जब बूंदा का मन बोझिल हो और हालात बेबस कर दें, तब भी अगर कोई शहर हँसकर कह दे “कोई बात ना बाबा,” तो समझ जाइए आप बनारस में हैं। 2025 की बारिश ने उत्तर भारत के कई शहरों को बेहाल कर दिया है। लेकिन बनारस और प्रयागराज जैसे धार्मिक नगरी में ये बाढ़ न सिर्फ मुसीबत लाई, बल्कि अपने साथ कुछ ऐसे नजारे भी ले आई जो सोशल मीडिया पर वायरल हो गए।
बाढ़ के बीच नाचते गाते लोग: संकट में भी उल्लास
प्रयागराज और बनारस में गंगा का जलस्तर खतरे के निशान से ऊपर बह रहा है। तमाम घाटों और निचले इलाकों में पानी भर चुका है। सड़कें जलमग्न हैं, लोग राहत शिविरों में शरण लिए हुए हैं। मगर इस सबके बीच कुछ वीडियो सामने आए हैं जिनमें लोग पानी में खड़े होकर नाचते गाते दिख रहे हैं।
एक वायरल वीडियो में देखा गया कि कुछ युवकों का समूह बाढ़ के पानी में डीजे बजाकर डांस कर रहा है। उनके पीछे बहता गंगा जल, दूर खड़ी नावें और जलमग्न इमारतें इस त्रासदी की गवाही दे रही थीं। लेकिन इन युवकों के चेहरे पर न चिंता थी, न डर। बस मस्ती थी।
बनारस की आत्मा है मस्ती और ठहाका
बनारस के लोगों की जीवनशैली ही ऐसी है कि चाहे कितनी भी विपदा आ जाए, वो उसे जी लेने में विश्वास रखते हैं। सदियों से ये शहर विपत्तियों को झेलता रहा है—बाढ़, महामारी, आक्रमण, लेकिन कभी भी इसकी आत्मा नहीं टूटी। यहाँ के लोग अपने संघर्ष को भी ठहाके में बदल देते हैं।
बनारसीपन का यही रंग इस बार की बाढ़ में भी देखने को मिला।
अस्सी घाट से मैदागिन तक पानी ही पानी
इस बार की बाढ़ ने बनारस के प्रसिद्ध घाटों को भी डुबो दिया है। अस्सी घाट, दशाश्वमेध घाट, तुलसी घाट—हर जगह पानी भर चुका है। न सिर्फ घाट, बल्कि आसपास की कॉलोनियां भी जलमग्न हैं। लेकिन यहाँ रहने वाले लोग इस आपदा को भी उत्सव में बदलते दिखे। कहीं बच्चे नाव बनाकर खेलते दिखे, तो कहीं लोग छतों से मछली पकड़ते नजर आए।
प्रशासन की चेतावनी और जमीनी हकीकत
प्रशासन ने बाढ़ प्रभावित इलाकों में अलर्ट जारी किया है। लोगों से सुरक्षित स्थानों पर जाने की अपील की गई है। मगर जमीनी हकीकत यह है कि बहुत से लोग अभी भी अपने घरों को छोड़ना नहीं चाहते।
बनारस के राजघाट इलाके में रहने वाले संजय सिंह कहते हैं, “हर साल बाढ़ आती है, लेकिन हम नहीं जाते। यहीं जीते हैं, यहीं मरते हैं। गंगा मइया की मर्जी है। जो होगा देखा जाएगा।”
कला और दर्शन का शहर, विपत्ति में भी कलाकार
बनारस सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक राजधानी भी है। यहाँ हर गली, हर मोड़ पर कोई न कोई कलाकार मिल जाता है। जब बाढ़ आई, तो कुछ युवाओं ने गंगा के बीच मंच सजाया और वहाँ बैठकर शास्त्रीय संगीत प्रस्तुत किया।
कई लोगों ने मटकों पर तैरती लाइटों से घाटों को सजाया।
प्रयागराज में संगम पर बाढ़ का कहर
प्रयागराज में गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम स्थल पूरी तरह जलमग्न हो चुका है। वहाँ बने पक्के घाट और स्नान की सीढ़ियाँ डूब चुकी हैं। मगर लोगों का उत्साह कम नहीं हुआ। श्रद्धालु जल में स्नान करते दिखे, कुछ ने नाव से गंगा आरती की।
सोशल मीडिया पर बनारसी मस्ती ट्रेंड में
ट्विटर, इंस्टाग्राम और फेसबुक पर #BanarasVibes और #FloodDance जैसे हैशटैग ट्रेंड करने लगे। देश-विदेश के लोग हैरान हैं कि जहाँ एक ओर देश के बाकी हिस्से बाढ़ को लेकर चिंतित हैं, वहीं बनारस के लोग मस्ती में झूम रहे हैं।
एक यूजर ने लिखा, “बनारस सिर्फ एक शहर नहीं, जीने की कला है।”
मनोवैज्ञानिक पहलू: क्यों हँसते हैं बनारसी मुश्किल वक्त में भी?
