भूमिका: सपनों की कोई कीमत नहीं होती
“मां ने मिठाई के पैसे नहीं होने पर चीनी खिलाकर मुंह मीठा किया…”
ये कोई फिल्मी डायलॉग नहीं, बल्कि एक सच्ची घटना है, जो बताती है कि जब इरादे मजबूत हों, तो किस्मत को भी झुकना पड़ता है। आज की यह कहानी है एक ऐसे युवा की, जिसने कभी स्विगी पर डिलीवरी बॉय की नौकरी की, तो कभी किताबें बेचकर अपनी पढ़ाई चलाई। और आखिरकार आज वो बन चुका है डिप्टी कलेक्टर।
परिचय: बिहार का बेटा, पूरे देश की प्रेरणा
बात हो रही है बिहार के औरंगाबाद जिले के रहने वाले विकास कुमार की, जो हाल ही में बीपीएससी (BPSC) की परीक्षा में सफलता हासिल कर डिप्टी कलेक्टर बन गया है। विकास की कहानी सिर्फ एक परीक्षार्थी की नहीं, बल्कि लाखों युवाओं की उम्मीद और संघर्ष की मिसाल है।
गरीबी की कोख से पले सपने
विकास का परिवार एक बेहद सामान्य आर्थिक स्थिति वाला था। पिता खेती-बाड़ी करते थे, और मां गृहिणी थीं। परिवार इतना साधन-संपन्न नहीं था कि किताबें, कोचिंग, इंटरनेट जैसी सुविधाएं नियमित मिल पातीं। लेकिन विकास का सपना था– “कुछ बड़ा करना है, कुछ ऐसा जो पूरे गांव और जिले का नाम रौशन कर दे।”
जब वह 10वीं में थे, तभी उनके पिता बीमार पड़ गए और घर की आर्थिक स्थिति और चरमरा गई। ऐसे में पढ़ाई को जारी रखना किसी जंग लड़ने से कम नहीं था।
स्विगी की नौकरी और पढ़ाई साथ-साथ
जब विकास कॉलेज के लिए पटना आए, तो रहने-खाने के खर्चे निकालने के लिए उन्होंने स्विगी में डिलीवरी बॉय की नौकरी शुरू की। सुबह से दोपहर तक ऑर्डर डिलीवर करते और फिर शाम से देर रात तक पढ़ाई करते।
“कई बार ऐसा हुआ कि पढ़ते-पढ़ते नींद आ जाती थी, लेकिन सपनों को नींद नहीं आती थी…” — विकास
मां की ममता: मिठाई नहीं, तो चीनी ही सही
बीपीएससी में सेलेक्शन की खबर जब घर पहुंची, तो मां ने सबसे पहले बेटी का मुंह मीठा कराया। लेकिन घर में मिठाई नहीं थी… न पैसे थे।
तब उन्होंने चीनी खिलाकर कहा – “बेटा अफसर बना है, अब कोई कमी नहीं रहेगी।”
ये पल विकास के जीवन का सबसे भावुक क्षण था।
किताबें बेचकर जुटाया कोचिंग का खर्च
पटना में रहकर बीपीएससी की तैयारी करना आसान नहीं था। कोचिंग की फीस, किताबें, नोट्स – सब कुछ महंगा था। ऐसे में विकास ने पुराने स्टेशनरी स्टोर्स में जाकर पुरानी किताबें बेचकर कुछ पैसे जुटाए। साथ ही, ई-कॉमर्स साइटों पर काम करके अतिरिक्त खर्च निकालते रहे।
हार न मानी, तीन बार असफल हुए लेकिन रुके नहीं
विकास की सफलता एक रात में नहीं आई। उन्होंने तीन बार बीपीएससी की परीक्षा दी, हर बार असफल रहे, लेकिन कभी हार नहीं मानी। चौथी बार में उन्होंने शानदार प्रदर्शन करते हुए राज्य की टॉप रैंक में जगह बनाई।
