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दिल्ली-एनसीआर से स्ट्रे डॉग्स हटाने पर सुप्रीम कोर्ट का आदेश और मेनका गांधी का विरोध: सुरक्षा बनाम संवेदना की जंग

Supreme Court's order to remove stray dogs from Delhi-NCR and Maneka Gandhi's protest: A battle of security versus sympathy

प्रस्तावना: दिल्ली-एनसीआर में कुत्तों की किस्मत पर बड़ा फैसला

देश की राजधानी और उससे लगे एनसीआर के शहर—दिल्ली, नोएडा, गुरुग्राम, गाज़ियाबाद, फरीदाबाद—इन दिनों एक ऐसे आदेश के बाद सुर्खियों में हैं, जिसने न सिर्फ़ प्रशासनिक हलकों में हलचल मचा दी है, बल्कि सामाजिक, पर्यावरणीय और कानूनी बहस को भी हवा दी है।

11 अगस्त 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक, लेकिन विवादास्पद आदेश सुनाया—“दिल्ली-एनसीआर की सड़कों से सभी स्ट्रे डॉग्स को हटाकर 8 हफ़्तों के भीतर शेल्टर में रखा जाए।”

यह आदेश आते ही बवाल मच गया। पशु-प्रेमी संगठनों, नागरिक समूहों और राजनीतिक नेताओं ने इसे “अव्यावहारिक” और “निर्दयी” करार दिया। इनमें सबसे तेज़ आवाज़ रही—मेनका गांधी की, जिन्होंने इसे “गुस्से में दिया गया फैसला” बताया और इसके आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय दुष्परिणामों पर गंभीर सवाल उठाए।


सुप्रीम कोर्ट का आदेश – क्या और क्यों?

1. आदेश की मुख्य बातें

  • लक्ष्य: दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों से सभी स्ट्रीट डॉग्स को हटाना।
  • समयसीमा: 8 हफ़्ते में ऑपरेशन पूरा करना।
  • कार्यान्वयन एजेंसियां: दिल्ली सरकार, एनसीआर के सभी नगर निगम, पुलिस और एनिमल हसबेंडरी डिपार्टमेंट।
  • तुरंत शुरुआत: हाई-रिस्क क्षेत्रों से 5,000 कुत्तों की पकड़।
  • निगरानी: सीसीटीवी कैमरे, हेल्पलाइन नंबर और फील्ड रिपोर्टिंग सिस्टम।

2. अदालत की सोच

सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक़—

  • पिछले कुछ वर्षों में कुत्तों के काटने के मामलों में तेज़ी आई है।
  • दिल्ली में रोज़ाना औसतन 2000 बाइट केस रिपोर्ट हो रहे हैं।
  • बच्चे और बुज़ुर्ग सबसे ज़्यादा प्रभावित हैं।
  • 2023 के Animal Birth Control (ABC) Rules नाकाम साबित हुए हैं।

अदालत का कहना था कि जब सार्वजनिक सुरक्षा और मानव जीवन की बात हो, तो “मानवीय दृष्टिकोण” भी उस पर हावी नहीं होना चाहिए।


पृष्ठभूमि – स्ट्रे डॉग्स और ABC नियम

भारत में स्ट्रे डॉग्स की संख्या लगभग 6.2 करोड़ मानी जाती है। दिल्ली-एनसीआर में ही यह संख्या करीब 3 लाख है।
ABC Rules 2023 के तहत—

  1. कुत्तों की नसबंदी और वैक्सीनेशन किया जाए।
  2. फिर उन्हें उसी स्थान पर छोड़ दिया जाए।

इसका उद्देश्य था कि कुत्तों की आबादी धीरे-धीरे घटे और वे इंसानों के साथ सह-अस्तित्व में रहें। लेकिन कोर्ट के अनुसार, ये नियम जमीनी स्तर पर सही ढंग से लागू नहीं हुए।


जनता और संगठनों की प्रतिक्रिया

1. सड़क पर विरोध

  • इंडिया गेट पर सैकड़ों पशु-प्रेमियों का प्रदर्शन।
  • PETA ने इसे “illogical” और “inhumane” कहा।
  • कई फीडर्स ने पुलिस के साथ झड़प की।

2. सोशल मीडिया पर विभाजन

  • कुछ लोग बोले: “ये आदेश बच्चों की सुरक्षा के लिए ज़रूरी है।”
  • कुछ ने कहा: “ये पर्यावरण संतुलन और पशु-अधिकार पर हमला है।”

मेनका गांधी का विरोध – तर्क और दृष्टिकोण

मेनका गांधी, जो दशकों से पशु-अधिकार की मुखर आवाज़ रही हैं, ने इस आदेश को “अव्यावहारिक, खर्चीला और गुस्से में लिया गया निर्णय” बताया।

1. वित्तीय चुनौती

  • दिल्ली में एक भी सरकारी डॉग शेल्टर नहीं है
  • 3 लाख कुत्तों को रखने के लिए लगभग 3,000 पाउंड चाहिए।
  • प्रत्येक पाउंड के लिए शौचालय, पानी, खाना, वॉचमैन, डॉक्टर, सफाईकर्मी की ज़रूरत होगी।
  • निर्माण लागत: ₹15,000 करोड़।
  • रखरखाव: ₹5 करोड़ प्रति सप्ताह।

2. पर्यावरणीय असर

  • कुत्तों के हटते ही चूहों और अन्य हानिकारक जीवों की संख्या बढ़ जाएगी।
  • उदाहरण: पेरिस, 1880s—कुत्तों को हटाने पर शहर चूहों से भर गया था।

3. कानूनी सवाल

  • पहले एक बेंच ने ABC नियमों को सही ठहराया था, अब दूसरी बेंच ने उल्टा आदेश दे दिया।
  • कौन सा आदेश मान्य होगा?

4. सामाजिक टकराव

  • फीडर्स और पकड़ने वाली टीमों के बीच गली-गली में झगड़े होंगे।
  • इससे कानून-व्यवस्था बिगड़ सकती है।

5. 14-पॉइंट प्लान

मेनका गांधी का सुझाव है कि पुराने 14-पॉइंट प्लान पर वापसी हो—

  • ज़ोन-वाइज नसबंदी केंद्र।
  • स्थानीय समितियों की निगरानी।
  • पालतू कुत्तों के लिए भी रजिस्ट्रेशन और कंट्रोल।

संभावित समाधान

  1. ABC का सख़्त और पारदर्शी क्रियान्वयन
  2. स्थायी डॉग शेल्टर का चरणबद्ध निर्माण।
  3. फीडिंग जोन तय करना।
  4. पालतू कुत्तों पर सख़्त रेगुलेशन
  5. जन-जागरूकता अभियान

निष्कर्ष

दिल्ली-एनसीआर में स्ट्रे डॉग्स का मुद्दा सिर्फ़ “सुरक्षा बनाम करुणा” का नहीं है—यह कानून, पर्यावरण, वित्त और समाज के बीच संतुलन खोजने की चुनौती है।
सुप्रीम कोर्ट का आदेश तत्काल खतरे को देखते हुए सख़्त है, लेकिन मेनका गांधी के तर्क बताते हैं कि जमीनी हकीकत को नज़रअंदाज़ करने से यह योजना विफल हो सकती है।
शायद समाधान इसी में है कि मानव और पशु—दोनों की सुरक्षा के लिए विज्ञान और संवेदना को साथ लेकर चला जाए।

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