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अमेरिका-भारत व्यापार समझौते पर ट्रंप का बड़ा बयान, लेकिन कृषि और डेयरी को लेकर गतिरोध बरकरार | 14 देशों पर नए अमेरिकी टैरिफ से वैश्विक व्यापार तनाव और बढ़ा

Trump's big statement on US-India trade deal, but deadlock over agriculture and dairy continues | Global trade tensions further escalated due to new US tariffs on 14 countries

8 जुलाई को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह दावा किया कि अमेरिका भारत के साथ एक व्यापार समझौते के बेहद करीब है। वहीं दूसरी ओर, अमेरिका ने 14 देशों पर नए टैरिफ (आयात शुल्क) लगाने की घोषणा भी कर दी है, जिससे वैश्विक व्यापार में तनाव की स्थिति और अधिक गहरी होती जा रही है। अमेरिका के अनुसार, जिन देशों के साथ समझौते की संभावना नहीं दिख रही, उन्हें अब नए टैरिफ नोटिस जारी किए जा रहे हैं।

भारत और अमेरिका के बीच एक “मिनी ट्रेड डील” (अल्पकालिक व्यापार समझौता) को लेकर बीते कई वर्षों से बातचीत चल रही है, लेकिन कृषि और डेयरी जैसे मुद्दों पर मतभेद अब भी बरकरार हैं। दोनों देशों की बातचीत का उद्देश्य पारस्परिक रूप से आयात शुल्क में कटौती करना और द्विपक्षीय व्यापार को 2030 तक 500 अरब डॉलर तक ले जाना है। हालांकि भारत के घरेलू किसान हितों और अमेरिका की बाजार पहुंच की मांग के बीच यह लक्ष्य अब भी दूर नज़र आ रहा है।


■ ट्रंप का दावा: “भारत के साथ व्यापार समझौते के करीब हैं”

व्हाइट हाउस में आयोजित संवाददाता सम्मेलन में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा:

“हमने यूनाइटेड किंगडम, चीन और कई अन्य देशों के साथ व्यापार समझौते किए हैं। भारत के साथ भी हम बहुत करीब हैं। लेकिन कुछ ऐसे देश हैं जिनसे समझौता संभव नहीं लग रहा, उन्हें हम टैरिफ नोटिस भेज रहे हैं।”

ट्रंप के इस बयान के बाद अमेरिका की ओर से बांग्लादेश, थाईलैंड, दक्षिण कोरिया और जापान जैसे प्रमुख व्यापारिक साझेदारों को पत्र भेजे गए, जिसमें 1 अगस्त से लागू होने वाले नए टैरिफ की चेतावनी दी गई।


■ टैरिफ पर नई आक्रामकता: 14 देशों पर शुल्क बढ़ाने की चेतावनी

ट्रंप प्रशासन ने 14 देशों को भेजे गए टैरिफ नोटिस में कहा है कि यदि वे अमेरिका के साथ व्यापार के नियमों में लचीलापन नहीं दिखाते या अमेरिका को पर्याप्त बाज़ार नहीं देते, तो उनके उत्पादों पर शुल्क बढ़ा दिया जाएगा। इसमें शामिल देश हैं:

  • बांग्लादेश
  • थाईलैंड
  • दक्षिण कोरिया
  • जापान
  • वियतनाम
  • मलेशिया
  • ब्राजील
  • इटली
  • स्पेन
  • तुर्की
  • पोलैंड
  • इंडोनेशिया
  • ताइवान
  • दक्षिण अफ्रीका

ट्रंप ने यह भी जोड़ा कि:

“हम किसी के साथ अन्याय नहीं करेंगे। अगर किसी देश के पास कोई जायज़ वजह हो, तो हम कुछ समायोजन कर सकते हैं। लेकिन अमेरिका का हित सर्वोपरि रहेगा।”


■ भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता में क्या हैं अड़चनें?

भारत और अमेरिका के बीच वर्षों से एक सीमित व्यापार समझौते को लेकर वार्ता चल रही है, जिसे “मिनी ट्रेड डील” कहा जा रहा है। यह समझौता उन विवादास्पद मुद्दों को हल करने की कोशिश है जो बड़े मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को अव्यवहारिक बनाते हैं। परंतु, जिन दो सबसे बड़े मुद्दों पर दोनों पक्षों में मतभेद हैं, वे हैं:

1. कृषि और डेयरी सेक्टर में बाज़ार पहुंच (Market Access)

अमेरिका चाहता है कि भारत अपने कृषि और डेयरी सेक्टर को अमेरिकी कंपनियों और उत्पादों के लिए खोल दे। अमेरिका की डेयरी इंडस्ट्री भारतीय बाज़ार को लेकर खासतौर पर आक्रामक है।

भारत का रुख इस पर स्पष्ट है:

  • भारतीय किसानों की आजीविका और पारंपरिक खाद्य प्रणाली को खतरे में नहीं डाला जा सकता।
  • अमेरिका की डेयरी इंडस्ट्री गायों को हॉर्मोन और अन्य रसायनों से तैयार करता है, जो भारत के धार्मिक और सांस्कृतिक मानदंडों से मेल नहीं खाता।
  • देश की खाद्य सुरक्षा और घरेलू उत्पादन की रक्षा सबसे प्राथमिकता है।

