भूमिका:
भारत और यूनाइटेड किंगडम (यूके) के बीच वर्षों से लंबित मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को लेकर गुरुवार का दिन ऐतिहासिक माना जा रहा है। लंदन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर की उपस्थिति में इस बहुप्रतीक्षित समझौते पर आधिकारिक मुहर लगाई गई।
इस समझौते को लेकर जहाँ सरकार इसे आर्थिक सुधारों की दिशा में एक बड़ी जीत के रूप में पेश कर रही है, वहीं विपक्षी दल कांग्रेस ने इस मौके को केंद्र सरकार पर हमला बोलने के लिए इस्तेमाल किया है। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि भारत को यूके से “FTA” यानी “Fugitive Transfer Agreement” की भी ज़रूरत है, ताकि भगोड़े आर्थिक अपराधियों की वापसी सुनिश्चित की जा सके।
यह रिपोर्ट एक ओर जहां इस नए व्यापार समझौते के प्रमुख बिंदुओं की विवेचना करती है, वहीं कांग्रेस की प्रतिक्रिया और भगोड़े अपराधियों के मसले को भी समग्र रूप से प्रस्तुत करती है।
I. भारत-यूके FTA: क्या है समझौते में खास?
1. वर्षों की बातचीत का नतीजा:
भारत और ब्रिटेन के बीच FTA को लेकर चर्चा की शुरुआत 2022 में हुई थी। लगभग दो साल तक चली 13 दौर की वार्ताओं के बाद आखिरकार इस पर सहमति बनी है। यह डील ब्रेक्सिट के बाद ब्रिटेन की सबसे बड़ी द्विपक्षीय व्यापार संधि मानी जा रही है।
2. व्यापार में वृद्धि की संभावना:
ब्रिटिश सरकार द्वारा जारी फैक्टशीट के मुताबिक, यह समझौता दो तरफा व्यापार को मौजूदा लगभग 58 अरब डॉलर से बढ़ाकर लंबी अवधि में 92 अरब डॉलर तक ले जाने में सक्षम होगा।
3. भारत को टैरिफ राहत:
भारत को इस समझौते में लगभग 99% टैरिफ लाइनों पर शून्य शुल्क की सुविधा मिलेगी। इससे भारत की निर्यात वस्तुओं को ब्रिटिश बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धात्मक कीमतों पर जगह मिलेगी।
4. सेवा क्षेत्र को भी लाभ:
भारत का सेवा क्षेत्र, विशेषकर IT और फार्मा कंपनियाँ, ब्रिटेन में अपने कारोबार को विस्तार दे सकेंगी। वहीं भारतीय छात्रों और पेशेवरों को वीज़ा प्रक्रियाओं में कुछ छूटों की भी उम्मीद है।
5. विनिर्माण और कृषि:
ब्रिटेन भारत से चाय, मसाले, बासमती चावल, टेक्सटाइल और ऑटोमोबाइल सेक्टर के आयात में बड़ी छूट देगा, जिससे भारतीय MSMEs को यूरोपीय बाज़ारों में स्थायी जगह मिल सकती है।
II. कांग्रेस का तंज: ‘FTA नहीं, Fugitive Transfer Agreement चाहिए’
1. जयराम रमेश का ट्वीट:
कांग्रेस महासचिव और संचार विभाग प्रभारी जयराम रमेश ने X (पूर्व ट्विटर) पर पोस्ट करते हुए लिखा:
“मोदी मॉडल की भगोड़ानॉमिक्स के तीन सितारे अभी भी अपनी ‘घर वापसी’ का इंतज़ार कर रहे हैं – विजय माल्या, नीरव मोदी और ललित मोदी। ऐसे और भी हो सकते हैं।”
2. FTA की जगह Fugitive Transfer Agreement की मांग:
कांग्रेस ने सरकार से यह सवाल पूछा कि क्या प्रधानमंत्री मोदी ब्रिटिश प्रधानमंत्री से यह भी अनुरोध करेंगे कि जो भगोड़े आर्थिक अपराधी ब्रिटेन में शरण लिए बैठे हैं, उन्हें भारत को सौंपा जाए?
3. भगोड़े कौन हैं और क्या है स्थिति?
