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‘उदयपुर फाइल्स’ पर दिल्ली हाईकोर्ट सख्त: केंद्र सरकार को कट्स के फैसले पर दोबारा विचार का निर्देश

Delhi High Court strict on 'Udaipur Files': Central Government directed to reconsider the decision of cuts

एक बार फिर अदालत और सरकार के बीच की जटिल रेखाएं देश की संस्कृति, विचार और कानून के गलियारों में चर्चा का विषय बन गई हैं। इस बार मामला है विवादित फिल्म ‘उदयपुर फाइल्स’ का — एक ऐसी फिल्म जो न केवल अपने विषय को लेकर बहस में घिरी हुई है, बल्कि अब न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच नीतिगत असहमति का प्रतीक भी बन चुकी है।

दिल्ली हाई कोर्ट ने शुक्रवार को इस फिल्म पर केंद्र सरकार की ओर से लगाए गए कट्स को लेकर सख्त टिप्पणी की और कहा कि सरकार को अपने फैसले पर दोबारा विचार करना चाहिए। साथ ही, कोर्ट ने साफ कहा कि फिल्म को प्रमाणित करने के हर प्रोसेस में सिनेमैटोग्राफ एक्ट, 1952 और केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) के नियमों का सख्ती से पालन अनिवार्य है।


क्या है ‘उदयपुर फाइल्स’?

‘उदयपुर फाइल्स’ एक ऐसी फिल्म है जो 2022 में राजस्थान के उदयपुर में घटित एक वीभत्स हत्या की पृष्ठभूमि पर आधारित बताई जाती है। इसमें एक दर्जी कन्हैयालाल की हत्या कर दी गई थी, जब उसने पैगंबर मोहम्मद पर टिप्पणी करने वाले नुपुर शर्मा के समर्थन में एक सोशल मीडिया पोस्ट साझा किया था।

फिल्म निर्माता दावा करते हैं कि यह फिल्म “एक सच्ची घटना पर आधारित डॉकु-ड्रामा है, जो भारत में धार्मिक कट्टरता और जेहादी मानसिकता की सच्चाई को उजागर करती है।” वहीं आलोचकों का मानना है कि यह फिल्म सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा देती है और इससे समाज में तनाव फैल सकता है।


केंद्र सरकार का बदलता रुख: पहले मंजूरी, फिर ‘कट्स’ और अब पीछे हटने की तैयारी

जब फिल्म निर्माता सेंसर बोर्ड (CBFC) से सर्टिफिकेशन की प्रक्रिया में पहुंचे, तब फिल्म को ‘A’ सर्टिफिकेट (वयस्क दर्शकों के लिए) दिया गया, लेकिन इसके साथ ही बोर्ड ने कुछ दृश्यों और संवादों में कुल 12 कट्स लगाने की सिफारिश की। इनमें एक दृश्य में कुरान की आयतों को हटाने, कुछ संवादों को ‘मॉडरेट’ करने और हत्या के ग्राफिक दृश्य कम करने की बात शामिल थी।

हालांकि फिल्म निर्माता इन कट्स को लेकर सुप्रीम कोर्ट तक जाने की तैयारी में थे, लेकिन इसी बीच केंद्र सरकार ने अदालत को जानकारी दी कि वह CBFC के पिछले निर्णय की समीक्षा करेगी और जरूरी हुआ तो संशोधन करेगी। लेकिन इसके कुछ ही दिन बाद, सरकार ने बयान दिया कि वह अपने पुराने रुख पर पुनर्विचार कर रही है और अब उन कट्स को वापस लेने की योजना नहीं है।

इस ‘यू-टर्न’ ने ही दिल्ली हाई कोर्ट को नाराज़ कर दिया।


दिल्ली हाई कोर्ट का कड़ा रुख: “संवैधानिक प्रक्रिया से नहीं किया जा सकता समझौता”

दिल्ली हाई कोर्ट की बेंच ने अपने आदेश में कहा:

“अगर किसी फिल्म को CBFC सर्टिफाई करता है, तो उस प्रक्रिया में कानून का पालन होना अनिवार्य है। सरकार की नीति हो सकती है, लेकिन वह सिनेमैटोग्राफ एक्ट से ऊपर नहीं हो सकती। अगर कोई फिल्म सामाजिक अशांति फैला सकती है, तो भी उसे कानून के तहत ही नियंत्रित किया जाना चाहिए।”

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि:

  • केंद्र सरकार ‘पॉलिटिकल कंसीडरेशन’ के आधार पर अपने निर्णय नहीं बदल सकती।
  • CBFC के निर्णयों में पारदर्शिता और स्वतंत्रता जरूरी है।
  • फिल्में केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज पर गहरा प्रभाव छोड़ने वाला माध्यम हैं, इसलिए उनकी प्रमाणिकता और संवेदनशीलता दोनों का ध्यान रखा जाना चाहिए।

फिल्म निर्माता का पक्ष: “यह सच्चाई है, नफरत नहीं”

निर्देशक प्रशांत कुमार, जो पहले ‘काश्मीर डायरीज़’ में बतौर एडिटर काम कर चुके हैं, कहते हैं:

“हमने किसी समुदाय को टारगेट नहीं किया है। यह फिल्म एक निर्दोष व्यक्ति की हत्या और उस पर न्यायपालिका और मीडिया के रवैये की आलोचना करती है। कट्स लगाने का मतलब है कि हम आंखें मूंद लें उस कट्टरपंथी सोच पर, जो आज के भारत को खा रही है।”

निर्माता दल ने ये भी दावा किया कि फिल्म को पहले कई निजी स्क्रीनिंग्स में मुस्लिम बुद्धिजीवियों और पत्रकारों ने भी देखा और ‘मूल्यांकन करने योग्य दस्तावेजी प्रस्तुति’ कहा।


सेंसर बोर्ड की भूमिका पर बहस: क्या सरकार ‘सेंसर’ बन रही है?

