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छत का गिरा प्लास्टर, बाल-बाल बचे बच्चे और शिक्षक: रोहतास के सरकारी स्कूल में टला बड़ा हादसा

Plaster of the ceiling fell, children and teachers narrowly escaped: A major accident was averted in a government school in Rohtas

बिहार के रोहतास जिले से एक ऐसा मामला सामने आया है, जो राज्य की शिक्षा व्यवस्था और बुनियादी ढांचे की पोल खोलता है। शुक्रवार की सुबह, एक सरकारी स्कूल में क्लासरूम की छत का प्लास्टर अचानक भरभरा कर गिर गया। सौभाग्यवश उस समय बच्चे कक्षा से बाहर थे, वरना यह घटना किसी बड़े हादसे में तब्दील हो सकती थी। यह सिर्फ एक चेतावनी नहीं, बल्कि एक स्पष्ट संकेत है कि बिहार में शिक्षा व्यवस्था केवल पाठ्यक्रमों की गुणवत्ता की ही नहीं, बल्कि बुनियादी सुरक्षा की भी गंभीर परीक्षा में विफल हो रही है।


घटना का विवरण: एक सेकंड की देरी और हो सकती थी मौत

यह घटना रोहतास जिले के बिक्रमगंज अनुमंडल के एक प्राइमरी सरकारी विद्यालय की है, जहां कक्षा 4 के कमरे में सुबह 10:30 बजे के करीब अचानक छत से मोटा प्लास्टर का हिस्सा भरभरा कर गिर पड़ा। घटना के ठीक पहले शिक्षक बच्चों को बाहर ले गए थे, क्योंकि दीवार पर नमी और हल्की झनझनाहट महसूस की जा रही थी। कुछ ही पलों में प्लास्टर इतनी तेजी से गिरा कि पूरा फर्श मलबे से भर गया।

चश्मदीदों के अनुसार, अगर बच्चों को क्लास से बाहर न निकाला जाता, तो करीब 20 छात्र गंभीर रूप से घायल हो सकते थे। स्कूल के प्रधानाध्यापक राकेश कुमार ने बताया,

“यह इत्तेफाक नहीं, अलर्टनेस का नतीजा था। हम रोज़ दीवारों को देख-भालते हैं, क्योंकि बिल्डिंग की हालत बहुत खराब है।”


स्कूल की स्थिति: दरारें, टपकती छत, और जर्जर दीवारें

स्थानीय रिपोर्ट के अनुसार, यह स्कूल करीब 40 साल पुराना है। इसमें दो कमरे और एक बरामदा है। बारिश के मौसम में दीवारों से सीलन टपकती है, छत में लोहे की सरिया दिखने लगी है, और दीवारों में मोटी दरारें हैं। कई जगह प्लास्टर पहले ही झड़ चुका है।

बच्चे टाटपट्टी पर बैठते हैं क्योंकि फर्श पर नमी और सीलन है। टॉयलेट जर्जर और अनुपयोगी हो चुके हैं। शुद्ध पानी की कोई व्यवस्था नहीं है — एक पुराना हैंडपंप है जो अक्सर खराब रहता है।

यह हालात केवल एक स्कूल की नहीं, बल्कि राज्य भर के हजारों सरकारी स्कूलों की साझा सच्चाई है।


स्थानीय प्रशासन की भूमिका: ‘सूचना दी थी, कार्रवाई नहीं हुई’

स्कूल प्रशासन का कहना है कि वे पिछले 6 महीनों से भवन की मरम्मत की मांग कर रहे हैं। बीडीओ कार्यालय और जिला शिक्षा पदाधिकारी को लिखित शिकायतें दी गईं, लेकिन कोई सर्वे टीम नहीं आई।

ग्रामीण निवासी प्रमोद यादव ने कहा,

“हर चुनाव में नेता वादा करते हैं कि स्कूलों की हालत सुधारी जाएगी, लेकिन जैसे ही कुर्सी मिलती है, बच्चे और उनकी पढ़ाई सब भूल जाते हैं।”

एक अन्य अभिभावक शोभा देवी ने बताया कि,

“हम बच्चों को स्कूल भेजते हुए डरते हैं कि कहीं कुछ गिर न जाए। कई मां-बाप तो स्कूल से बच्चों को निकालने की सोच रहे हैं।”


बिहार में शिक्षा भवनों की स्थिति: एक आंकड़ों की डरावनी तस्वीर

बिहार में शिक्षा के क्षेत्र में इंफ्रास्ट्रक्चर की हालत गंभीर चिंता का विषय है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार:

  • राज्य के 50% से अधिक प्राथमिक विद्यालयों में सुरक्षित भवन नहीं हैं।
  • 35% स्कूलों की छतें जर्जर हैं।
  • 20% स्कूलों में टॉयलेट की सुविधा नहीं है।
  • 15% में लड़कियों के लिए अलग शौचालय नहीं है।
  • 40% स्कूलों में पीने के पानी की कोई गारंटी नहीं।

ये आंकड़े न केवल बच्चों की शिक्षा, बल्कि उनकी जान की सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े करते हैं।


नियम और हकीकत: क्या सरकार फेल हो रही है अपने ही मानकों पर?

