नई दिल्ली, 23 जुलाई 2025: संसद का मानसून सत्र एक बार फिर राजनीतिक गतिरोध की भेंट चढ़ गया है। बिहार में चल रहे मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) को लेकर विपक्ष के हंगामे ने दोनों सदनों की कार्यवाही को पूरी तरह ठप कर दिया। मंगलवार के बाद बुधवार को भी संसद में कोई विधायी कामकाज नहीं हो सका। इस गतिरोध में खेल प्रशासन विधेयक (Sports Governance Bill, 2025) की प्रस्तुति भी टल गई, जिसे आज पेश किया जाना था।
विपक्ष के आक्रोश का केंद्र बना है बिहार, जहां विशेष पुनरीक्षण अभियान के तहत मतदाता सूचियों को अद्यतन किया जा रहा है। विपक्ष का आरोप है कि यह प्रक्रिया एकतरफा, पक्षपातपूर्ण और संभावित रूप से धार्मिक-जातीय आधार पर भेदभावपूर्ण है, जो निष्पक्ष चुनावी व्यवस्था के लिए खतरनाक हो सकती है।
लोकसभा: “सड़क जैसा आचरण”, अध्यक्ष ओम बिड़ला की सख़्त टिप्पणी
बुधवार को जैसे ही लोकसभा की कार्यवाही शुरू हुई, विपक्षी सांसद हाथों में तख्तियां और पोस्टर लेकर वेल में पहुंच गए। वे जोर-जोर से नारेबाज़ी करने लगे और “बिहार SIR पर चर्चा करो”, “लोकतंत्र बचाओ” जैसे नारे लगाए।
इस पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला ने सख्त प्रतिक्रिया दी और कहा कि यह व्यवहार संसदीय परंपराओं के अनुकूल नहीं है। उन्होंने टिप्पणी करते हुए कहा:
“यह आचरण सड़क जैसा है। संसद की गरिमा बनाए रखना हम सभी की जिम्मेदारी है। विरोध दर्ज करना आपका अधिकार है, लेकिन नियमों और प्रक्रिया के तहत।”
अध्यक्ष ने बार-बार सांसदों से अनुरोध किया कि वे अपनी सीटों पर लौटें और विषय को नियमानुसार उठाएं, लेकिन विपक्ष का विरोध थमता नहीं दिखा। अंततः सदन को दिनभर के लिए स्थगित कर दिया गया।
राज्यसभा: हर घंटे पर स्थगन, अंततः पूरे दिन की कार्यवाही ठप
राज्यसभा की स्थिति भी कुछ अलग नहीं रही। जैसे ही सदन की कार्यवाही शुरू हुई, विपक्षी दलों के सांसदों ने शोरगुल शुरू कर दिया और SIR मुद्दे पर चर्चा की मांग को लेकर नारेबाज़ी करने लगे।
उपसभापति हरिवंश ने सदन को पहले दोपहर 12 बजे तक स्थगित किया। दोपहर में जब सदन पुनः बैठा, तो हालात पहले जैसे ही रहे। हंगामा जारी रहा और अंततः राज्यसभा को भी दिनभर के लिए स्थगित करना पड़ा।
क्या है SIR विवाद?
