उत्तराखंड के चमोली जिले से एक और गंभीर आपदा की खबर सामने आई है, जिसने एक बार फिर राज्य के पहाड़ी इलाकों में बड़े-बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की सुरक्षा और पर्यावरणीय स्थिरता को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
टीएचडीसी (Tehri Hydro Development Corporation) की निर्माणाधीन जलविद्युत परियोजना की डैम साइट पर भारी भूस्खलन हुआ है। इस दुर्घटना में 12 मजदूर गंभीर रूप से घायल हुए हैं, जबकि परियोजना स्थल पर मौजूद करीब 200 से अधिक मजदूरों की जान खतरे में पड़ गई थी।
घटना ने स्थानीय प्रशासन, राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (NDRF) और कंपनी प्रबंधन को अलर्ट मोड पर ला दिया है। घायलों को हेलिकॉप्टर और सड़क मार्ग से विभिन्न अस्पतालों में भेजा गया है, और राहत कार्य युद्धस्तर पर जारी हैं।
घटना कैसे हुई? आइए जानें मिनट-दर-मिनट अपडेट
➡ सुबह 10:15 बजे:
परियोजना के मुख्य डैम सेक्शन में रोज़ाना की तरह निर्माण कार्य चल रहा था। लगभग 200 मजदूर पहाड़ काटने, कंक्रीट डालने, और मशीनी उपकरणों को संभालने का कार्य कर रहे थे।
➡ अचानक तेज कंपन और मिट्टी गिरने की आवाज़ आई:
स्थानीय मजदूरों के अनुसार, उन्हें पहाड़ के ऊपरी हिस्से से पत्थर गिरने और ज़मीन में कंपन की आवाज़ें सुनाई देने लगीं। पहले मजदूरों को लगा कि यह डाइनामाइट ब्लास्टिंग के कारण हुआ होगा (जो आमतौर पर सुरंग खुदाई में होता है), लेकिन जल्द ही स्थिति स्पष्ट हो गई कि ये एक प्राकृतिक भूस्खलन (Landslide) है।
➡ देखते ही देखते भारी चट्टानें और मिट्टी का मलबा ढह पड़ा:
साइट का एक बड़ा हिस्सा मिट्टी और चट्टानों से ढक गया। 12 मजदूर वहीं दब गए और कई अन्य बाल-बाल बचे।
घायलों की स्थिति: अस्पताल में इलाज जारी, कुछ गंभीर
घायलों में अधिकतर दैनिक वेतन पर कार्यरत प्रवासी श्रमिक हैं जो उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड से आए हैं। सभी को गौचर बेस हॉस्पिटल, जोशीमठ सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, और कुछ को AIIMS ऋषिकेश में रेफर किया गया है।
प्राथमिक जानकारी के अनुसार:
- 4 मजदूरों की हालत गंभीर, हड्डियों में फ्रैक्चर और सिर में चोटें
- 8 को हल्की चोटें, जिनका इलाज प्राथमिक स्तर पर किया जा रहा है
परिवारों को सूचना दे दी गई है। कई परिजन दिल्ली, बनारस और गया से सड़क मार्ग से चमोली पहुंच रहे हैं।
मजदूरों की चीख-पुकार और रेस्क्यू ऑपरेशन
जैसे ही भूस्खलन हुआ, डैम साइट पर हाहाकार मच गया। मजदूर मलबे से खुद को निकालने के लिए संघर्ष करते रहे, और कई अन्य साथी उन्हें निकालने की कोशिश करते रहे।
स्थानीय अधिकारी और कंपनी स्टाफ मौके पर पहुंचे:
- THDC के साइट इंचार्ज ने तुरंत आपदा नियंत्रण केंद्र को अलर्ट भेजा
- SDRF और NDRF की टीमों को सक्रिय किया गया
- भारी मशीनरी से मलबा हटाया गया
रेस्क्यू ऑपरेशन में शामिल रहे:
- 50 से ज्यादा राहत कर्मी
- जेसीबी, क्रेन, मैनुअल टूल्स, और स्निफर डॉग्स
प्रोजेक्ट की पृष्ठभूमि: क्या है THDC का यह डैम प्रोजेक्ट?
THDC India Limited भारत सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार का संयुक्त उपक्रम है जो भारत में प्रमुख जलविद्युत परियोजनाओं के निर्माण में लगी है। चमोली जिले की यह परियोजना विष्णुगढ़ पीपलकोटी जलविद्युत परियोजना (444 मेगावाट) है।
प्रमुख तथ्य:
- परियोजना की लागत: ₹5,500 करोड़ से अधिक
- प्रारंभ: वर्ष 2010 में
- वर्तमान स्थिति: निर्माणाधीन, कई बार देरी हो चुकी है
- उद्देश्य: गंगा की सहायक नदी अलकनंदा पर जलविद्युत उत्पादन
इस परियोजना को कई बार पर्यावरणीय चिंताओं, स्थानीय विरोध और भूस्खलन के जोखिमों की वजह से रोका गया है, लेकिन हाल ही में इसमें तेज़ी लाई गई थी।
क्या यह प्राकृतिक हादसा था या मानवीय लापरवाही?
यह सवाल अब पूरे राज्य में चर्चा का विषय बन गया है।
स्थानीय भू-वैज्ञानिक और पर्यावरण कार्यकर्ता क्या कह रहे हैं?