राष्ट्रीय शिक्षा नीति और RTE (Right to Education) एक्ट 2009 के तहत हर स्कूल को सुरक्षित भवन, टॉयलेट, पीने का पानी, और बैठने की व्यवस्था देना अनिवार्य है। केंद्र सरकार द्वारा जारी ‘शिक्षा के लिए समग्र अभियान’ के तहत राज्यों को बजट आवंटन होता है, लेकिन सवाल है – क्या ये पैसे सही जगह लग रहे हैं?

स्थानीय शिक्षक रामानुज त्रिपाठी ने कहा,

“हमें हर महीने रिपोर्ट भरनी होती है, लेकिन मरम्मत का काम तब तक नहीं होता जब तक कोई हादसा न हो जाए। बजट है, लेकिन नीयत और प्रणाली दोनों कमजोर हैं।”


राजनीतिक प्रतिक्रियाएं: विपक्ष ने सरकार को घेरा

घटना सामने आने के बाद विपक्षी दलों ने राज्य सरकार और शिक्षा विभाग पर तीखा हमला बोला।

राजद नेता तेजस्वी यादव ने ट्वीट किया:

“बिहार के स्कूलों में अब भगवान भरोसे पढ़ाई होती है। न किताबें हैं, न शिक्षक पूरे हैं, और अब छतें भी जान लेने को तैयार बैठी हैं। नीतीश जी, बच्चों की जान बचाइए!”

वहीं भाजपा के नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी ने भी सवाल उठाया कि,

“केंद्र सरकार हर साल करोड़ों का बजट भेजती है, लेकिन राज्य सरकार उसे कहां खर्च करती है, इसकी निगरानी क्यों नहीं होती?”


शिक्षा विभाग की सफाई: ‘सर्वे चल रहा है’

रोहतास के जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) मनोज कुमार ने मीडिया से बात करते हुए कहा,

“हमने पूरे जिले में भवनों की स्थिति पर सर्वे शुरू कर दिया है। इस स्कूल के मामले में भी तकनीकी टीम भेजी जाएगी और मरम्मत कार्य प्राथमिकता पर होगा।”

हालांकि, ये बयान कितने प्रभावी होते हैं, यह आने वाला समय ही बताएगा।


ग्रामीण शिक्षा और असुरक्षित संरचनाएं: एक सामाजिक अन्याय

बिहार के गांवों में सरकारी स्कूलों की हालत यह सवाल उठाती है कि क्या गरीब और ग्रामीण बच्चों को ‘दूसरी श्रेणी’ की शिक्षा व्यवस्था दी जा रही है? अमीर बच्चों के लिए प्राइवेट स्कूलों में AC क्लास, डिजिटल लर्निंग, और फुलटाइम सेफ्टी स्टाफ है, जबकि गांव का बच्चा लोहे की सरिया लटकती छत के नीचे पढ़ता है।

क्या भारत की शिक्षा नीति इस दोहरेपन को देखकर भी चुप रहेगी?


क्या समाधान है? कुछ व्यावहारिक सुझाव

  1. वार्षिक भवन सुरक्षा ऑडिट: हर साल सभी सरकारी स्कूलों की इमारतों का स्वतंत्र ऑडिट होना चाहिए।
  2. स्थानीय निर्माण निधि: हर प्रखंड को मरम्मत के लिए त्वरित फंडिंग मिले।
  3. पंचायत भागीदारी: स्कूलों के रखरखाव में ग्राम पंचायतों को ज़िम्मेदार बनाया जाए।
  4. ऑनलाइन पारदर्शिता: मरम्मत बजट और टेंडर ऑनलाइन पोर्टल पर सार्वजनिक हो।
  5. RTI आधारित निगरानी: अभिभावक और सामाजिक कार्यकर्ता स्कूल भवन की जानकारी RTI से लेकर निगरानी करें।

निष्कर्ष: टल गया हादसा, लेकिन कब तक टलेगा?

रोहतास के सरकारी स्कूल में प्लास्टर गिरने की घटना केवल एक इत्तेफाक नहीं है, बल्कि एक चेतावनी है — एक ऐसी चेतावनी जिसे अनदेखा करना बच्चों के जीवन के साथ खिलवाड़ है।

इस घटना ने यह सिद्ध कर दिया है कि ‘शिक्षा का अधिकार’ अब केवल किताबों और अध्यापकों तक सीमित नहीं, बल्कि सुरक्षित बिल्डिंग, साफ पानी, स्वच्छ शौचालय और संरक्षित वातावरण तक फैल चुका है।

सरकारें आती-जाती रहेंगी, बजट आवंटित होते रहेंगे, योजनाएं बनती रहेंगी — लेकिन जब तक वह छत, जिससे प्लास्टर गिरा था, मरम्मत नहीं होती, तब तक हर बच्चा असुरक्षित रहेगा।

क्योंकि अगली बार वो क्लासरूम खाली नहीं भी हो सकता है…


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