सेंसर बोर्ड (CBFC) संविधानिक रूप से एक स्वतंत्र संस्था मानी जाती है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इसके निर्णयों में बार-बार केंद्र सरकार के हस्तक्षेप के आरोप लगते रहे हैं।

CBFC के पूर्व चेयरमैन पहलाज निहलानी ने कहा था कि

“सरकार चाहती है कि बोर्ड उसके राजनीतिक एजेंडे के मुताबिक चले। लेकिन ऐसा होता है तो कला की स्वतंत्रता और फिल्म के माध्यम से सच्चाई सामने लाने की ताकत खत्म हो जाएगी।”

‘उदयपुर फाइल्स’ का मामला इस चिंता को और गहरा करता है।


अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम सामाजिक जिम्मेदारी

भारत के संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, लेकिन अनुच्छेद 19(2) इस पर कुछ ‘यथोचित प्रतिबंध’ भी लगाता है — जैसे कि सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और राज्य की सुरक्षा के मद्देनज़र।

‘उदयपुर फाइल्स’ के विरोधियों का कहना है कि यह फिल्म:

  • धार्मिक भावनाएं भड़का सकती है
  • भारत की धर्मनिरपेक्ष छवि को चोट पहुंचा सकती है
  • चुनावी माहौल में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण बढ़ा सकती है

वहीं समर्थकों का कहना है कि:

  • यह केवल सच्चाई का प्रस्तुतीकरण है
  • जो घटना सार्वजनिक रिकॉर्ड में है, उसे छिपाना सेंसरशिप है
  • देश को अपनी कटु वास्तविकताओं से मुंह नहीं मोड़ना चाहिए

राजनीतिक रंग भी चढ़ा

जहां कांग्रेस और कुछ क्षेत्रीय दलों ने फिल्म को ‘ध्रुवीकरण की साजिश’ बताया, वहीं भाजपा के कुछ नेताओं ने खुलेआम फिल्म का समर्थन किया। भाजपा नेता कपिल मिश्रा ने ट्वीट किया:

“उदयपुर फाइल्स भारत के जख्मों की कहानी है। अगर आप इसमें नफरत देखते हैं, तो शायद आप सच्चाई से डरते हैं।”

वहीं AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि

“यह फिल्म समाज को बांटने का प्रयास है। जो घटना कानून के तहत सुलझ रही है, उसे एकतरफा दिखाना आग से खेलना है।”


भविष्य की दिशा: क्या ‘उदयपुर फाइल्स’ रिलीज़ होगी?

अब सवाल यह है कि फिल्म को रिलीज की अनुमति किस स्वरूप में दी जाएगी?

  • क्या फिल्म CBFC के कट्स के साथ रिलीज़ होगी?
  • या कोर्ट के निर्देश पर सरकार अपना रुख बदलेगी और बिना कट्स रिलीज़ की अनुमति देगी?
  • क्या फिल्म OTT प्लेटफॉर्म पर जाकर सेंसर से बच निकलेगी?
  • या फिर एक बार फिर अदालतों में लंबी लड़ाई का रास्ता अपनाया जाएगा?

इन सभी संभावनाओं पर अब नजरें टिकी हैं।


सिनेमा, समाज और अदालतें — तीनों की परीक्षा

‘उदयपुर फाइल्स’ का मामला सिर्फ एक फिल्म की रिलीज़ का नहीं है, यह उस बड़े प्रश्न का हिस्सा है जिसमें देश यह तय करने की कगार पर है कि कला की स्वतंत्रता और सामाजिक जिम्मेदारी में कैसे संतुलन बनाया जाए।

  • क्या हम सच्चाई से भाग रहे हैं या नफरत परोस रहे हैं?
  • क्या सरकारें कलात्मक प्रस्तुति को नियंत्रित कर सकती हैं?
  • क्या अदालतें इस विषय में संतुलन साध सकती हैं?

दिल्ली हाई कोर्ट का यह आदेश एक नज़ीर बन सकता है। यह स्पष्ट संकेत है कि कोई भी संस्था – चाहे वह सरकार हो या सेंसर बोर्ड – संविधान के नियमों से ऊपर नहीं है।


निष्कर्ष: फिल्म से ज्यादा बड़ा मुद्दा

‘उदयपुर फाइल्स’ पर हाई कोर्ट का फैसला एक बार फिर ये साबित करता है कि भारत में अब फिल्में सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं रहीं, बल्कि वे समाज का आइना भी हैं – कभी चुभता हुआ, कभी डरावना, और कभी सच्चाई से रूबरू कराता हुआ।

यह लड़ाई अब एक फिल्म की नहीं, सत्ता, सृजन और संविधान की त्रयी में संतुलन की है।

क्या देश इस संतुलन को साध पाएगा?

या फिर ‘कट्स’ की राजनीति सच्चाई को स्क्रीन पर आने से रोकती रहेगी?

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