13 जुलाई 2025 की सुबह जम्मू-कश्मीर की सियासत में एक और तूफान आ गया जब पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को श्रीनगर के शहीदों के कब्रिस्तान (Martyr’s Graveyard) में श्रद्धांजलि देने से रोक दिया गया। यह वही स्थान है जहाँ हर साल 13 जुलाई को 1931 में डोगरा शासन के खिलाफ प्रदर्शन करते हुए मारे गए कश्मीरी प्रदर्शनकारियों को याद किया जाता है।
लेकिन इस बार स्थिति कुछ अलग थी — यह सिर्फ एक श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि एक राजनीतिक टकराव और लोकतांत्रिक मूल्यों पर सवाल खड़ा करने वाली घटना बन गई।
क्या हुआ उस सुबह?
सुबह जब उमर अब्दुल्ला अपने मंत्रिमंडल के सहयोगियों के साथ कब्रिस्तान की ओर जा रहे थे, तभी पुलिस ने रास्ते में उन्हें रोकने की कोशिश की। पुलिस का व्यवहार सामान्य नहीं था। चश्मदीदों और वीडियो फुटेज के अनुसार, पुलिसकर्मियों ने न केवल रास्ता रोका, बल्कि धक्का-मुक्की भी की। कुछ वीडियो क्लिप्स में साफ देखा गया कि उमर अब्दुल्ला और उनके सहयोगियों के साथ लगभग मारपीट जैसी स्थिति बनी।
इसके बाद उमर अब्दुल्ला ने एक चौंकाने वाला कदम उठाया — उन्होंने शहीदों के कब्रिस्तान के फाटक को फांदकर अंदर प्रवेश किया और वहां जाकर फातिहा (इस्लामी प्रार्थना) पढ़ी। यह उनके अनुसार न केवल श्रद्धांजलि का भाव था, बल्कि एक सशक्त विरोध भी।
NDTV से बात करते हुए उमर अब्दुल्ला का गुस्सा फूटा
घटना के तुरंत बाद उमर अब्दुल्ला NDTV से रूबरू हुए। बातचीत में उनका गुस्सा साफ झलक रहा था। उन्होंने केंद्र सरकार और विशेषकर भाजपा (BJP) पर करारा हमला बोला। उनके अनुसार:
“ये सिर्फ मेरे या मेरे मंत्रियों के साथ जो हुआ उसका सवाल नहीं है। ये इस बात का संकेत है कि आप जम्मू-कश्मीर की जनता को ये बता रहे हैं कि उनकी आवाज़ की कोई अहमियत नहीं है।”
उन्होंने भाजपा पर गांधीजी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को महिमामंडित करने का भी आरोप लगाया और कहा कि जब एक पार्टी उन लोगों को महिमामंडित करती है जिन्होंने गांधी को मारा, तो उससे क्या उम्मीद की जा सकती है?
“अंधाधुंध और मूर्खतापूर्ण फैसला” — उमर का बीजेपी पर हमला
उमर अब्दुल्ला का कहना था कि अगर उन्हें शांति से शहीदों को श्रद्धांजलि देने दी जाती, तो यह पूरा मुद्दा कभी राष्ट्रीय बहस नहीं बनता। उन्होंने इसे “मूर्खतापूर्ण और अल्पदर्शी” फैसला करार दिया।
उन्होंने अधिकारियों को “idiots” (मूर्ख) कहकर उन पर सीधा हमला बोला जिन्होंने इस कार्रवाई की योजना बनाई थी। उन्होंने कहा कि ये कश्मीर के लोगों को यह संदेश देने की कोशिश है कि उनकी भावना, इतिहास और आवाज़ सबकुछ महत्वहीन है।
13 जुलाई 1931 का ऐतिहासिक महत्व
यह तारीख कश्मीर के इतिहास में बेहद महत्वपूर्ण है। 13 जुलाई 1931 को डोगरा महाराजा हरि सिंह की सेना ने श्रीनगर सेंट्रल जेल के बाहर शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे कश्मीरियों पर गोली चलाई थी। उस प्रदर्शन में 22 लोग मारे गए थे। तभी से हर साल इस दिन को “शहीद दिवस” के रूप में मनाया जाता है।
पिछले कई दशकों से यह दिन एक राजनीतिक-सांस्कृतिक प्रतीक बन चुका है, खासकर कश्मीरी मुस्लिम समुदाय के लिए। लेकिन 2019 में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद से केंद्र सरकार और राज्यपाल प्रशासन ने इसे औपचारिक तौर पर मनाना बंद कर दिया है।
राजनीतिक रंग: क्यों इस मुद्दे पर मचा बवाल?
