती है—इससे समाज में और अधिक विभाजन पैदा हो सकता है।
  • डेटा गोपनीयता एवं सुरक्षा चिंता
    आधार जैसी संवेदनशील पहचान की जानकारी को साझा करने से डेटा लीक, आईडी चोरी, यौन अतिक्रमण के आरोपों का गलत तरीके से इस्तेमाल आदि खतरों की संभावना बढ़ती है।

निष्कर्ष

  • दिल्ली उच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट और संतुलित फैसला दिया है कि अगर कोई याचिकाकर्ता चाहता है कि प्रशासनिक तंत्र (पुलिस, सरकार) किसी मामले को देखें, तो वह पहले प्रशासन से संपर्क करे; अदालत का द्वार तब खुला रहेगा जब प्रशासन की प्रतिक्रिया अनुचित, धीमी या पक्षपाती हो।
  • याचिका का प्राथमिक तर्क—”एक से अधिक यौन अपराध केस दर्ज कराने वाली महिलाओं का डेटाबेस”—संविधान के दृष्टिकोण से और पुलिसिंग के व्यावहारिक सिद्धांतों से मेल नहीं खाता।
  • अदालत ने विधिक दृष्टि से मामलों को संवेदनशीलता और समावेशी न्याय-भाव से संभालने की मार्गदर्शिका दी है, न कि बाहरी दृष्टिकोण से महिलाओं की पहचान को सार्वजनिक या विभागीय रिकॉर्ड में रखने की बात कही है।
  • प्रशासन में ऐसे मामलों की जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए दिल्ली पुलिस को आदेशित किया गया कि याचिका की समीक्षा जल्द से जल्द करें और आवश्यक निर्णय (यदि उचित हो) ले। यह एक संतुलित और समावेशी तरीका दिखाता है जहां न्यायालय विवेकहीन प्रशासनिक हस्तक्षेप से बचता है।

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