मां ही बनीं कोच, मोटिवेटर और सबसे बड़ा सहारा
जब थक जाते थे, तो मां की आवाज उन्हें फिर से उठ खड़ा करती थी। मां कहती थीं –
“बेटा, भूख से मत डर, हालात से लड़। तू पढ़, तू बढ़, तू ही हमारा कल है।”
मां कभी स्कूल नहीं गई थीं, लेकिन उन्होंने अपने बेटे को किताबों से दोस्ती करना सिखाया।
पढ़ाई का रूटीन: अनुशासन और धैर्य की मिसाल
विकास का डेली रूटीन बेहद अनुशासित था:
- सुबह 6 बजे उठकर 3 घंटे पढ़ाई
- फिर 10 से 2 बजे तक डिलीवरी का काम
- 3 से 8 बजे तक कोचिंग और सेल्फ स्टडी
- रात 10 बजे तक फिर पढ़ाई और रिवीजन
ये रूटीन उन्होंने 2 साल तक बिना ब्रेक के निभाया।
BPSC इंटरव्यू में पूछा गया सवाल
विकास से इंटरव्यू में पूछा गया –
“आपको एक डिप्टी कलेक्टर के तौर पर सबसे पहले क्या करना है?”
उन्होंने जवाब दिया –
“जो युवा संसाधनों की कमी के कारण पीछे रह जाते हैं, उनके लिए शिक्षा, स्कॉलरशिप और करियर गाइडेंस की व्यवस्था करना मेरी पहली प्राथमिकता होगी।”
अब क्या करेंगे विकास कुमार?
डिप्टी कलेक्टर बनने के बाद विकास ने कहा:
“मेरे जैसे लाखों युवाओं को उम्मीद देने की जिम्मेदारी अब मेरी है। मैं सिर्फ प्रशासन नहीं, लोगों की सेवा करूंगा। जो दर्द खुद सहा है, वो अब दूसरों को ना सहना पड़े।”
सोशल मीडिया पर बधाईयों की बाढ़
विकास की सफलता की खबर जैसे ही सामने आई, सोशल मीडिया पर लोग उन्हें “रियल हीरो”, “प्रेरणा पुरुष”, “मां-बेटे की मिसाल” जैसे शब्दों से नवाजने लगे।
- IAS ऑफिसर अवनीश शरण ने ट्वीट किया – “यह कहानी हर युवा को पढ़नी चाहिए, जो सपनों के लिए संघर्ष कर रहे हैं।”
- सोशल मीडिया यूज़र्स ने लिखा – “स्विगी से सरकार तक का सफर, फिल्म बननी चाहिए इस पर!”
दूसरे युवाओं को क्या संदेश दिया विकास ने?
“पैसे, कोचिंग या अंग्रेजी नहीं चाहिए। अगर जिद है, तो मंज़िल ज़रूर मिलेगी।
जो आज तुम्हें देख कर हँसते हैं, एक दिन वही तुम्हारी बधाईयां गिनेंगे।”
निष्कर्ष: संघर्ष से सफलता का सफर
विकास कुमार की कहानी बताती है कि:
- हालात कभी इतने बुरे नहीं होते कि बदले न जा सकें।
- मां की ममता और बेटे का हौसला मिल जाए, तो कोई भी मंज़िल दूर नहीं।
- अफसर बनने के लिए सिर्फ किताबें नहीं, जज़्बा चाहिए।
अंत में…
हम उम्मीद करते हैं कि विकास कुमार की संघर्षगाथा न सिर्फ युवाओं को प्रेरणा देगी, बल्कि लाखों मां-बाप के आंसुओं को मुस्कान में बदलने का ज़रिया बनेगी।
ये कहानी हर उस व्यक्ति के लिए है जो सपनों को थक कर छोड़ देता है। याद रखिए…
“अगर दिल से चाहा जाए, तो स्विगी डिलीवरी बॉय भी देश का डिप्टी कलेक्टर बन सकता है।”















Leave a Reply