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धराली में एक दिन में 6 बार टूटा बाढ़ का कहर — खीर गंगा की तबाही का आंखों देखा सच

Flood wreaked havoc in Dharali 6 times in a day - Eyewitness account of the devastation of Kheer Ganga

5 अगस्त 2025 की सुबह उत्तरकाशी ज़िले का धराली गांव अपने रोज़मर्रा के जीवन में मग्न था। पहाड़ों की ठंडी हवा में खेतों की हरियाली लहरा रही थी, लोग अपने काम में व्यस्त थे और बच्चे स्कूल जाने की तैयारी कर रहे थे। लेकिन यह शांति ज्यादा देर तक नहीं टिकने वाली थी। कुछ ही घंटों में आसमान से बरसती बारिश और पहाड़ों से उतरते पानी ने खीर गंगा को एक उफनते दैत्य में बदल दिया। और इस दैत्य ने गांव को दिन में एक नहीं, बल्कि छह-छह बार अपनी लपेट में लेकर तबाही का ऐसा नजारा पेश किया, जिसे याद कर आज भी लोग कांप जाते हैं।

धराली, जो गंगोत्री नेशनल हाइवे के किनारे बसा एक खूबसूरत और छोटा सा गांव है, खीर गंगा के किनारे बसा है। यह नदी सामान्य दिनों में गांव वालों के लिए जलस्रोत और सिंचाई का साधन है, लेकिन बरसात में इसका मिजाज बदलता है। 5 अगस्त की सुबह आठ बजकर पंद्रह मिनट पर पहली बार नदी का रंग और आवाज़ बदली। एक वीडियो में साफ दिखता है कि पानी अचानक भूरा और गाढ़ा हो गया, उसमें बड़े-बड़े पत्थर और लकड़ियां बहने लगीं। किनारे खड़े लोग पीछे हटते हुए एक-दूसरे को चेतावनी दे रहे थे कि पानी बढ़ रहा है। गांव के बुजुर्ग मोहन सिंह राणा ने बाद में बताया कि उन्हें उसी वक्त अंदाज़ा हो गया था कि यह सामान्य बहाव नहीं है, लेकिन उन्होंने सोचा कि यह बस एक बार की लहर होगी और फिर शांत हो जाएगा।

लेकिन खतरा यहीं नहीं थमा। करीब सवा नौ बजे खीर गंगा का दूसरा हमला हुआ। इस बार पानी का बहाव पहले से दोगुना था। मिट्टी का कटाव इतना तेज था कि कुछ ही मिनटों में गांव को खेतों से जोड़ने वाला एक लकड़ी का पुल टूटकर बह गया। एक और वीडियो में पुल के गिरते ही वहां खड़े लोगों की हताशा साफ दिखती है। गौरी देवी, जिनका खेत उस पार था, रोते हुए कहती हैं कि पुल टूटने के साथ ही ऐसा लगा मानो उनके जीवन का रास्ता ही कट गया हो।

दोपहर बारह बजकर पांच मिनट पर तीसरी बार नदी ने अपना रौद्र रूप दिखाया। पानी अब सड़क पर चढ़ने लगा था। गंगोत्री नेशनल हाइवे पर खड़े वाहन तेजी से पीछे हटने की कोशिश कर रहे थे। कैमरा थामे एक युवक वीडियो में कहता है कि उसने जिंदगी में इतना तेज बहाव पहले कभी नहीं देखा। यह वह पल था जब प्रशासन को अहसास हुआ कि यह कोई मामूली बाढ़ नहीं, बल्कि एक खतरनाक फ्लैश फ्लड है।

इसके बाद दोपहर दो बजकर बीस मिनट पर चौथा हमला हुआ। इस बार पानी के साथ बड़े-बड़े पेड़ और चट्टानें भी बहते आए। नदी का शोर इतना था कि लोग एक-दूसरे को चिल्लाकर भी अपनी आवाज़ नहीं पहुँचा पा रहे थे। गांव के बीच की पगडंडी पूरी तरह बह चुकी थी। एसडीआरएफ के जवान, जो पहले से मौके पर पहुंच चुके थे, बताते हैं कि उनके पास लोगों को ऊंचाई पर ले जाने के लिए बस दस मिनट का वक्त था, उसके बाद पानी ने सब ढक दिया।