- विजय माल्या:
किंगफिशर एयरलाइंस के मालिक विजय माल्या पर लगभग 9,000 करोड़ रुपये की बैंक धोखाधड़ी का आरोप है। वह 2016 से ब्रिटेन में हैं। भारत ने उनके प्रत्यर्पण की मांग की, जिसे ब्रिटिश अदालत ने स्वीकार कर लिया, लेकिन माल्या की याचिकाओं और ब्रिटेन की राजनीतिक प्रक्रिया के चलते प्रत्यर्पण अब तक लंबित है। - नीरव मोदी:
पंजाब नेशनल बैंक घोटाले में वांछित, नीरव मोदी पर लगभग 13,500 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी का आरोप है। वह भी लंदन में है और ब्रिटेन की वेस्टमिंस्टर कोर्ट ने 2021 में प्रत्यर्पण की अनुमति दे दी थी। लेकिन उसके मानसिक स्वास्थ्य और मानवाधिकार की दुहाई देते हुए अपीलें अभी जारी हैं। - ललित मोदी:
इंडियन प्रीमियर लीग (IPL) के संस्थापक ललित मोदी पर मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप हैं। वह वर्षों से ब्रिटेन में हैं और भारत आने से बचते रहे हैं।
III. भगोड़े और प्रत्यर्पण: भारत की चुनौतियाँ
1. प्रत्यर्पण संधि है, लेकिन धीमी प्रक्रिया:
भारत और यूके के बीच 1992 से प्रत्यर्पण संधि मौजूद है। इसके बावजूद प्रक्रिया बेहद जटिल और लंबी है। प्रत्यर्पण के मामलों में ब्रिटेन के मानवाधिकार कानून, मानसिक स्वास्थ्य मूल्यांकन, और राजनीतिक शरण की अपीलें अक्सर बाधा बनती हैं।
2. भारत की रणनीति और कूटनीतिक प्रयास:
भारत सरकार इन मामलों में बार-बार ब्रिटिश सरकार से संपर्क करती रही है, लेकिन घरेलू कानूनों और कानूनी प्रक्रिया की लंबाई के चलते निर्णायक सफलता नहीं मिल पाई।
3. क्या FTA में प्रत्यर्पण तंत्र जुड़ सकता था?
कई विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार जब एक व्यापक आर्थिक समझौता हो रहा है, तो इसमें अपराधियों की वापसी और प्रत्यर्पण व्यवस्था को भी प्राथमिकता दी जानी चाहिए थी।
IV. राजनीतिक अर्थशास्त्र: भगोड़ानॉमिक्स बनाम ट्रेड डील्स
1. विपक्ष का नैरेटिव:
कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इस बात पर जोर दे रहे हैं कि सरकार बड़े-बड़े व्यापारिक वादे करती है, लेकिन आम आदमी का पैसा लेकर विदेश भागे अपराधियों को वापस लाने में विफल रही है।
‘भगोड़ानॉमिक्स’ शब्द का प्रयोग कर कांग्रेस ने मोदी सरकार की उस छवि पर सवाल खड़े किए हैं, जो खुद को भ्रष्टाचार विरोधी और राष्ट्रवादी बताती है।
2. सरकार की स्थिति:
सरकार का दावा है कि उसने हर कानूनी उपाय अपनाए हैं। ईडी और सीबीआई जैसी एजेंसियों ने साक्ष्य दिए हैं, प्रत्यर्पण याचिकाएँ दायर की हैं, और विदेश मंत्रालय ने राजनीतिक वार्ताएं भी की हैं। लेकिन ब्रिटेन की आंतरिक व्यवस्था बाधक रही है।
V. भारत-ब्रिटेन संबंध: नए युग की शुरुआत या अधूरी तस्वीर?
1. विजन 2035 रोडमैप:
FTA के साथ भारत और ब्रिटेन ने “यूके-इंडिया विजन 2035” नामक एक नई रणनीतिक साझेदारी की घोषणा की है। इसमें रक्षा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ग्रीन एनर्जी, शिक्षा और डिजिटलीकरण जैसे क्षेत्रों में सहयोग को बढ़ाने की बात की गई है।
2. डिप्लोमेसी बनाम कानून:
ब्रिटेन जैसे लोकतांत्रिक देशों में कानून का शासन सर्वोच्च होता है। ऐसे में प्रत्यर्पण जैसे मुद्दे केवल प्रधानमंत्री स्तर की बातचीत से हल नहीं होते, उन्हें अदालतों की मंज़ूरी चाहिए।
3. लेकिन क्या राजनीति अछूती रह सकती है?
कांग्रेस के तंज का राजनीतिक असर हो सकता है। विशेषकर जब लोकसभा चुनाव के बाद प्रधानमंत्री मोदी का यह पहला बड़ा विदेश दौरा है, और सरकार अपनी कूटनीतिक सफलताओं को पेश कर रही है।
निष्कर्ष:
भारत-यूके FTA निश्चित ही एक ऐतिहासिक और दूरगामी समझौता है। इससे न केवल दोनों देशों के व्यापार में नई गति आएगी, बल्कि यह ब्रेक्सिट के बाद ब्रिटेन की वैश्विक नीति में भारत की केंद्रीयता को भी दर्शाता है।
हालाँकि कांग्रेस की तरफ से उठाया गया भगोड़े अपराधियों का मुद्दा भी उतना ही गंभीर है। जब भारत दुनिया के साथ आर्थिक साझेदारियाँ कर रहा है, तो उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि उसकी न्यायिक मांगें भी उतनी ही प्राथमिकता पाएँ।
एक ओर जहाँ समझौते से बासमती चावल और टेक्सटाइल के निर्यात को फायदा मिलेगा, वहीं दूसरी ओर देश की जनता ये भी जानना चाहती है कि उनके खून-पसीने की कमाई लेकर जो अपराधी विदेश भागे हैं, क्या वे कभी कानून के शिकंजे में आएँगे?
FTA की सफलता तभी पूर्ण मानी जाएगी, जब उसमें आर्थिक लाभ के साथ-साथ न्याय और पारदर्शिता का भाव भी सम्मिलित हो।















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