भारत और चीन के संबंधों में लंबे समय के बाद एक नई सकारात्मक ऊर्जा देखने को मिल रही है। विदेश मंत्री एस जयशंकर की चीन यात्रा ने इस बात की पुष्टि कर दी है कि दोनों पड़ोसी देश, जो कई वर्षों से सीमाई विवाद और कूटनीतिक तनावों से जूझ रहे थे, अब संबंधों को सामान्य करने और सहयोग को पुनर्जीवित करने की दिशा में ठोस कदम उठा रहे हैं।
बीजिंग में हुई अहम मुलाकात
15 जुलाई 2025 को विदेश मंत्री एस जयशंकर ने बीजिंग पहुंचने के तुरंत बाद चीन के उपराष्ट्रपति हान झेंग से मुलाकात की। यह बैठक प्रतीकात्मक ही नहीं, बल्कि रणनीतिक दृष्टिकोण से भी अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है। बैठक के दौरान जयशंकर ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भारत चीन की शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की अध्यक्षता का समर्थन करता है और द्विपक्षीय संबंधों में सुधार को लेकर आशावादी है।
ट्विटर (अब X) पर उन्होंने लिखा:
“बीजिंग पहुंचने के तुरंत बाद उपराष्ट्रपति हान झेंग से मुलाकात कर खुशी हुई। चीन की SCO अध्यक्षता को भारत का समर्थन दिया। द्विपक्षीय संबंधों में सुधार को रेखांकित किया और इस यात्रा के दौरान चर्चा की सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ने की उम्मीद जताई।”
पीएम मोदी और जिनपिंग की पिछली मुलाकात का प्रभाव
बैठक में जयशंकर ने इस बात को दोहराया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच कज़ान, रूस में अक्टूबर 2024 में हुई मुलाकात के बाद दोनों देशों के संबंधों में सुधार देखा गया है। उन्होंने कहा:
“जैसा कि आपने भी उल्लेख किया, प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति जिनपिंग की कज़ान में हुई मुलाकात के बाद से हमारे संबंधों में स्थिरता और सकारात्मकता का रुख आया है। मुझे विश्वास है कि मेरी इस यात्रा के दौरान होने वाली चर्चाएं इसी सकारात्मक दिशा को और मजबूत करेंगी।”
कूटनीतिक रिश्तों की 75वीं वर्षगांठ और कैलाश मानसरोवर यात्रा की बहाली
जयशंकर ने बताया कि भारत और चीन ने राजनयिक संबंधों की 75वीं वर्षगांठ को भी चिह्नित किया है। इस अवसर पर कैलाश मानसरोवर यात्रा की बहाली को भारत में व्यापक सराहना मिली है। यह यात्रा कोविड-19 और बाद में सीमा तनावों के चलते कई वर्षों तक बंद रही थी। उन्होंने कहा:
“हमने राजनयिक संबंधों की 75वीं वर्षगांठ मनाई है। कैलाश मानसरोवर यात्रा की बहाली भारत में व्यापक रूप से सराही गई है। यदि द्विपक्षीय संबंधों का सामान्यीकरण जारी रहता है, तो यह दोनों देशों के लिए लाभकारी सिद्ध होगा।”
अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य और भारत-चीन संवाद की आवश्यकता
जयशंकर ने यह भी कहा कि वर्तमान वैश्विक परिदृश्य अत्यंत जटिल है। ऐसे में दो प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं और पड़ोसी देशों के बीच खुले विचार-विमर्श और संवाद का होना आवश्यक है। उन्होंने कहा:
“अंतरराष्ट्रीय परिस्थिति अत्यंत जटिल है। ऐसे में भारत और चीन जैसे पड़ोसी देशों के बीच खुले विचारों का आदान-प्रदान और परिप्रेक्ष्य साझा करना बहुत जरूरी है। मुझे विश्वास है कि इस यात्रा के दौरान इस पर भी चर्चा होगी।”
वांग यी से संभावित बैठक
