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“बीजेपी ने अपने Yes Man को बनाया मुख्य चुनाव आयुक्त”: सौरभ भारद्वाज का बड़ा आरोप, चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर फिर उठे सवाल

"BJP appointed its Yes Man as the Chief Election Commissioner": Saurabh Bhardwaj's big allegation, questions raised again on the impartiality of the Election Commission

चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर एक बार फिर सियासत गरमा गई है। आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता और दिल्ली सरकार में मंत्री सौरभ भारद्वाज ने एक बार फिर केंद्र सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि “बीजेपी सरकार चुनाव आयोग को Yes Man संस्था में तब्दील कर रही है।”

हाल ही में नए मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) की नियुक्ति को लेकर सौरभ भारद्वाज ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा, “रिटायर होने वाले नौकरशाहों को केंद्र सरकार मुख्य चुनाव आयुक्त बना रही है। रिटायरमेंट के बाद इनकी लॉटरी लग जाती है—गाड़ी, बंगला और रुतबा मिल जाता है। और वे हर जगह सरकार की ढोल बजाते हैं।”

यह बयान उस समय आया है जब केंद्र सरकार ने हाल ही में रिटायर हुए वरिष्ठ नौकरशाह श्री विनय सक्सेना को देश का नया मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्त किया है। हालांकि सरकार ने इस नियुक्ति को नियमों के अनुरूप बताया है, लेकिन विपक्षी पार्टियों ने इसे “लोकतंत्र की रीढ़ पर हमला” बताया है।


क्या है मुद्दा? चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया पर उठते सवाल

भारत का चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है, जिसका गठन संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत हुआ है। इसका मुख्य उद्देश्य देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराना है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में आयोग की नियुक्तियों पर गंभीर राजनीतिक सवाल उठते रहे हैं।

सौरभ भारद्वाज का आरोप है कि मोदी सरकार पूर्व नौकरशाहों को रिटायर होते ही CEC बना रही है, जिससे उनकी स्वतंत्रता संदिग्ध हो जाती है। उनका कहना है कि जब कोई अधिकारी सरकार के अधीन काम करते-करते रिटायर होता है, और फिर तुरंत ही संवैधानिक संस्था का प्रमुख बनता है, तो उसके निर्णयों पर निष्पक्षता की छाया पड़ना लाजिमी है।

“आपने रिटायरमेंट से ठीक पहले एक अधिकारी को CEC बना दिया। क्या उसमें इतनी हिम्मत होगी कि वो सत्ताधारी पार्टी को निष्पक्ष रूप से चुनौती दे सके?” – सौरभ भारद्वाज


पृष्ठभूमि: चुनाव आयोग की हालिया नियुक्ति पर विवाद

हाल ही में सरकार ने विनय सक्सेना, जो कि कार्मिक मंत्रालय में सचिव पद से हाल ही में सेवानिवृत्त हुए हैं, को मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्त किया। यह नियुक्ति एक विशेष समिति द्वारा की गई जिसमें प्रधानमंत्री, केंद्रीय गृह मंत्री, और एक विपक्षी नेता होते हैं। लेकिन इस बार विपक्षी नेता को इस चयन प्रक्रिया से “सूचित किए बिना दरकिनार” कर दिए जाने के आरोप भी सामने आए हैं।

कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी कहा कि “हमसे नाम पूछे बिना ही सरकार ने चुनाव आयोग की नियुक्ति कर दी। यह पूरी प्रक्रिया अब एक पक्षीय हो चुकी है।”


चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर पहले भी उठ चुके हैं सवाल

यह पहली बार नहीं है जब चुनाव आयोग की नियुक्ति या कार्यप्रणाली पर सवाल उठे हैं। पिछले कुछ वर्षों में कई ऐसे उदाहरण सामने आए हैं:

1. 2019 का लोकसभा चुनाव

मोदी और शाह के बयानों पर कार्रवाई नहीं करने के लिए आयोग को विपक्ष ने पक्षपाती बताया।

2. दिल्ली विधानसभा चुनाव 2020

आम आदमी पार्टी ने आरोप लगाया कि आयोग ने भाजपा के उम्मीदवारों के खिलाफ शिकायतों पर कार्रवाई नहीं की।

3. बंगाल चुनाव 2021

टीएमसी ने भी आयोग पर भाजपा के एजेंडे पर काम करने का आरोप लगाया।

इन सभी घटनाओं ने आयोग की निष्पक्षता और उसकी “संवैधानिक स्वतंत्रता” पर गहरी बहस छेड़ी है।


विपक्ष का नजरिया: लोकतंत्र पर खतरा

आम आदमी पार्टी, कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का कहना है कि केंद्र सरकार संवैधानिक संस्थाओं को नियंत्रण में लेने की साज़िश कर रही है। सौरभ भारद्वाज ने कहा,

“अब सुप्रीम कोर्ट हो, चुनाव आयोग हो, या सीबीआई—हर जगह रिटायरमेंट की रेवड़ी बांटी जा रही है। जो जितना झुकेगा, उसे उतना ऊंचा पद मिलेगा।”

