9 जुलाई, 2025 को देशभर में ट्रेड यूनियनों के संयुक्त मंच – ज्वाइंट कमेटी ऑफ ट्रेड यूनियन्स (JCTU) – द्वारा आहूत भारत बंद (जनरल स्ट्राइक) का असर मिश्रित रहा। इस हड़ताल का मक़सद केंद्र और राज्य सरकारों की ‘मज़दूर विरोधी नीतियों’ के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना था। लेकिन कर्नाटक के मैसूरु शहर और उसके औद्योगिक क्षेत्र में इस हड़ताल का प्रभाव अपेक्षाकृत सीमित रहा।
इस रिपोर्ट में हम आपको बताएंगे कि इस हड़ताल के पीछे क्या कारण थे, मज़दूर संगठनों की मुख्य माँगें क्या थीं, सरकार की नई लेबर कोड्स को लेकर विरोध क्यों हो रहा है, और मैसूरु जैसे औद्योगिक शहर में यह आंदोलन ज़मीन पर कितना प्रभाव डाल सका।
🔹 हड़ताल का उद्देश्य – “Ease of Doing Business” या “End of Workers’ Rights”?
ट्रेड यूनियनों का आरोप है कि केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए चार श्रम संहिताएं (Labour Codes) श्रमिकों के दशकों की मेहनत से अर्जित अधिकारों को खत्म करने वाली हैं। सरकार का दावा है कि ये कोड श्रम कानूनों को सरल बनाकर निवेश को आकर्षित करेंगे और ‘Ease of Doing Business’ को बढ़ावा देंगे। लेकिन ट्रेड यूनियनें इन्हें “Ease of Exploiting Labour” यानी मज़दूरों का शोषण आसान करने वाला कदम मान रही हैं।
🔹 कौन-कौन से हैं ये 4 श्रम संहिता?
केंद्र सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में 44 पुराने श्रम क़ानूनों को समाहित कर चार प्रमुख श्रम संहिताओं (Labour Codes) का निर्माण किया है:
- Code on Wages, 2019 – वेतन और बोनस से जुड़ा क़ानून
- Industrial Relations Code, 2020 – ट्रेड यूनियन, हड़ताल, और मज़दूर-प्रबंधन संबंधों से संबंधित
- Code on Social Security, 2020 – भविष्य निधि (PF), पेंशन, बीमा और असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के लिए सुरक्षा
- Occupational Safety, Health and Working Conditions Code, 2020 – कार्यस्थल की सुरक्षा, स्वास्थ्य और काम की स्थिति पर केंद्रित
ट्रेड यूनियनों का तर्क है कि ये कोड मज़दूरों की सामूहिक सौदेबाज़ी की ताकत को कमजोर करते हैं, स्थाई रोजगार को घटाकर ठेका व्यवस्था को बढ़ावा देते हैं, और काम के घंटे, हड़ताल के अधिकार जैसी बुनियादी आज़ादियों पर अंकुश लगाते हैं।
🔹 मैसूरु में विरोध प्रदर्शन की झलक
मैसूरु शहर में ट्रेड यूनियन नेताओं और कार्यकर्ताओं ने मुख्य सड़कों पर मार्च निकाला और ज़ोरदार नारेबाज़ी की। इस प्रदर्शन में ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AIUTUC), सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियन्स (CITU), ऑल इंडिया किसान मजदूर सभा (AIKMS) जैसे संगठनों ने हिस्सा लिया। इन संगठनों ने सरकार के ‘मज़दूर विरोधी’ रुख़ पर सवाल उठाए।
सीपीआई (एम) के नेता जगदीश सूर्या ने कहा,
“यह हड़ताल मज़दूरों की चेतावनी है कि अगर सरकार ने श्रम कानूनों को मज़दूरों के पक्ष में नहीं बदला, तो देशभर में और बड़े आंदोलन होंगे।”
🔹 क्या रही मुख्य माँगें?