बिहार में चुनाव आयोग द्वारा 1 जुलाई से शुरू किए गए विशेष पुनरीक्षण अभियान (Special Intensive Revision) के तहत 18 वर्ष से ऊपर के नए मतदाताओं को जोड़ने, मृत या डुप्लीकेट नामों को हटाने और मौजूदा रिकॉर्ड को अपडेट करने का कार्य किया जा रहा है।
लेकिन विपक्ष ने आरोप लगाया है कि इस प्रक्रिया में:
- जातीय और धार्मिक अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया जा रहा है,
- कई स्थानों पर दस्तावेज़ों की वैधता को लेकर मनमानी हो रही है,
- और यह पूरी प्रक्रिया राजनीतिक दबाव में संचालित हो रही है।
राष्ट्रीय जनता दल (राजद), कांग्रेस, वाम दल, TMC और AAP जैसी पार्टियों ने इस पर संसद में तत्काल चर्चा की मांग की है और गृह मंत्री से स्पष्टीकरण की मांग की है।
भाजपा की प्रतिक्रिया: “असली मकसद चुनावी एजेंडा बनाना”
सत्तारूढ़ भाजपा ने विपक्ष के आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि यह प्रक्रिया पूरी तरह निष्पक्ष है और चुनाव आयोग की देखरेख में हो रही है।
भाजपा प्रवक्ता का कहना है कि:
“विपक्ष को बिहार में आगामी विधानसभा चुनावों का डर सता रहा है, इसलिए वह जनहित की प्रक्रिया को बाधित करने का प्रयास कर रहा है। यह पूरी तरह चुनाव आयोग का प्रशासनिक निर्णय है, इसमें केंद्र सरकार की कोई भूमिका नहीं है।”
हंगामे की भेंट चढ़ा खेल प्रशासन विधेयक
इस राजनीतिक गतिरोध का सीधा असर खेल प्रशासन विधेयक, 2025 (Sports Governance Bill) पर पड़ा, जो आज संसद में पेश किया जाना था। यह विधेयक भारतीय खेल क्षेत्र में सुधार लाने के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
विधेयक का उद्देश्य है:
- खेल विवादों के त्वरित समाधान के लिए खेल न्यायाधिकरण (Sports Tribunal) की स्थापना,
- इस ट्रिब्यूनल की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश द्वारा की जाएगी,
- और यह खिलाड़ियों, संघों और अधिकारियों के बीच के विवादों को जल्दी और निष्पक्ष ढंग से सुलझाएगा।
सरकार का तर्क है कि इस कानून से:
- मौजूदा न्यायपालिका पर बोझ कम होगा,
- खेल क्षेत्र में अनुशासन और पारदर्शिता बढ़ेगी,
- और खिलाड़ियों को न्याय के लिए सालों इंतज़ार नहीं करना पड़ेगा।
लेकिन विपक्षी हंगामे के चलते यह विधेयक आज सदन में पेश नहीं किया जा सका।
संसद में ठप कामकाज: लोकतंत्र या रणनीति?
इस लगातार ठप होती संसद पर जनता के बीच भी चर्चा तेज़ हो गई है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह लोकतंत्र की रक्षा का संघर्ष है या महज़ राजनीतिक रणनीति?
विश्लेषकों का मानना है कि विपक्ष SIR को लेकर व्यापक जनसमर्थन और मीडिया ध्यान आकर्षित करने का प्रयास कर रहा है, जबकि सरकार का रवैया इसे “अति-राजनीतिक” बताकर दबाने का है।
संसद में बार-बार हंगामे और स्थगनों के कारण:
- कई महत्वपूर्ण विधेयक लंबित पड़े हैं,
- बजटीय आवंटनों और नीतिगत निर्णयों पर चर्चा नहीं हो पा रही,
- और संसदीय परंपराओं का क्षरण हो रहा है।
आगे क्या?
विपक्ष की मांगें:
- गृह मंत्री संसद में बयान दें,
- SIR की प्रक्रिया पर बहस हो,
- स्वतंत्र जांच की घोषणा की जाए।
सरकार का रुख:
- चुनाव आयोग स्वतंत्र संस्था है,
- संसद की कार्यवाही बाधित न की जाए,
- बहस नियमानुसार हो, हंगामे से नहीं।
निष्कर्ष
बिहार की मतदाता सूची में विशेष पुनरीक्षण को लेकर उपजा विवाद अब संसद की कार्यवाही को सीधे प्रभावित कर रहा है। जहां एक ओर विपक्ष इसे लोकतंत्र की रक्षा की लड़ाई बता रहा है, वहीं सरकार इसे “राजनीतिक शोर” करार दे रही है।
इस गतिरोध का खामियाजा न सिर्फ खेल प्रशासन जैसे अहम विधेयकों को उठाना पड़ रहा है, बल्कि देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं की साख और कार्यक्षमता पर भी प्रश्नचिन्ह लग रहा है।
अब यह देखना होगा कि क्या सरकार और विपक्ष किसी मध्य मार्ग पर पहुँचकर संसद को सुचारु रूप से चलने देंगे, या फिर मानसून सत्र भी सिर्फ स्थगनों और नारों की गूंज में गुम हो जाएगा।















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