इस घटना ने एक बार फिर केंद्र और कश्मीर की राजनीतिक पार्टियों के बीच टकराव को उजागर कर दिया है। नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC), पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (PDP) और अन्य क्षेत्रीय दल इसे कश्मीर की अस्मिता पर हमला मान रहे हैं।
पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती ने भी इस घटना की निंदा की और ट्वीट करते हुए लिखा:
“कब्रिस्तान के दरवाजे बंद करना सिर्फ दीवारें नहीं, लोकतंत्र के रास्ते बंद करना है।”
वहीं बीजेपी नेताओं का तर्क था कि यह सुरक्षा कारणों से किया गया था। लेकिन सवाल यह उठता है कि जब इतने वर्षों से यह कार्यक्रम शांतिपूर्वक होता आया है, तो इस बार अचानक कड़े प्रतिबंध क्यों लगाए गए?
सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया
उमर अब्दुल्ला के इस कदम की सोशल मीडिया पर काफी सराहना भी हुई। कई लोगों ने इसे “जनता के लिए खड़े होने वाला नेतृत्व” बताया, जबकि भाजपा समर्थकों ने इसे “राजनीतिक नौटंकी” करार दिया।
X (पूर्व ट्विटर) पर एक यूजर ने लिखा:
“जब नेता खुद जनता की पीड़ा महसूस करता है और दरवाजा फांदकर फातिहा पढ़ता है, तो वो नेता नहीं रह जाता, वो जनता की आवाज़ बन जाता है।”
क्या संदेश गया कश्मीर के लोगों को?
यह घटना केवल एक व्यक्ति या एक पार्टी की नहीं थी। यह पूरे कश्मीर को भेजा गया एक संदेश था — या तो आप हमारे तय किए हुए नैरेटिव को स्वीकार करें या आपको रोका जाएगा।
उमर अब्दुल्ला के मुताबिक, “अगर हमें चुपचाप श्रद्धांजलि देने दिया जाता, तो यह कोई मुद्दा नहीं बनता। लेकिन आपको यह दिखाना था कि कश्मीर के लोगों की कोई अहमियत नहीं है। आप बता रहे हैं कि उनकी विरासत, इतिहास और भावनाएं गौण हैं।”
लोकतंत्र पर धब्बा या सुरक्षा उपाय?
प्रशासन का दावा है कि यह कदम कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए था। लेकिन जब सवाल उठता है कि एक पूर्व मुख्यमंत्री, जिनकी पहचान और इरादा सार्वजनिक है, उन्हें रोकना कितना उचित था, तो जवाब उलझ जाता है।
क्या यह लोकतंत्र की भावना के खिलाफ है? क्या शांति से श्रद्धांजलि देना भी अब राजनीतिक अपराध हो गया है?
निष्कर्ष: यह सिर्फ फातिहा नहीं, एक सियासी बयान था
उमर अब्दुल्ला का कब्रिस्तान की दीवार फांदना सिर्फ एक धार्मिक क्रिया नहीं थी। वह एक स्पष्ट, सीधा और सशक्त सियासी बयान था — यह कि कश्मीर का इतिहास, उसकी पीड़ा और उसकी पहचान को चुप नहीं कराया जा सकता।
भाजपा की नीतियों और उसके “एक राष्ट्र, एक नीति” सिद्धांत के विरोध में यह घटना एक चेतावनी भी हो सकती है — कि क्षेत्रीय अस्मिता, इतिहास और भावनाओं की अनदेखी करना अंततः ज्यादा बड़े विरोध को जन्म दे सकता है।
















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