- डॉ. नरेश पांडे (भूगर्भ वैज्ञानिक, देहरादून विश्वविद्यालय):
“अलकनंदा घाटी में लगातार सुरंग निर्माण, पहाड़ काटने और भारी मशीनों के इस्तेमाल से धरती की सतह अस्थिर हो रही है। ये क्षेत्र भूकंपीय जोन-5 में है जहां इस तरह की परियोजनाएं गंभीर खतरे पैदा करती हैं।” - ग्लेशियर वॉच अलायंस की रिपोर्ट में पहले ही चेतावनी दी गई थी कि THDC की साइट पर मिट्टी के खिसकने की घटनाएं बढ़ रही हैं।
स्थानीय लोगों का आरोप:
- परियोजना के आसपास बिना पर्यावरणीय ऑडिट के ब्लास्टिंग
- मजदूरों के लिए न पर्याप्त सुरक्षा इंतजाम, न ही आपदा प्रशिक्षण
प्रशासनिक प्रतिक्रिया: तुरंत जांच के आदेश
जैसे ही खबर सामने आई, चमोली के जिलाधिकारी हिमांशु खुराना और SDM पीपलकोटी मौके पर पहुंचे।
जारी हुए प्राथमिक आदेश:
- दुर्घटना की मैजिस्ट्रेट जांच के निर्देश
- परियोजना प्रबंधन से पूर्ण घटनाक्रम की रिपोर्ट तलब
- घायलों के परिवारों को आपात राहत राशि ₹50,000 प्रति व्यक्ति देने की घोषणा
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने ट्वीट कर कहा:
“चमोली की घटना अत्यंत दुखद है। घायल मजदूरों के शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की कामना करता हूं। घटना की जांच होगी और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।”
राजनीतिक हलकों में उठा भूचाल
विपक्ष ने इस हादसे को सरकार की “बिना सोच-समझ के विकास परियोजनाओं” की नीति का नतीजा बताया है।
कांग्रेस नेता गणेश गोदियाल ने कहा:
“पैसे और कॉर्पोरेट मुनाफे की अंधी दौड़ में उत्तराखंड के पहाड़ों को छलनी किया जा रहा है। ये हादसे चेतावनी हैं, जिन्हें अनदेखा किया जा रहा है।”
वहीं आम आदमी पार्टी ने भी ट्वीट किया:
“केवल पर्यटन और जलविद्युत के नाम पर विनाशकारी नीतियां लागू हो रही हैं। मजदूर मर रहे हैं, पहाड़ टूट रहे हैं और सरकार सो रही है।”
क्या इस परियोजना को रोका जा सकता है?
यह एक जटिल सवाल है। THDC और सरकार के पास इसका जवाब “नहीं” है, क्योंकि इस परियोजना में पहले ही हजारों करोड़ रुपये का निवेश हो चुका है और यह केंद्र सरकार की राष्ट्रीय बिजली नीति 2023 के तहत “प्राथमिक” प्रोजेक्ट के रूप में चिन्हित है।
परंतु पर्यावरणविदों और स्थानीय जनता के बीच यह मांग तेज़ हो गई है कि परियोजना को “नए सिरे से भूगर्भीय सर्वे” के बिना आगे न बढ़ाया जाए।
मजदूरों की दास्तान: कौन हैं ये 12 घायल?
हमने अस्पताल में जाकर कुछ मजदूरों के परिवारों से बात की। इनमें से अधिकतर लोग झारखंड के गढ़वा, बिहार के औरंगाबाद और उत्तर प्रदेश के बहराइच से आए थे।
एक घायल मजदूर जितेंद्र यादव की पत्नी रोते हुए बोली:
“हर महीने बस 14,000 रुपये मिलते हैं। पति चार महीने पहले ही काम पर आया था। आज अस्पताल में है, पता नहीं वापस कैसे जाएगा।”
एक अन्य घायल पंकज महतो के भाई ने कहा:
“ना हेलमेट दिया गया, ना कोई मास्क, ना ब्लास्टिंग के वक्त दूर रखा गया। सबको बस जल्दी काम खत्म करने की हड़बड़ी थी।”
भविष्य की चुनौतियां और समाधान
इस घटना ने उत्तराखंड की उस त्रासदी की याद दिला दी, जब फरवरी 2021 में ऋषिगंगा नदी में ग्लेशियर फटने से NTPC की परियोजना तबाह हो गई थी और 200 से अधिक लोग मारे गए थे।
क्या अब भी हम नहीं सीखेंगे?
संभावित समाधान:
- हर परियोजना में मासिक भूगर्भीय ऑडिट अनिवार्य हो
- मजदूरों को आपदा प्रशिक्षण और सुरक्षा उपकरण उपलब्ध कराए जाएं
- स्थानीय समुदाय को निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल किया जाए
- निर्माण से पहले और हर 6 महीने में NDMA द्वारा सुरक्षा समीक्षा करवाई जाए
निष्कर्ष: पहाड़ फिर कांपे हैं… और सवाल फिर वही हैं
चमोली की इस ताज़ा त्रासदी ने एक बार फिर हमें ये सोचने पर मजबूर कर दिया है — क्या विकास की यह दौड़ वाकई “सस्टेनेबल” है?
जब हर साल उत्तराखंड में दर्जनों मजदूर निर्माणाधीन सुरंगों, डैम साइट्स और सड़कों में जान गंवा रहे हैं, तो क्या यह विकास या विनाश का मॉडल है?
मजदूरों की चीखें, घायलों की तकलीफ और डरे-सहमे परिजन… यह केवल आंकड़े नहीं, यह उस सिस्टम की तस्वीर है जिसमें इंसानी ज़िंदगियां बजट की फाइलों में खो जाती हैं।















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