जयशंकर की यात्रा के दौरान चीनी विदेश मंत्री वांग यी से भी द्विपक्षीय मुलाकात होनी तय मानी जा रही है। पिछली बार दोनों नेताओं की मुलाकात फरवरी 2025 में जोहान्सबर्ग में G20 बैठक के इतर हुई थी, जहां दोनों पक्षों ने आपसी विश्वास और समर्थन की बात दोहराई थी। वांग यी अगस्त 2025 में भारत यात्रा पर भी आ सकते हैं, जहां वे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल से सीमा विवाद सुलझाने के लिए विशेष प्रतिनिधियों (Special Representatives – SR) संवाद तंत्र के तहत बातचीत करेंगे।
तिआनजिन में एससीओ विदेश मंत्रियों की बैठक
एस जयशंकर 15 जुलाई को तिआनजिन में होने वाली शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की विदेश मंत्रियों की बैठक (Council of Foreign Ministers – CFM) में हिस्सा लेंगे। इस बैठक में क्षेत्रीय सुरक्षा, व्यापार, आतंकवाद और आर्थिक सहयोग जैसे विषयों पर चर्चा की जाएगी। विदेश मंत्रालय ने पुष्टि की है:
“विदेश मंत्री पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना की यात्रा पर जाएंगे, जहां वे 15 जुलाई को तिआनजिन में आयोजित एससीओ काउंसिल ऑफ फॉरेन मिनिस्टर्स की बैठक में भाग लेंगे। इस दौरान वे द्विपक्षीय बैठकें भी करेंगे।”
गालवान संघर्ष की पृष्ठभूमि
गौरतलब है कि 2020 में लद्दाख की गालवान घाटी में भारतीय और चीनी सेनाओं के बीच हिंसक झड़प हुई थी, जिसमें दोनों पक्षों के सैनिकों की जान गई थी। यह घटना पिछले 40 वर्षों में सबसे गंभीर सीमा संघर्ष मानी गई और इसके बाद से दोनों देशों के संबंधों में भारी गिरावट आई।
इस संघर्ष के बाद कई द्विपक्षीय संवाद और सैन्य-राजनयिक वार्ताएं हुईं, लेकिन ठोस समाधान सामने नहीं आया। हालांकि, कज़ान शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी और शी जिनपिंग की छोटी मुलाकात के बाद दोनों देशों ने SR संवाद और अन्य निष्क्रिय चैनलों को पुनर्जीवित करने पर सहमति जताई।
आगे की राह: कूटनीतिक संतुलन और आपसी सहयोग की ओर
एस जयशंकर की यह यात्रा केवल औपचारिकता नहीं बल्कि रणनीतिक संतुलन की दिशा में एक ठोस कदम है। जहां एक ओर सीमा विवाद अब भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है, वहीं कैलाश मानसरोवर यात्रा जैसी पहल, उच्च स्तरीय संवाद और SCO जैसे बहुपक्षीय मंचों पर सहभागिता यह संकेत देते हैं कि दोनों देश अब टकराव से संवाद की ओर बढ़ रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि चीन और भारत दोनों वैश्विक महाशक्तियों के रूप में उभर रहे हैं और यदि वे अपने आपसी विवादों को शांति और संवाद के ज़रिये हल करें तो न केवल द्विपक्षीय लाभ मिलेगा बल्कि एशिया और वैश्विक राजनीति में भी स्थिरता आ सकेगी।
निष्कर्ष:
जयशंकर की चीन यात्रा, भारत-चीन संबंधों में एक नई शुरुआत का संकेत है। हालांकि रास्ता लंबा है और अविश्वास की परतें गहरी हैं, लेकिन संवाद और सहयोग की यह पहल उम्मीद की एक नई किरण लेकर आई है। यदि दोनों देश रणनीतिक धैर्य और परिपक्वता के साथ आगे बढ़ते हैं, तो गालवान जैसे हादसे अतीत बन सकते हैं और एक स्थिर, शांतिपूर्ण और समृद्ध भविष्य की नींव रखी जा सकती है।















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