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अल्मोड़ा के महेंद्र आर्य ने रचा इतिहास,रक्षा मंत्रालय में वैज्ञानिक बने महेंद्र…अब पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अभियान में करेंगे हिम शोध

उत्‍तराखंड के अल्मोड़ा जिले के छोटे से गांव दुगड़ाकोट में जन्मे महेंद्र कुमार आर्य ने यह साबित कर दिया कि प्रतिभा सीमाओं में नहीं बंधती। शांत ताड़ीखेत ब्लॉक से निकलकर उन्होंने रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) और अब अंटार्कटिका अभियान में भारत का प्रतिनिधित्व कर अपनी असाधारण यात्रा से प्रेरणा का उदाहरण पेश किया है।

महेंद्र कुमार आर्य वर्तमान में रक्षा मंत्रालय के डीआरडीओ (DRDO) में वैज्ञानिक के रूप में कार्यरत हैं। अब उन्हें भारत सरकार के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अंतर्गत अंटार्कटिका अभियान में शामिल किया गया है। यह अभियान वैश्विक जलवायु परिवर्तन और हिम विज्ञान से संबंधित अनुसंधान के लिए हर वर्ष संचालित किया जाता है। भारत 1981 से इस मिशन को चला रहा है और वर्तमान में दो प्रमुख अनुसंधान केंद्र —मैत्री और भारती — संचालित हो रहे हैं।

महेंद्र आर्य इस बार 23 अक्टूबर 2025 को भारत से रवाना होंगे और 28 फरवरी 2026 को लौटेंगे। वे अंटार्कटिका में बर्फ और हिम से संबंधित शोध कार्य में अपनी सेवाएं देंगे।
उन्होंने कहा, “यह मेरे लिए सौभाग्य की बात है कि मुझे अंटार्कटिका अभियान का हिस्सा बनने का अवसर मिला है। मैं अपने देश के वैज्ञानिक उद्देश्यों को पूरा करने के लिए पूरी निष्ठा से काम करूंगा।”

पारिवारिक पृष्ठभूमि और संघर्ष:

महेंद्र का सफर बेहद प्रेरणादायक रहा। छह बच्चों वाले परिवार में जन्मे महेंद्र के पिता दौलत राम ने कड़ी मेहनत से सभी बच्चों को पढ़ाया। कनाडा में बसे उनके बड़े भाई ने भी शिक्षा में अहम भूमिका निभाई। साधारण परिवेश और सीमित संसाधनों के बावजूद महेंद्र की लगन और परिवार के त्याग ने उन्हें इस ऊंचाई तक पहुंचाया, जहां से अब वह देश का नाम विश्व के सबसे ठंडे महाद्वीप में रोशन करने जा रहे हैं।

वैज्ञानिक मिशन का उद्देश्य:

अंटार्कटिका अभियान का मुख्य उद्देश्य है —

* वैश्विक जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का अध्ययन
* बर्फ और हिम के भौतिक-रासायनिक गुणों का विश्लेषण
* पृथ्वी के पर्यावरणीय संतुलन से जुड़ी वैज्ञानिक समझ को विकसित करना

भारत के वैज्ञानिकों द्वारा एकत्रित किए गए आंकड़े जलवायु नीति और पर्यावरण संरक्षण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

निष्कर्ष:

महेंद्र आर्य जैसे युवाओं की सफलता यह दिखाती है कि भारत के ग्रामीण इलाकों में भी प्रतिभा का खजाना छिपा है। सही दिशा, परिवार का समर्थन और दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ कोई भी व्यक्ति असंभव को संभव बना सकता है। अंटार्कटिका में भारतीय ध्वज के साथ उनकी उपस्थिति न सिर्फ उत्तराखंड, बल्कि पूरे देश के लिए गर्व का विषय है।

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