उनका इशारा यह भी था कि भविष्य में इन अधिकारियों को राज्यपाल या अन्य संवैधानिक पद भी दिए जा सकते हैं—जैसा कि हमने पिछले वर्षों में देखा है।


केंद्र सरकार का पक्ष: ‘नियमों के अनुसार’ नियुक्ति

केंद्र सरकार का कहना है कि चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया संविधान के अनुरूप है, और हर नियुक्ति एक प्रक्रियागत समिति के जरिए की जाती है।

सरकार के करीबी सूत्रों का कहना है कि “सिर्फ इसलिए कि कोई अधिकारी हाल ही में रिटायर हुआ है, इसका मतलब यह नहीं कि उसकी निष्पक्षता पर सवाल उठाया जाए।”

भाजपा प्रवक्ता ने जवाब में कहा:

“आप चुनाव हार जाते हैं तो आयोग पक्षपाती लगता है। अगर जीतते हैं तो आयोग ठीक। यही विपक्ष की राजनीति है।”


क्या सुप्रीम कोर्ट इस पर कुछ कर सकता है?

मार्च 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया था कि CEC और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और CJI (मुख्य न्यायाधीश) की समिति द्वारा होनी चाहिए।

हालांकि, केंद्र सरकार ने इस व्यवस्था को बाद में नए कानून के जरिए पलट दिया, और विपक्षी नेताओं की भूमिका सीमित कर दी।

अब विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला फिर से संवैधानिक पीठ के समक्ष उठाया जा सकता है।


लोकतंत्र में आयोग की भूमिका और निष्पक्षता की अनिवार्यता

भारत जैसे लोकतंत्र में चुनाव आयोग की भूमिका केवल चुनाव कराना भर नहीं है—बल्कि चुनावों में भाग लेने वाले दलों को बराबर का मैदान देना भी उसका कर्तव्य है।

यदि आयोग पर निष्पक्षता का संदेह होने लगे, तो लोकतंत्र की पूरी प्रक्रिया ही संदेह के घेरे में आ जाती है। यही कारण है कि चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं में केवल योग्य नहीं, बल्कि निर्भीक और निष्पक्ष व्यक्तियों की नियुक्ति ज़रूरी होती है।

“संविधान ने चुनाव आयोग को एक ढाल दी है—लेकिन अब वह ढाल छिद्रित होती दिख रही है।” – पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई क़ुरैशी (2022 के बयान में)


जनता का नजरिया: लोकतंत्र बनाम ब्यूरोक्रेसी

सोशल मीडिया और सार्वजनिक बहसों में भी इस मुद्दे को लेकर चिंता है। ट्विटर पर #ElectionCommission ट्रेंड कर रहा है, जिसमें लोग चुनाव आयोग की स्वायत्तता की मांग कर रहे हैं।

कुछ यूजर्स ने लिखा कि,

“अगर मुख्य चुनाव आयुक्त भी ‘पद्म श्री’ के बदले सरकार की तारीफ करेगा, तो फिर चुनाव निष्पक्ष कैसे होंगे?”

दूसरे यूजर्स ने सौरभ भारद्वाज के बयान को “बिना प्रमाण के आरोप” बताया और कहा कि आप पार्टी खुद अपनी राज्य सरकार में अफसरों को राजनीतिक काम में लगा रही है


राजनीतिक विश्लेषण: क्या ये 2026 के लोकसभा चुनावों की भूमिका है?

राजनीतिक पंडितों का मानना है कि 2026 में होने वाले लोकसभा चुनाव से पहले चुनाव आयोग की भूमिका और निष्पक्षता एक बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकती है।

विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि सत्ताधारी पार्टी अपने अनुकूल अफसरों की नियुक्ति के जरिए “नरम प्रशासनिक माहौल” तैयार करना चाहती है।

वरिष्ठ पत्रकार अनुराग त्रिपाठी लिखते हैं,

“इस बार सिर्फ जनता नहीं, बल्कि प्रशासन भी मतदाता बन गया है। हर संस्थान की निष्ठा अब वोट बैंक का हिस्सा बन चुकी है।”


निष्कर्ष: आयोग की प्रतिष्ठा का संकट

सौरभ भारद्वाज का बयान एक सियासी प्रतिक्रिया भर नहीं है—यह देश की संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता को लेकर उठती एक व्यापक बहस का हिस्सा है। जब देश के चुनाव की निगरानी करने वाला सबसे अहम संस्थान ही पक्षपात का आरोप झेले, तो पूरा लोकतांत्रिक ढांचा अस्थिर होता है।

इसलिए ज़रूरत है कि सभी दल, सरकार और न्यायपालिका मिलकर यह सुनिश्चित करें कि चुनाव आयोग की साख, निष्पक्षता और कार्यशैली पर किसी को संदेह करने का मौका न मिले

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