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ड्रग्स का डार्क ऐप: ₹100 करोड़ का पर्दाफाश और दिल्ली में विदेशी रैकेट का गढ़

Dark app of drugs: ₹100 crore busted and foreign racket bastion in Delhi

दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने एक सनसनीखेज ऑपरेशन के तहत राजधानी के भीतर काम कर रहे एक बड़े अंतरराष्ट्रीय ड्रग्स रैकेट का भंडाफोड़ किया है। इस कार्रवाई में पुलिस ने करीब 100 करोड़ रुपये मूल्य की ड्रग्स बरामद की है और इस नेटवर्क से जुड़े पांच नाइजीरियाई नागरिकों को गिरफ्तार किया है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इन तस्करों ने ड्रग्स की होम डिलीवरी के लिए फूड डिलीवरी ऐप की तकनीक की हूबहू नकल की थी, जिसमें ग्राहक को रियल टाइम लोकेशन ट्रैकिंग सुविधा दी जाती थी।

शुरुआती सुराग और पुलिस की रणनीति

क्राइम ब्रांच को बीते कुछ हफ्तों से जानकारी मिल रही थी कि दिल्ली-एनसीआर के कुछ पॉश इलाकों में ड्रग्स की होम डिलीवरी का एक नया ट्रेंड सामने आया है। इनपुट्स के मुताबिक, ड्रग्स की सप्लाई बहुत ही प्रोफेशनल ढंग से की जा रही थी, जिससे पुलिस और अन्य एजेंसियों को कोई शक न हो। खासकर, युवाओं और हाई-प्रोफाइल पार्टियों में इनकी मांग तेजी से बढ़ रही थी।

सूचनाओं को गंभीरता से लेते हुए क्राइम ब्रांच ने एक विशेष टीम गठित की। टीम ने डिजिटल ट्रैकिंग, तकनीकी निगरानी और मैनुअल इंटेलिजेंस के जरिये जांच शुरू की।

टेक्नोलॉजी का क्रिमिनल प्रयोग: एक ऐप जो बना ड्रग्स का गेटवे

जांच के दौरान पुलिस को पता चला कि ड्रग्स का पूरा ऑर्डर और डिलीवरी सिस्टम एक विशेष मोबाइल ऐप के जरिए ऑपरेट हो रहा था। यह ऐप प्ले स्टोर या ऐप स्टोर पर नहीं था, बल्कि सीमित सर्किल में एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन के साथ साझा किया जा रहा था।

इस ऐप की सबसे खास बात थी इसमें मौजूद रीयल टाइम ट्रैकिंग फीचर। ग्राहक जब ऑर्डर करता था, तो ऐप पर एक नकली मीनू आता था — जिसमें ‘पैकेज A’ कोकीन के लिए और ‘पैकेज B’ हेरोइन के लिए इस्तेमाल होता था। भुगतान क्रिप्टोकरेंसी या फर्जी यूपीआई आईडी के माध्यम से लिया जाता था।

डिलीवरी ब्वॉय की तरह ड्रग्स डिलीवर करने वाला व्यक्ति बाइक या स्कूटर पर आता और ग्राहक को उसकी लाइव लोकेशन ऐप पर दिखाई जाती थी। ये लोग डिलीवरी यूनिफॉर्म में होते ताकि किसी को शक न हो।

पुलिस की जाल बिछाने की रणनीति

क्राइम ब्रांच ने एक नकली ग्राहक तैयार किया और ऐप के जरिए ऑर्डर प्लेस किया। ऑर्डर की पुष्टि होते ही डिलीवरी एजेंट की रीयल टाइम लोकेशन ट्रैक की गई। इस दौरान पुलिस की दो टीमें पहले से तैयार थीं। जैसे ही डिलीवरी एजेंट लोकेशन पर पहुंचा, उसे रंगेहाथ दबोच लिया गया। पूछताछ और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के आधार पर पुलिस को पूरे नेटवर्क का अंदाजा हुआ।

इसके बाद एक के बाद एक कई जगहों पर छापे मारे गए और पांच नाइजीरियाई नागरिकों को गिरफ्तार किया गया। इनके पास से भारी मात्रा में ड्रग्स — करीब 55 किलो हेरोइन और 30 किलो कोकीन — जब्त की गई।

गिरफ़्तार आरोपी कौन हैं?

