महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर जबरदस्त उथल-पुथल देखने को मिल रही है। दिल्ली से लेकर मुंबई तक सत्ता और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया है। इस बार मामला सीधे-सीधे देश के लोकतांत्रिक तंत्र की बुनियाद – चुनाव प्रक्रिया – से जुड़ा है। कांग्रेस ने चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाते हुए दावा किया है कि वोटिंग मशीनों से ‘वोट चोरी’ हो रही है और इसके लिए VVPAT या बैलेट पेपर से चुनाव कराए जाने की पुरजोर मांग की है।
क्या है VVPAT?
VVPAT यानी ‘Voter Verifiable Paper Audit Trail’ एक ऐसी तकनीक है जो यह सुनिश्चित करती है कि मतदाता ने जिसे वोट दिया है, वही दर्ज किया गया है। यह एक प्रिंटेड स्लिप के जरिए मतदाता को कुछ सेकेंड्स के लिए दिखाता है कि उसने किस पार्टी को वोट दिया है। इसके बाद यह स्लिप एक सीलबंद बॉक्स में गिर जाती है, जिसे बाद में गिनती के समय सत्यापन के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।
कांग्रेस की मांग और आरोप
कांग्रेस पार्टी का कहना है कि हाल के चुनावों में ईवीएम (EVM) मशीनों की विश्वसनीयता पर कई बार सवाल उठे हैं। पार्टी प्रवक्ताओं का आरोप है कि सत्ता पक्ष ने तकनीकी माध्यम से ‘वोट ट्रांसफर’ कर चुनावी नतीजों को प्रभावित किया है।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा:
“जब VVPAT की सुविधा है, तो क्यों नहीं हर मतदान केंद्र पर उसकी 100% मिलान प्रक्रिया अपनाई जाती? ये लोकतंत्र की बुनियाद को कमजोर करने की साजिश है।”
इंडिया गठबंधन की बैठक में मुद्दा
इसी मुद्दे को लेकर दिल्ली में INDIA गठबंधन की बैठक आयोजित हुई, जिसमें उद्धव ठाकरे, ममता बनर्जी, केसीआर, राहुल गांधी, और अन्य विपक्षी नेता शामिल हुए। बैठक में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि 2029 तक देश में हर चुनाव बैलेट पेपर या कम से कम VVPAT सत्यापन के साथ कराया जाए।
बैठक के बाद उद्धव ठाकरे ने कहा:
“हम इस देश में चुनाव की साख को बचाने के लिए लड़ेंगे। यह सिर्फ राजनीतिक नहीं, लोकतंत्र की रक्षा की लड़ाई है।”
मुंबई मेट्रो में झलकी सियासत की परछाई
इस सियासी घमासान का असर मुंबई मेट्रो की दिनचर्या में भी देखने को मिला। अंधेरी, दहिसर, विले पार्ले और कुर्ला जैसे प्रमुख स्टेशनों पर कांग्रेस और शिवसेना (उद्धव गुट) के कार्यकर्ताओं ने पोस्टर और पंपलेट्स के जरिए आम जनता को जागरूक करने की मुहिम चलाई। कई मेट्रो स्टेशनों पर यात्रियों के बीच VVPAT और EVM पर खुली चर्चा होती देखी गई।
सत्ताधारी पक्ष का जवाब
BJP और एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना ने विपक्ष के आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया। उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा:
“ये हार के डर से फैलाया जा रहा प्रोपेगेंडा है। चुनाव आयोग एक स्वतंत्र और निष्पक्ष संस्था है, जिस पर सवाल उठाना लोकतंत्र का अपमान है।”
उन्होंने यह भी दावा किया कि विपक्ष को जनता का समर्थन नहीं मिल रहा, इसलिए वे तकनीकी प्रणाली को दोष देने की रणनीति अपनाते हैं।
चुनाव आयोग की प्रतिक्रिया
चुनाव आयोग ने एक प्रेस रिलीज जारी कर साफ किया कि:
- VVPAT की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी है।
- प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में पांच रैंडम बूथों का VVPAT मिलान किया जाता है।
- अब तक हुए किसी भी मिलान में कोई गड़बड़ी नहीं पाई गई है।
इसके बावजूद आयोग विपक्षी दलों के साथ बातचीत करने को तैयार है और हर सुझाव पर विचार किया जाएगा।
विशेषज्ञों की राय
चुनाव विशेषज्ञ और संवैधानिक मामलों के जानकार मानते हैं कि जनता का चुनाव प्रक्रिया पर विश्वास सर्वोपरि है। अगर एक बड़ा वर्ग बार-बार सवाल उठा रहा है, तो पारदर्शिता बढ़ाने के कदम उठाए जाने चाहिए।
सोशल मीडिया पर माहौल
ट्विटर पर #ReturnToBallotPaper और #VVPAForIndia ट्रेंड कर रहे हैं। यूजर्स की राय बंटी हुई है:
- कुछ लोग कहते हैं कि तकनीक पर भरोसा करना चाहिए।
- जबकि अन्य कहते हैं कि बैलेट पेपर भले धीमा हो, लेकिन जनता को भरोसा ज्यादा है।
मुंबई मेट्रो और जनता की प्रतिक्रिया
मुंबई मेट्रो के यात्री बताते हैं कि राजनीतिक दलों का इस तरह स्टेशन के पास प्रचार करना आम जनता में जागरूकता लाता है, लेकिन कई लोगों को इससे असुविधा भी होती है। कुछ स्टेशनों पर मेट्रो अधिकारियों को हस्तक्षेप कर पोस्टर हटवाने पड़े।
भविष्य की दिशा
- सर्वदलीय बैठक की मांग: विपक्षी दलों ने प्रधानमंत्री से इस विषय पर सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग की है।
- जनहित याचिका: सुप्रीम कोर्ट में VVPAT को लेकर कई याचिकाएं पहले से लंबित हैं। इस बीच एक नई जनहित याचिका दाखिल की गई है जिसमें 100% VVPAT मिलान की मांग की गई है।
- लोकसभा चुनाव 2029: विपक्ष की रणनीति है कि 2029 तक बैलेट पेपर या VVPAT आधारित पूर्ण सत्यापन प्रणाली को लागू किया जाए।
निष्कर्ष
वोटिंग प्रक्रिया पर उठे सवाल लोकतंत्र की जड़ों को हिला सकते हैं। ऐसे में कांग्रेस और INDIA गठबंधन की ओर से उठाई गई VVPAT या बैलेट पेपर से चुनाव की मांग को महज राजनीतिक शोरगुल समझना जल्दबाज़ी होगी। इस बहस को निष्पक्षता से समझना और सभी पक्षों की राय लेकर निर्णय लेना जरूरी है, ताकि जनता का भरोसा लोकतंत्र में बना रहे।















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