भूमिका:
छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले से एक दिल दहला देने वाली खबर ने पूरे राज्य और पत्रकारिता जगत को झकझोर कर रख दिया है। पत्रकार मुकेश चंद्राकर की हत्या के मामले में पुलिस ने जो खुलासे किए हैं, वो न सिर्फ चौंकाने वाले हैं बल्कि शासन-प्रशासन और भ्रष्टाचार के गठजोड़ की भयावह तस्वीर भी पेश करते हैं। इस सनसनीखेज मामले में लोक निर्माण विभाग (PWD) के पांच अधिकारियों की गिरफ्तारी ने साफ कर दिया है कि मुकेश की हत्या कोई सामान्य आपराधिक वारदात नहीं, बल्कि एक गहरी साजिश का हिस्सा थी।
इस रिपोर्ट में हम विस्तार से जानेंगे कि मुकेश चंद्राकर कौन थे, उनकी रिपोर्टिंग में ऐसा क्या था जिससे भ्रष्ट अफसरों को खतरा महसूस हुआ, कैसे हत्या को अंजाम दिया गया, जांच में क्या-क्या सामने आया और आखिर इस पूरे कांड के पीछे की राजनीति और व्यवस्था की भूमिका क्या है।
1. कौन थे मुकेश चंद्राकर?
मुकेश चंद्राकर छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले में सक्रिय एक स्थानीय पत्रकार थे, जो ज़मीनी स्तर पर काम कर रहे थे। उन्होंने हाल के वर्षों में कई निर्माण परियोजनाओं, सड़क घोटालों और सरकारी योजनाओं में हो रहे भ्रष्टाचार को उजागर किया था। खासकर लोक निर्माण विभाग (PWD) की भ्रष्ट परियोजनाओं पर उनकी रिपोर्टिंग ने स्थानीय प्रशासन और ठेकेदारों की नींद उड़ा दी थी।
उनकी सबसे चर्चित रिपोर्ट थी — “कागजों पर बनी सड़क” — जिसमें उन्होंने एक सड़क परियोजना का पर्दाफाश किया था जो फाइलों में पूरी हो चुकी थी लेकिन ज़मीन पर उसका कोई अस्तित्व नहीं था।
2. हत्या की वारदात: कब, कैसे और कहां?
14 जुलाई 2025 की रात, बीजापुर जिले के भैरमगढ़ थाना क्षेत्र में पत्रकार मुकेश चंद्राकर की लाश एक सुनसान इलाके में मिली। उनकी बाइक पास में पड़ी थी, और शरीर पर गहरी चोट के निशान थे। पहले तो मामला सड़क हादसे के रूप में सामने लाया गया, लेकिन परिवार और पत्रकार संगठनों के दबाव के बाद पुलिस ने हत्या की आशंका पर जांच शुरू की।
पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि मुकेश की मौत सिर में लोहे की रॉड से प्रहार किए जाने के कारण हुई। यह सुनियोजित हत्या थी।
3. जांच में बड़ा मोड़: PWD अधिकारियों की भूमिका सामने आई
बीजापुर पुलिस ने जब मुकेश की कॉल डिटेल्स और हालिया रिपोर्ट्स की जांच की, तो उन्हें एक गहरी साजिश की बू आने लगी। उन्होंने उन प्रोजेक्ट्स की जांच शुरू की जिन पर मुकेश हाल ही में रिपोर्टिंग कर रहे थे। मुख्य रूप से दो प्रोजेक्ट्स पर उनका फोकस था:
- भैरमगढ़ सड़क निर्माण योजना — जिसकी लागत ₹8.5 करोड़ थी।
- वन क्षेत्र में बनी एक अधूरी पुलिया — जिसमें भारी वित्तीय अनियमितता थी।
इन दोनों प्रोजेक्ट्स से जुड़ी RTI रिपोर्ट्स भी मुकेश ने हासिल की थीं और उन्होंने अपने यूट्यूब चैनल पर वीडियो पोस्ट किए थे।
जांच के दौरान पुलिस को कई ऐसे सुराग मिले जिससे यह स्पष्ट हुआ कि लोक निर्माण विभाग के कुछ अधिकारी और ठेकेदार मिलकर इन भ्रष्टाचार के मामलों को दबाना चाहते थे।
4. गिरफ्तार कौन हुए?
20 जुलाई को बीजापुर पुलिस ने लोक निर्माण विभाग के जिन पांच अधिकारियों को गिरफ्तार किया, उनके नाम हैं:
- आरके साहू – एग्जीक्यूटिव इंजीनियर
- शिव प्रसाद नेताम – सहायक अभियंता
- दिनेश सोनी – सब इंजीनियर
- नरेंद्र ठाकुर – डिवीजन अकाउंटेंट
- लोकेश वर्मा – PWD के ठेकेदार के साथ मिलीभगत वाला विभागीय सुपरवाइज़र
इन सभी पर धारा 302 (हत्या), 120B (साजिश), और भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम की धाराएं लगाई गई हैं।
पुलिस के मुताबिक, इन अधिकारियों ने हत्या के लिए अपराधियों को सुपारी दी थी, ताकि मुकेश की आवाज हमेशा के लिए बंद की जा सके।
5. कैसे हुआ हत्या का षड्यंत्र?
