छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बीजापुर जिले से सामने आया ताज़ा मामला एक बार फिर से सुरक्षा बलों और आदिवासी समुदाय के बीच विश्वास के संकट को उजागर कर रहा है। मामला है 35 वर्षीय महेश कुडियम की मौत का, जिसे पुलिस ने माओवादी करार दिया है, जबकि उसके परिजन और ग्रामीणों का दावा है कि वह एक साधारण स्कूल का मिड-डे मील रसोइया था, जिसे फर्जी मुठभेड़ में मार दिया गया।
यह घटना 10 जून को इंद्रावती राष्ट्रीय उद्यान के जंगलों में हुई, जहां पुलिस और सुरक्षा बलों ने माओवादी विरोधी अभियान चलाया। पुलिस का दावा है कि मुठभेड़ में सात माओवादी मारे गए, जिनमें दो वांछित शीर्ष नेता – गौतम उर्फ सुधाकर और भास्कर राव भी शामिल हैं। पुलिस ने कहा कि मारे गए लोगों में से एक की पहचान महेश कुडियम के रूप में हुई है, जो सीपीआई (माओवादी) का सक्रिय सदस्य था। लेकिन इस दावे को न केवल महेश के परिजन, बल्कि स्थानीय ग्रामीण और स्कूल प्रशासन भी सिरे से खारिज कर रहे हैं।
महेश कुडियम: एक साधारण आदिवासी, न कि माओवादी
महेश की पत्नी सुमित्रा कुडियम और गाँव के कई लोगों का कहना है कि महेश का माओवाद से कोई लेना-देना नहीं था। वह एक आदिवासी ग्रामीण था, जो सरकारी स्कूल में रसोइए के रूप में काम करता था और अपने परिवार के सात बच्चों का पालन-पोषण करता था। सुमित्रा ने रोते हुए कहा,
“मेरे पति जंगल में हमारे मवेशियों को ढूंढने गए थे। वह शाम तक नहीं लौटे। अगले दिन पता चला कि उन्हें पकड़ लिया गया और फिर माओवादी बताकर मार दिया गया। वह निर्दोष था। मेरे बच्चे अब पूछते हैं कि उनके पिता कब लौटेंगे। मुझे नहीं पता मैं उन्हें कैसे पालूंगी।”
स्थानीय ग्रामीण इरमा वेलादी ने भी पुष्टि की कि उन्होंने महेश को सुरक्षाकर्मियों के साथ जाते देखा था। “वह निहत्था था, बस अपने मवेशियों को ढूंढ रहा था। उसके बाद पता चला कि उसे माओवादी घोषित करके मार दिया गया।”
महेश के नियोक्ता और सरकारी स्कूल के प्रधानाध्यापक रमेश उप्पल ने भी पुलिस के दावे का खंडन किया। उन्होंने कहा,
“महेश हमारे स्कूल में 2023 से मिड-डे मील रसोइए के रूप में काम कर रहा था। वह हर महीने ₹1,200 वेतन पाता था। अप्रैल 2025 तक वह नियमित रूप से स्कूल आ रहा था।”
इससे साफ है कि महेश एक वैध सरकारी कर्मचारी था, जिसका रिकॉर्ड भी स्कूल के पास दर्ज था। ऐसे में उसे “माओवादी कैडर” करार देना कई सवाल खड़े करता है।
पुलिस की सफाई: ‘खुफिया सूचना पर आधारित कार्रवाई’
दूसरी तरफ, बस्तर रेंज के आईजी सुंदरराज पी. और बीजापुर पुलिस का कहना है कि मुठभेड़ एक विश्वसनीय खुफिया सूचना पर आधारित थी। पुलिस का दावा है कि मुठभेड़ के बाद सात शव बरामद किए गए, जिनमें हथियार, माओवादी साहित्य और अन्य आपत्तिजनक सामग्री भी मिली। उनके मुताबिक, महेश का संबंध सीपीआई (माओवादी) से था और वह इंद्रावती राष्ट्रीय उद्यान क्षेत्र में संगठन की गतिविधियों से जुड़ा था।
पुलिस के बयान में यह भी कहा गया है कि महेश को इरपागुट्टा गांव का निवासी और स्कूल रसोइया सहायक बताया गया है, लेकिन साथ ही यह जोड़ा गया है कि वह स्कूल मैनेजमेंट कमेटी का सदस्य भी था – संभवतः एक माध्यम जिसके जरिए वह संगठन से संपर्क में आया।
आईजी सुंदरराज पी. ने कहा:
“अगर कोई विरोधाभासी तथ्य सामने आते हैं, तो हम निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच के लिए तैयार हैं। लेकिन यह अभियान खुफिया सूचना और स्थानीय स्तर की जानकारी पर आधारित था।”
सवाल जो अभी भी अनुत्तरित हैं
इस मुठभेड़ के बाद कई महत्वपूर्ण सवाल उठते हैं:
- क्या मुठभेड़ से पहले महेश के खिलाफ कोई आपराधिक रिकॉर्ड था?
अभी तक ऐसा कोई रिकॉर्ड सार्वजनिक नहीं हुआ है। - क्या मुठभेड़ की निष्पक्षता की स्वतंत्र जांच होगी?
पुलिस ने “जांच की बात” तो कही है, लेकिन अब तक कोई स्वतंत्र आयोग नहीं बनाया गया। - क्या आदिवासी क्षेत्रों में इस तरह की कार्रवाइयों में नागरिकों को पर्याप्त सुरक्षा दी जाती है?
महेश की मौत ने यह सवाल फिर से खड़ा कर दिया है कि क्या नक्सल प्रभावित इलाकों में “गिल्टी बाय लोकेशन” की सोच से निर्दोष लोग मारे जा रहे हैं?
आदिवासी जनजीवन और पुलिसिया रवैये के बीच गहरी खाई
बस्तर और बीजापुर जैसे क्षेत्र दशकों से माओवादी गतिविधियों और सरकारी कार्रवाई के बीच झूल रहे हैं। एक तरफ माओवादी जनता का “मुक्ति” के नाम पर शोषण करते हैं, वहीं दूसरी ओर सुरक्षा बलों पर फर्जी मुठभेड़ों और निर्दोषों को फंसाने के आरोप भी लगातार लगते रहे हैं।
महेश का मामला न केवल एक परिवार की तबाही की कहानी है, बल्कि यह नक्सल नीति की पारदर्शिता और मानवीय दृष्टिकोण पर भी सवाल उठाता है। क्या हर ग्रामीण, जो जंगल में जाता है, उसे माओवादी मान लेना उचित है?
निष्कर्ष: न्याय, संवेदनशीलता और जवाबदेही की ज़रूरत
महेश कुडियम की मौत चाहे एक मुठभेड़ का हिस्सा रही हो या फर्जी कार्रवाई – दोनों ही स्थितियों में यह मामला न्यायिक और सामाजिक जांच की मांग करता है। यदि वह माओवादी था, तो उसके संबंधों के प्रमाण सार्वजनिक हों। और अगर वह निर्दोष था, तो उसका परिवार केवल मुआवज़े का नहीं, पूर्ण न्याय का हकदार है।
सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि नक्सल क्षेत्रों में कार्रवाई करते समय सुरक्षा बलों को न सिर्फ कानूनी प्रक्रिया का पालन करना चाहिए, बल्कि मानवीय दृष्टिकोण भी बनाए रखना चाहिए। वरना ऐसे मामलों से न केवल निर्दोष लोग मरते हैं, बल्कि राज्य और जनता के बीच भरोसे की अंतिम डोर भी टूट जाती है।
















Leave a Reply