शाम करीब पांच बजे पांचवां हमला हुआ, जो सबसे खतरनाक था। पानी अब घरों के आंगन में घुस चुका था। दो मवेशी बह गए, और लोग रस्सियों से एक-दूसरे को पकड़कर उन्हें बचाने की कोशिश कर रहे थे। बारिश लगातार जारी थी और माहौल में डर के साथ निराशा भी घुल चुकी थी।

रात सात बजे छठी और आखिरी लहर आई। अंधेरा फैल चुका था, बिजली कट चुकी थी और लोग मोबाइल व टॉर्च की रोशनी में अपने आसपास का मंजर देखने की कोशिश कर रहे थे। पंचायत भवन में गांव के कई लोग शरण लिए हुए थे। ग्राम प्रधान दिनेश पुंडीर का कहना था कि ऐसा लग रहा था जैसे नदी हमें छोड़ने का नाम ही नहीं ले रही है। ठंडी हवा और बर्फीला पानी बच्चों को कांपने पर मजबूर कर रहा था।

इस बीच ऑपरेशन ‘जीवन-रेखा’ नाम से बड़े स्तर पर रेस्क्यू शुरू हुआ। एसडीआरएफ, एनडीआरएफ, आईटीबीपी और स्थानीय पुलिस ने मिलकर गांव के करीब 275 लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया। हेलीकॉप्टर से 12 लोगों को छतों से निकाला गया। गंगोत्री हाइवे के एक स्कूल को राहत शिविर में बदल दिया गया, जहां लोगों को कंबल, खाने का पैकेट और दवाइयां दी गईं।

तबाही का पैमाना चौंकाने वाला था। 46 मकान क्षतिग्रस्त हो गए, तीन पुल बह गए, दो किलोमीटर सड़क पूरी तरह ध्वस्त हो गई। 37 मवेशी बह गए और करीब 1.8 करोड़ रुपये की फसल बर्बाद हो गई। दो लोग लापता थे और 14 लोग घायल हुए।

भूवैज्ञानिकों के अनुसार, लगातार तीन दिन की भारी बारिश ने नदी के ग्लेशियर कैचमेंट में जल स्तर अचानक बढ़ा दिया था। ऊपरी इलाकों में एक लैंडस्लाइड डैम बना, जो अचानक टूट गया और पानी का मलबा तेज वेग से नीचे आया। नदी का चैनल संकरा होने की वजह से पानी का वेग कई गुना बढ़ गया।

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने घटना पर गहरा दुख जताया और कहा कि यह हमें याद दिलाती है कि पहाड़ी इलाकों में आपदा प्रबंधन को और तेज़ और आधुनिक बनाने की जरूरत है। उन्होंने मृतकों के परिजनों को चार लाख रुपये की सहायता, गंभीर घायलों के मुफ्त इलाज और क्षतिग्रस्त मकानों के पुनर्निर्माण के लिए अनुदान की घोषणा की।

धराली के लोग अभी भी उस दिन को भूल नहीं पाए हैं। हालांकि डर अब भी कायम है, लेकिन उनमें वापसी का जज़्बा भी है। कई परिवार अपने मकानों की मरम्मत शुरू कर चुके हैं। किसान गिरीश कहते हैं कि नदी ने उनका सब कुछ ले लिया, लेकिन वे फिर से खेत में बीज डालेंगे।

इस घटना के छह वीडियो सिर्फ डर और तबाही की कहानी नहीं कहते, बल्कि यह भी दिखाते हैं कि प्रकृति कितनी बार और कितनी तेज़ी से अपना रूप बदल सकती है। ये फुटेज प्रशासन के लिए बाढ़ के व्यवहार को समझने और भविष्य की चेतावनी प्रणाली विकसित करने में मददगार होंगे। धराली की यह कहानी हमें यह सिखाती है कि पहाड़ों में आपदा एक बार नहीं, कई बार आ सकती है और इसके लिए तैयार रहना ही सबसे बड़ी सुरक्षा है।

धराली के लोग इस दिन को हमेशा याद रखेंगे। उनके लिए 5 अगस्त 2025 सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि वह दिन है जब खीर गंगा ने छह बार लौटकर उन्हें परखा, और उन्होंने हर बार जिंदा रहने की जंग लड़ी। आने वाली पीढ़ियां इसे खीर गंगा का काला दिन कहकर याद करेंगी, और शायद यह कहानी उन्हें चेताएगी कि पहाड़ की नदियों से कभी लापरवाही नहीं करनी चाहिए।

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