2. भारत की मांग: श्रम-प्रधान वस्तुओं पर टैरिफ छूट

भारत चाहता है कि अमेरिका उसके परिधान (गारमेंट), चमड़ा (लेदर), जूते और हस्तशिल्प जैसे उत्पादों पर आयात शुल्क में छूट दे। ये वो उद्योग हैं जिनमें लाखों लोगों को रोजगार मिलता है और भारत के निर्यात का बड़ा हिस्सा हैं।

भारत का कहना है कि यदि इन श्रम-प्रधान उत्पादों को अमेरिका बाज़ार में सस्ती दरों पर प्रवेश नहीं देगा, तो व्यापार संतुलन भारत के खिलाफ रहेगा और 2030 तक 500 अरब डॉलर के व्यापार लक्ष्य को पाना असंभव हो जाएगा।


■ कौन-से बिंदुओं पर बनी है सहमति?

हालांकि कृषि और डेयरी जैसे संवेदनशील मुद्दों पर गतिरोध बना हुआ है, फिर भी कुछ क्षेत्रों में दोनों पक्षों ने मिलकर समाधान निकाले हैं। जैसे:

  • फार्मास्युटिकल्स (दवाएं): अमेरिका भारत की जेनेरिक दवा कंपनियों को सस्ती दरों पर अमेरिका में प्रवेश देने के लिए सहमत हुआ है।
  • आईटी सेवाएं और डिजिटल व्यापार: अमेरिका और भारत दोनों इस क्षेत्र में नियमों के सरलीकरण पर सहमत हो चुके हैं।
  • सौर और रक्षा उपकरण: अमेरिका ने भारत को कुछ सामरिक तकनीक निर्यात करने पर रज़ामंदी जताई है।

■ विशेषज्ञों की राय: “चुनाव, राजनीति और व्यापार का त्रिकोण”

अमेरिकी राजनीति में ट्रंप के फिर से सक्रिय होने और चुनावी साल होने के कारण उनकी व्यापार नीतियों में अधिक आक्रामकता देखी जा रही है। वे अमेरिका-फर्स्ट नीति के तहत घरेलू वोटर्स को संदेश देना चाहते हैं कि वे अमेरिका के आर्थिक हितों के लिए कठोर निर्णय ले सकते हैं।

भारतीय विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप भारत को “डील” का वादा कर समर्थन तो देना चाहते हैं, लेकिन उनके लिए अमेरिकी डेयरी और कृषि लॉबी को संतुष्ट रखना भी ज़रूरी है। ऐसे में डील के अंतिम प्रारूप तक पहुंचना आसान नहीं होगा।

प्रोफेसर विकास झा, JNU के अर्थशास्त्र विभाग से:

“भारत को सावधानीपूर्वक निर्णय लेना होगा। यदि वह कृषि क्षेत्र में अमेरिकी मांगें मान लेता है, तो इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ेगा।”


■ 2030 तक 500 अरब डॉलर का लक्ष्य: कितनी है संभावना?

भारत और अमेरिका ने साझा लक्ष्य तय किया है कि वे 2030 तक आपसी व्यापार को 500 अरब डॉलर तक पहुंचाना चाहते हैं। फिलहाल यह व्यापार करीब 190-200 अरब डॉलर के आसपास है।

लेकिन यह तभी संभव है जब:

  • दोनों पक्षों में टैरिफ कटौती पर समझौता हो।
  • अमेरिका भारतीय श्रम-प्रधान वस्तुओं को प्राथमिकता दे।
  • भारत कुछ हद तक अमेरिकी कृषि उत्पादों के लिए सीमित पहुंच की अनुमति दे।
  • डिजिटल व्यापार, सेवाओं और लॉजिस्टिक्स को सरल बनाया जाए।

■ निष्कर्ष: डील करीब लेकिन राह अभी भी कठिन

अमेरिका और भारत के बीच व्यापारिक समझौते को लेकर जो बयानबाज़ी हो रही है, वह सकारात्मक संकेत देती है कि दोनों देश वार्ता को गंभीरता से ले रहे हैं। लेकिन वास्तविक समाधान तब तक नहीं मिलेगा, जब तक अमेरिका भारत के कृषि-संवेदनशील दृष्टिकोण को स्वीकार नहीं करता और भारत अमेरिका की औद्योगिक मांगों को आंशिक रूप से पूरा नहीं करता।

ट्रंप का यह कहना कि “हम भारत के बहुत करीब हैं” भले ही रणनीतिक हो, लेकिन यह भी दिखाता है कि भारत अब वैश्विक व्यापार और रणनीति में अमेरिका के लिए एक अहम साझेदार बन चुका है।

अगले कुछ हफ्तों में, यदि दोनों देशों के बीच यह “मिनी ट्रेड डील” आकार लेती है, तो यह ना सिर्फ द्विपक्षीय रिश्तों में मील का पत्थर होगा, बल्कि ग्लोबल ट्रेड टेंशन के बीच एक सुकून भरा संकेत भी बनेगा।

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