🔸 न्यूनतम वेतन ₹36,000 प्रति माह:
ट्रेड यूनियनें मांग कर रही हैं कि देश में सभी श्रमिकों को बिना किसी अपवाद के ₹36,000 प्रति माह का न्यूनतम वेतन दिया जाए, चाहे वह किसी भी सेक्टर में काम कर रहे हों।
🔸 ठेका, आउटसोर्सिंग और अप्रेंटिस पर रोक:
असुरक्षित रोजगार के रूपों पर पूर्ण रोक लगाने की माँग की गई – जैसे कि कॉन्ट्रैक्ट लेबर, आउटसोर्सिंग और लंबे समय तक ‘प्रशिक्षु’ (Apprentice) बनाए रखना।
🔸 असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों के लिए ₹9,000 की पेंशन:
चूंकि असंगठित क्षेत्र के करोड़ों श्रमिकों के पास कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं है, इसलिए यूनियनों ने उन्हें हर महीने ₹9,000 की पेंशन देने की माँग रखी।
🔹 हड़ताल के दायरे से आगे – किसानों के मुद्दे भी शामिल
इस बार ट्रेड यूनियनों ने सिर्फ़ मज़दूरों की नहीं, बल्कि किसानों की भी आवाज़ बुलंद की। उनकी प्रमुख माँगें थीं:
🔸 बिजली (संशोधन) विधेयक, 2022 को रद्द करें:
ट्रेड यूनियनों का आरोप है कि यह बिल बिजली क्षेत्र के निजीकरण की राह खोलता है, जिससे किसानों की सब्सिडी प्रभावित होगी।
🔸 एमएसपी की गारंटी:
एमएस स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के आधार पर “कंप्रीहेन्सिव लागत + 50%” फॉर्मूले पर एमएसपी लागू करने की माँग की गई।
🔸 भूमि सुधार और एपीएमसी कानूनों में बदलाव रद्द हों:
कर्नाटक सरकार द्वारा किए गए कानूनों में संशोधन से किसानों की ज़मीन की सुरक्षा खतरे में पड़ी है, ऐसा प्रदर्शनकारियों का आरोप था।
🔹 मैसूरु के औद्योगिक क्षेत्र में असर क्यों नहीं दिखा?
मैसूरु चैम्बर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (MCCI) के अध्यक्ष लिंगराजू ने साफ कहा कि हड़ताल का औद्योगिक उत्पादन पर कोई असर नहीं पड़ा। उन्होंने कहा:
“केवल यूनियन नेता और पदाधिकारी प्रदर्शन में शामिल हुए। अधिकांश मज़दूर और कर्मचारी काम पर आए और सभी फैक्ट्रियां सामान्य रूप से चालू रहीं।”
इसके दो कारण बताए जा सकते हैं:
- कम संगठित मज़दूर शक्ति: मैसूरु जैसे क्षेत्रों में यूनियन सदस्यता सीमित है।
- प्रबंधन का दबाव: निजी कंपनियों और ठेकेदारों का दबाव भी मज़दूरों को हड़ताल से दूर रखता है।
🔹 हड़ताल का व्यापक महत्व – प्रतीकात्मक विरोध या मज़बूत संदेश?
हालांकि मैसूरु जैसे शहरों में हड़ताल का प्रत्यक्ष असर सीमित रहा, लेकिन यह आंदोलन उन राज्यों और क्षेत्रों में असरदार रहा जहां ट्रेड यूनियनों की ताकत अधिक है – जैसे बंगाल, केरल, तमिलनाडु, और कुछ हिस्सों में महाराष्ट्र व पंजाब।
इसके अलावा, यह आंदोलन केंद्र सरकार के उन ‘सुधारवादी’ कदमों के खिलाफ एक मज़बूत प्रतीक बनकर उभरा, जिन्हें ट्रेड यूनियनें पूंजीपतियों के पक्ष में और श्रमिकों के खिलाफ मानती हैं।
🔹 निष्कर्ष – क्या यह हड़ताल श्रमिकों के भविष्य की दिशा तय करेगी?
एक ओर सरकार उद्योगों में सुधार, निवेश, और उत्पादकता बढ़ाने के लिए श्रम कानूनों का सरलीकरण चाहती है, तो दूसरी ओर ट्रेड यूनियनें इसे मज़दूरों की सुरक्षा और गरिमा पर हमला मानती हैं।
मैसूरु में जनरल स्ट्राइक का ज़मीनी असर भले ही सीमित रहा हो, लेकिन यह हड़ताल सरकार के लिए एक स्पष्ट चेतावनी है कि बिना श्रमिक संगठनों की भागीदारी के कोई भी श्रम सुधार स्थायी नहीं हो सकता।
आने वाले समय में अगर सरकार और यूनियनों के बीच संवाद नहीं हुआ, तो यह आंदोलन और तीव्र रूप ले सकता है — और तब इसका असर न केवल सड़कों पर, बल्कि देश की आर्थिक सेहत पर भी दिखेगा।
















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