गिरफ्तार किए गए आरोपियों की पहचान इस प्रकार हुई:

  1. ओकोरो सैमुएल (38 वर्ष)
  2. चिनेडु एज़े (42 वर्ष)
  3. माइकल ओबिना (35 वर्ष)
  4. जेरी उडो (37 वर्ष)
  5. पॉल न्दुका (33 वर्ष)

ये सभी आरोपी भारत में या तो वीजा एक्सपायरी के बाद अवैध रूप से रह रहे थे या फर्जी पहचान पत्रों का इस्तेमाल कर रहे थे। पुलिस का कहना है कि ये सभी नाइजीरिया से ड्रग्स का आयात करते थे और दिल्ली सहित देश के अन्य हिस्सों में सप्लाई करते थे।

नेटवर्क की गहराई: कौन हैं ग्राहक?

जांच में सामने आया है कि इस नेटवर्क का ग्राहक वर्ग काफी विस्तृत और चौंकाने वाला है। कॉल सेंटर में काम करने वाले युवा, विदेशी छात्र, हाई-प्रोफाइल पार्टी सर्कल्स, और यहां तक कि फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े कुछ नाम भी इस लिस्ट में हैं। दिल्ली, नोएडा, गुरुग्राम, मुंबई और गोवा जैसे शहर इस नेटवर्क के प्रमुख ठिकाने थे।

ड्रग्स की तस्करी कैसे होती थी?

ड्रग्स को भारत लाने के लिए कई अलग-अलग तरीकों का इस्तेमाल किया जा रहा था:

  • नकली इलेक्ट्रॉनिक आइटम्स में छिपाकर एयर कार्गो के जरिए
  • बॉडी पैकिंग के माध्यम से महिलाओं के जरिए
  • कोरियर और पार्सल सेवाओं का उपयोग

पुलिस को इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट से मिले सीसीटीवी फुटेज में कुछ संदिग्ध दिखाई दिए हैं, जिनके जरिए खेप लाई गई थी।

मनी ट्रेल: भुगतान का सिस्टम

भुगतान प्रणाली भी बेहद पेचीदा और डिजिटल थी। ग्राहक या तो बिटकॉइन, ईथरियम, या USDT जैसे क्रिप्टोकरेंसी में भुगतान करते थे, या फिर फर्जी आधार कार्ड से खोले गए यूपीआई अकाउंट्स का इस्तेमाल होता था। कई फर्जी कंपनियों के नाम पर अकाउंट्स खोलकर पैसा सफेद किया जाता था और उसे नाइजीरिया ट्रांसफर कर दिया जाता था।

क्या ये राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा है?

ड्रग्स की इतनी बड़ी खेप, विदेशी नागरिकों की संलिप्तता, और डिजिटल प्लेटफॉर्म का दुरुपयोग — ये सारी चीजें इस मामले को सिर्फ नारकोटिक्स के दायरे तक सीमित नहीं रखतीं, बल्कि इसे एक संभावित राष्ट्रीय सुरक्षा के खतरे में बदल देती हैं।

ऐसी आशंका भी जताई जा रही है कि ड्रग्स के जरिए होने वाला फंडिंग आतंकवादी नेटवर्क्स तक पहुंच सकता है। इसलिए अब इस केस में एनसीबी, ईडी और इंटेलिजेंस ब्यूरो जैसी एजेंसियों की भी जांच शामिल हो सकती है।

आगे की कार्रवाई और कानून

गिरफ्तार आरोपियों पर एनडीपीएस एक्ट के तहत कई गंभीर धाराओं में केस दर्ज किया गया है। साथ ही विदेशी नागरिक होने की वजह से विदेशी अधिनियम और पासपोर्ट अधिनियम के तहत भी मामले दर्ज किए गए हैं। जल्द ही इन सभी को अदालत में पेश किया जाएगा और उनके वीजा स्टेटस की विस्तृत जांच की जाएगी।

निष्कर्ष: सबक और सवाल

दिल्ली में ₹100 करोड़ की ड्रग्स की जब्ती से साफ है कि देश की राजधानी अब न सिर्फ उपभोक्ता है, बल्कि एक बड़ा ऑपरेशनल हब भी बनती जा रही है।

यह मामला कई सवाल छोड़ता है:

  • क्या पुलिस को ऐसे नेटवर्क्स की समय रहते पहचान के लिए तकनीकी संसाधन और ट्रेंनिंग मिल रही है?
  • विदेशी नागरिकों की निगरानी में इतनी ढील क्यों है?
  • और युवाओं को इस लत से बचाने के लिए सरकार और समाज मिलकर क्या कर रहे हैं?

फिलहाल, दिल्ली पुलिस की ये कार्रवाई जरूर सराहनीय है। लेकिन यह भी उतना ही जरूरी है कि इस रैकेट के पीछे की जड़ तक पहुंचा जाए — ताकि एक नई पीढ़ी को नशे के इस जहर से बचाया जा सके।

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