विशेषज्ञों का कहना है कि बनारसी लोगों की यह मानसिकता उन्हें मानसिक रूप से मजबूत बनाती है। डॉ. सीमा त्रिपाठी, जो BHU में मनोविज्ञान विभाग में प्रोफेसर हैं, बताती हैं, “यह काउपिंग मैकेनिज्म है। जब इंसान किसी तनाव को खुद से बड़ा मानने लगता है, तब डर पनपता है। लेकिन बनारसी उसे छोटा बनाकर हँसी में उड़ा देते हैं। इससे मानसिक संतुलन बना रहता है।”
क्या ये मस्ती जिम्मेदारी की अनदेखी है?
हालांकि कई लोग इस व्यवहार की आलोचना भी कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर कुछ यूजर्स ने कहा कि प्रशासन जब अलर्ट जारी कर रहा है, तब इस तरह का नाच-गाना खतरे को न्योता देना है। एक यूजर ने लिखा, “मस्ती अपनी जगह है, लेकिन सुरक्षा पहले।”
प्राकृतिक आपदा या सांस्कृतिक उत्सव?
बनारस में आई बाढ़ एक प्राकृतिक आपदा है, जिसमें लोगों का जनजीवन अस्त-व्यस्त हो चुका है। लेकिन जिस तरह से यहाँ के लोगों ने इसे झेला और मस्ती में ढाला, वो बताता है कि बनारसीपन क्या होता है।
घाट की रौनक बनाम प्रशासन की चुनौती
जहाँ एक ओर घाटों पर लोगों की मस्ती रौनक बनी हुई है, वहीं प्रशासन के लिए ये एक बड़ी चुनौती बन रही है। NDRF और SDRF की टीमें लगातार रेस्क्यू में जुटी हैं, लेकिन जब लोग खुद सुरक्षित स्थानों पर जाने से मना कर दें, तो मुसीबत बढ़ जाती है।
धार्मिक आस्था और बाढ़: एक जटिल रिश्ता
बनारस और प्रयागराज जैसे धार्मिक शहरों में गंगा सिर्फ नदी नहीं, माँ हैं। यहाँ बाढ़ को भी कई लोग देवी का कोप मानते हैं, तो कुछ लोग इसे उनका आशीर्वाद भी मानते हैं। ऐसे में लोगों की धार्मिक भावनाएँ और वैज्ञानिक चेतावनियाँ टकराती हैं।
अंतिम विचार: बनारस की मस्ती ही उसकी असली पहचान है
जब दुनिया डर में जी रही हो, तब भी अगर कोई शहर हँस रहा हो, गा रहा हो, नाच रहा हो—तो उसे नासमझ नहीं कह सकते। उसे मजबूत कहना चाहिए। बनारस की इस बाढ़ ने यही दिखाया कि संकट चाहे जितना बड़ा हो, बनारसी मिजाज उससे बड़ा होता है।
तो अगली बार जब आप बनारस जाएं और वहाँ कोई कहे, “का हो, सब बढ़िया?” तो समझ जाइए कि ये सवाल नहीं, एक दर्शन है।















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