जांच में यह भी सामने आया है कि मुकेश की गतिविधियों पर इन अधिकारियों ने नज़र रखना शुरू कर दिया था। RTI लगाने और खुलासे करने के बाद उन्हें कई बार धमकी भरे फोन आए। कुछ स्थानीय पत्रकारों ने भी बताया कि मुकेश को यह चेतावनी दी गई थी कि वो “सरकार के काम में टांग न अड़ाएं”।
हत्या की रात, मुकेश को किसी “सूचना स्रोत” के बहाने भैरमगढ़ बुलाया गया। पुलिस को संदेह है कि उन्हीं अधिकारियों ने एक स्थानीय अपराधी गिरोह की मदद से इस हत्या को अंजाम दिलवाया।
6. पत्रकार संगठनों और सामाजिक संस्थाओं का आक्रोश
मुकेश की हत्या के बाद पूरे छत्तीसगढ़ में पत्रकार संगठनों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया। रायपुर, बिलासपुर, जगदलपुर और दुर्ग में सड़कों पर मोमबत्ती मार्च निकाले गए। प्रमुख मांगें थीं:
- CBI या SIT से निष्पक्ष जांच
- सभी आरोपियों की गिरफ्तारी
- पत्रकार सुरक्षा कानून लागू किया जाए
- मुकेश के परिवार को सरकारी मुआवज़ा और नौकरी
छत्तीसगढ़ पत्रकार सुरक्षा संघ ने राज्य सरकार को 7 दिन का अल्टीमेटम दिया था, जिसके बाद पुलिस ने तेजी से कार्रवाई शुरू की।
7. सरकार की प्रतिक्रिया: दबाव में कार्रवाई या प्रतिबद्धता?
बीजापुर में इस घटना के बाद मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की सरकार पर विपक्ष का जबरदस्त दबाव पड़ा। कांग्रेस सरकार की छवि ‘जनपक्षधर’ होने की रही है, लेकिन इस मामले ने उनकी प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल खड़े कर दिए।
मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा:
“हम पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर प्रतिबद्ध हैं। दोषी कोई भी हो, बख्शा नहीं जाएगा।”
हालांकि भाजपा नेताओं ने इसे “घोटालों की पोल खोलने वाले की हत्या” बताया और SIT के बजाय CBI जांच की मांग की।
8. पत्रकारिता और भ्रष्टाचार: एक खतरनाक टकराव
छत्तीसगढ़ जैसे राज्य, जहां एक ओर नक्सलवाद की चुनौती है, वहीं दूसरी ओर सरकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार भी गहरे पैठ बनाए हुए है। ज़मीनी पत्रकारिता करने वाले रिपोर्टरों के लिए यह दोहरी चुनौती है — एक तरफ अपराधी और ठेकेदार, दूसरी तरफ प्रशासन का दबाव।
मुकेश की हत्या ये दर्शाती है कि सूचना के अधिकार (RTI) और स्वतंत्र पत्रकारिता, सत्ता के लिए कितनी असहज स्थिति पैदा कर सकते हैं। और जब राज्यतंत्र भ्रष्ट तत्वों के साथ मिल जाए, तो एक अकेले पत्रकार की जिंदगी कितनी असुरक्षित हो जाती है।
9. क्या हैं अगला कदम: जांच और न्याय की राह
बीजापुर पुलिस ने संकेत दिए हैं कि इस साजिश में कुछ ठेकेदार और राजनीतिक संबंध भी सामने आ सकते हैं। जांच के अगले चरण में निम्न बातें महत्वपूर्ण होंगी:
- सुपारी किलर की पहचान और गिरफ्तारी
- मॉबाइल कॉल रिकॉर्ड और चैट्स की फॉरेंसिक जांच
- RTI दस्तावेजों से जुड़े अधिकारियों की भूमिका
- राजनीतिक संरक्षण की जांच
फिलहाल, मामला जिला अदालत में है और गिरफ्तार अफसर न्यायिक हिरासत में भेजे गए हैं।
10. पत्रकार सुरक्षा कानून: एक बार फिर बहस में
मुकेश की हत्या ने फिर से यह बहस छेड़ दी है कि क्या भारत को एक राष्ट्रीय स्तर पर पत्रकार सुरक्षा कानून की जरूरत है? राजस्थान, महाराष्ट्र और हिमाचल जैसे कुछ राज्यों में पत्रकार संरक्षण नीति है, लेकिन वह अपर्याप्त मानी जाती है।
नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (NUJ) ने केंद्र सरकार से मांग की है कि:
- पत्रकारों की जान-माल की सुरक्षा सुनिश्चित हो
- धमकी देने वालों के खिलाफ सख्त कानून बने
- छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों के रिपोर्टरों को विशेष सुरक्षा मिले
निष्कर्ष:
मुकेश चंद्राकर की हत्या सिर्फ एक पत्रकार की हत्या नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र की आत्मा पर हमला है। जब एक ईमानदार रिपोर्टर भ्रष्टाचार को उजागर करता है और उसकी कीमत अपनी जान से चुकानी पड़ती है, तो यह हमें बताता है कि देश में व्यवस्था कितनी सड़ चुकी है।
PWD जैसे विभाग, जो जनता के पैसे से सड़कें और पुल बनाते हैं, अगर उन्हीं में बैठे अफसर एक पत्रकार की हत्या की साजिश रचने लगें — तो यह सिस्टम की नैतिक मृत्यु है। सवाल सिर्फ यह नहीं कि दोषी कौन है, सवाल यह भी है कि हम ऐसे अपराधों से क्या सबक लेंगे?
क्या हम ऐसे पत्रकारों को सम्मान देंगे या उनकी चुप चीखों को नजरअंदाज कर देंगे?
क्योंकि अगर आज मुकेश चंद्राकर के लिए न्याय नहीं मिला — तो कल और कितने मुकेश इसी अंधेरे में खो जाएंगे, हमें खुद भी नहीं पता चलेगा।








Leave a Reply