बिहार में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) यानी मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान अब एक बड़े राजनीतिक विवाद का केंद्र बन गया है। कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने 17 जुलाई 2025 को चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि यह प्रक्रिया भाजपा के इशारे पर “मतदाता चोरी” का माध्यम बन गई है। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग को “रंगे हाथों वोट चुराते” पकड़ा गया है।
राहुल गांधी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व में ट्विटर) पर एक पोस्ट शेयर करते हुए पूछा,
“क्या चुनाव आयोग अब भी चुनाव आयोग है या पूरी तरह भाजपा की ‘चुनाव चोरी शाखा’ बन चुका है?”
उन्होंने वरिष्ठ पत्रकार अजीत अंजुम की उस सीरीज़ का भी हवाला दिया जो उनके यूट्यूब चैनल पर SIR अभियान की पड़ताल कर रही है।
क्या है SIR और क्यों हो रहा है बवाल?
बिहार में इस वक्त चल रहा SIR अभियान दरअसल 22 साल बाद राज्य की मतदाता सूची को दुरुस्त करने की एक आधिकारिक प्रक्रिया है। चुनाव आयोग का कहना है कि इस अभियान का उद्देश्य:
- डुप्लीकेट वोटरों को हटाना
- मृतकों और अयोग्य लोगों के नाम हटाना
- 18 वर्ष से ऊपर के पात्र नागरिकों के नाम जोड़ना है
लेकिन विपक्ष का आरोप है कि यह महज़ सफाई नहीं बल्कि एक संगठित साजिश है, जिसके ज़रिए लाखों गरीब, मुस्लिम, दलित और आदिवासी मतदाताओं को चुनावी प्रक्रिया से बाहर किया जा रहा है।
राहुल गांधी के आरोप
राहुल गांधी ने कहा कि चुनाव आयोग का यह कदम “लोकतंत्र की हत्या” है और जो लोग इस प्रक्रिया की सच्चाई को उजागर कर रहे हैं, उन पर ही एफआईआर दर्ज की जा रही है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि:
- “जो वोटर वैध रूप से भारतीय नागरिक हैं, उन्हें भी नागरिकता के प्रमाण की शर्तों के नाम पर लिस्ट से बाहर किया जा रहा है।”
- “यह अभियान भाजपा को फायदा पहुंचाने की मंशा से चलाया जा रहा है।”
अजीत अंजुम और बेगूसराय FIR
राहुल गांधी का यह बयान उस वक्त आया जब पत्रकार अजीत अंजुम पर बिहार के बेगूसराय ज़िले में “सांप्रदायिक तनाव फैलाने” का आरोप लगाते हुए FIR दर्ज की गई। अंजुम ने इन आरोपों से साफ इनकार किया और एफआईआर की कॉपी भी सार्वजनिक की।
उन्होंने दावा किया कि उनके रिपोर्ट्स सिर्फ़ सच्चाई सामने लाने की कोशिश कर रहे हैं — खासकर इस बात की कि कैसे लाखों गरीब, पढ़े-लिखे लेकिन कागज़ात न रखने वाले लोगों के नाम बिना वजह हटाए जा रहे हैं।
विपक्ष की आशंकाएं
बिहार की कई विपक्षी पार्टियों — RJD, कांग्रेस, वाम दलों और AIMIM तक — ने इस पूरी प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए हैं:
- उनके मुताबिक, 35 लाख से अधिक वोटर लिस्ट से बाहर किए जा सकते हैं।
- इनमें से अधिकतर वे लोग हैं जो कागज़ात के अभाव में पहले भी NRC जैसे मुद्दों पर सरकार के निशाने पर रह चुके हैं।
- विपक्ष का यह भी कहना है कि यह कदम आगामी विधानसभा चुनाव से पहले “मतदाता बैंक की सफाई” की रणनीति है।
चुनाव आयोग की प्रतिक्रिया
मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि यह प्रक्रिया “आवश्यक” थी और राज्य के लाखों मतदाताओं ने इसमें सक्रिय भागीदारी की है।
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में भी यह दलील दी कि मतदाता सूची की शुद्धता लोकतंत्र के लिए जरूरी है, और यह कदम पारदर्शी प्रक्रिया के तहत लिया गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने इन याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए आयोग से जवाब तलब किया है और यह कहा है कि यह देखना जरूरी है कि इस प्रक्रिया में किसी भी वैध नागरिक का नाम न हटे।
क्या यह नया NRC है?
कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और नागरिक संगठनों का मानना है कि यह प्रक्रिया “NRC-lite” जैसी है, जिसमें नागरिकता साबित करने के लिए दस्तावेज़ मांगना आम हो गया है।
इसका सीधा असर उन लोगों पर पड़ रहा है जो या तो अशिक्षित हैं, प्रवासी मजदूर हैं, या फिर कभी जन्म प्रमाण पत्र या अन्य दस्तावेज़ बनवा ही नहीं सके।
आगे क्या?
इस मुद्दे पर देशभर में बहस छिड़ गई है:
- क्या SIR वास्तव में लोकतांत्रिक प्रक्रिया की शुद्धता का प्रयास है?
- या यह भाजपा और चुनाव आयोग के बीच एक अदृश्य साठगांठ का हिस्सा है?
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई, विपक्ष का विरोध और जनता की प्रतिक्रिया ही तय करेगी कि आने वाले बिहार विधानसभा चुनाव में यह मुद्दा कितना बड़ा बनेगा।
निष्कर्ष
राहुल गांधी के इस आरोप ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि भारत के लोकतंत्र में निष्पक्ष चुनाव आयोग की भूमिका क्या है? क्या यह संस्थान अब भी स्वतंत्र है, या यह राजनीतिक दबावों के अधीन आ चुका है?
इस विवाद ने बिहार में राजनीतिक हलचल को नई गति दे दी है — और यह स्पष्ट है कि चुनावों से पहले मतदाता सूची ही सबसे बड़ा राजनीतिक रणभूमि बनने जा रही है।
















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