भूमिका
भारत के संघीय ढांचे में राज्यपालों की भूमिका एक संवैधानिक उत्तरदायित्व मानी जाती है। लेकिन बीते कुछ वर्षों में विपक्ष-शासित राज्यों और राजभवनों के बीच मतभेद लगातार बढ़ते दिखे हैं। इसी संदर्भ में, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के राज्यसभा सांसद पी. संदोष कुमार ने हाल ही में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को एक पत्र लिखा है, जिसमें उन्होंने विपक्ष शासित राज्यों में राज्यपालों के अधिकारों के कथित दुरुपयोग को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की है।
केरल की घटना बनी विवाद की जड़
सांसद कुमार ने अपने पत्र में विशेष रूप से केरल में आयोजित विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर राजभवन में हुए एक कार्यक्रम का उल्लेख किया है। इस कार्यक्रम में एक विवादास्पद ‘भारत माता’ की छवि प्रदर्शित की गई थी, जिसे लेकर केरल के कृषि मंत्री पी. प्रसाद ने कार्यक्रम का बहिष्कार कर दिया। यह चित्र कथित तौर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़ा हुआ था।
कुमार के अनुसार, इस चित्र का चयन और प्रदर्शन राज्य सरकार से बिना परामर्श के किया गया था, जिससे यह मामला सिर्फ सांस्कृतिक नहीं बल्कि संवैधानिक और राजनीतिक मसला बन गया।
‘भारत माता’ की छवि पर विवाद
‘भारत माता’ की छवि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में एक प्रेरणादायक और सांस्कृतिक प्रतीक रही है। अबनिंद्रनाथ टैगोर द्वारा निर्मित इस छवि को औपनिवेशिक सत्ता के विरोध का प्रतीक माना गया। हालांकि, पी. संदोष कुमार का आरोप है कि इस छवि का हालिया संस्करण एक विचारधारात्मक संगठन द्वारा ‘पुनर्कल्पित’ किया गया है और अब इसका इस्तेमाल सांप्रदायिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि ऐसे प्रतीकों को आधिकारिक सरकारी आयोजनों में शामिल करना, जहां सभी समुदायों और विचारधाराओं के लोग प्रतिनिधित्व करते हैं, समाज में ध्रुवीकरण और असंतोष को बढ़ावा देता है।
संवैधानिक उल्लंघन के आरोप
कुमार ने अपने पत्र में दावा किया कि इस घटना से संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन हुआ है। उन्होंने कहा कि यह कार्यक्रम ‘प्रतीक और नाम अधिनियम, 1950’ और ‘राष्ट्रीय सम्मान अपमान रोकथाम अधिनियम, 1971’ के उल्लंघन की श्रेणी में आता है। उनका मानना है कि ‘भारत माता’ की छवि का राजनीतिक या सांप्रदायिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल करना, संवैधानिक मर्यादाओं के खिलाफ है।
राज्यपालों की भूमिका पर सवाल
सांसद कुमार ने यह भी आरोप लगाया कि यह घटना कोई अलग-थलग मामला नहीं है। उन्होंने कहा कि केरल, तमिलनाडु जैसे विपक्ष-शासित राज्यों में राज्यपाल लगातार राजनीतिक एजेंट के रूप में कार्य कर रहे हैं और राजभवनों को आरएसएस की वैचारिक चौकियों में तब्दील किया जा रहा है।
उनके अनुसार, यह स्थिति संविधान के संघीय ढांचे, लोकतांत्रिक मूल्यों और राज्यों की स्वायत्तता पर प्रत्यक्ष हमला है। ऐसे में राज्यपालों का आचरण सवालों के घेरे में है, खासकर जब वे केंद्र की नीतियों के पक्ष में और राज्य सरकारों के विरोध में खड़े होते हैं।
केरल सरकार की प्रतिक्रिया
केरल के कृषि मंत्री पी. प्रसाद ने कार्यक्रम का बहिष्कार करते हुए कहा कि राज्य सरकार भारत माता का सम्मान करती है, लेकिन जिस चित्र का इस्तेमाल किया गया वह आरएसएस की शाखाओं से जुड़ा हुआ था और उसे एक आधिकारिक राजकीय समारोह में इस्तेमाल करना असंवैधानिक है।
उन्होंने यह भी कहा कि एक लोकतांत्रिक सरकार से परामर्श लिए बिना किसी धार्मिक या वैचारिक प्रतीक को थोपना, संवैधानिक शिष्टाचार का उल्लंघन है।
राजभवन की सफाई
केरल के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि भारत माता की छवि पर कोई विवाद नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा, “चाहे किसी भी ओर से कितना भी दबाव क्यों न हो, भारत माता पर कोई समझौता नहीं किया जाएगा।”
उनका तात्पर्य था कि भारत माता का प्रतीक भारतीय संस्कृति और गौरव का प्रतिनिधित्व करता है, और इस पर कोई राजनीतिक टिप्पणी अनुचित है।
संघीय ढांचे पर खतरा?
पी. संदोष कुमार का पत्र भारतीय राजनीति में एक गहरे और लगातार चल रहे संघ बनाम राज्य विवाद को फिर से उजागर करता है। जब राज्यपाल राज्य सरकारों के निर्णयों में अनावश्यक हस्तक्षेप करते हैं, तो सवाल उठता है — क्या वे संवैधानिक प्रमुख हैं या केंद्र सरकार के राजनीतिक एजेंट?
केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में हाल के वर्षों में कई ऐसे मामले सामने आए हैं जहां राज्यपालों और राज्य सरकारों के बीच तीखे टकराव हुए हैं — चाहे वह बिलों को मंजूरी देना हो, राज्य नीति में हस्तक्षेप करना हो, या फिर राज्य सरकार के कार्यक्रमों में अड़चन डालना।
राष्ट्रपति से मांग
अपने पत्र के अंत में पी. संदोष कुमार ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से आग्रह किया कि वे इस गंभीर प्रवृत्ति को गंभीरता से लें और यह सुनिश्चित करें कि राज्यपाल संविधान के तहत दिए गए अपने अधिकारों से अधिक आगे न बढ़ें।
उन्होंने यह भी कहा कि यदि इस प्रवृत्ति को रोका नहीं गया, तो यह हमारे संविधान, लोकतंत्र और राज्यों की स्वायत्तता के लिए गंभीर खतरा बन सकता है।
निष्कर्ष
भारत का संविधान एक संघीय ढांचे को मान्यता देता है, जिसमें केंद्र और राज्य दोनों के अधिकार स्पष्ट रूप से परिभाषित हैं। राज्यपालों की भूमिका एक सेतु की होनी चाहिए — केंद्र और राज्य के बीच — लेकिन जब यह सेतु एक पक्ष की ओर झुकने लगता है, तो लोकतांत्रिक संतुलन बिगड़ने लगता है।
केरल में भारत माता की छवि पर विवाद केवल एक प्रतीकात्मक घटना नहीं, बल्कि राज्य और केंद्र के बीच वैचारिक संघर्ष का परिचायक है। जब तक राज्यपालों की भूमिका स्पष्ट और निष्पक्ष नहीं होगी, तब तक ऐसे टकराव भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था को लगातार चुनौती देते रहेंगे।















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