khabarhunt.in

खबर का शिकार

“बिहार में मतदाता पुनरीक्षण पर संकट: पहचान दस्तावेज़ या लोकतांत्रिक अधिकार?”

The crisis of voter revision in Bihar: Identity document or democratic right?

निर्वाचन आयोग द्वारा बिहार में चलाया जा रहा विशेष सघन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) अभियान, भले ही इसे एक सफल और सुचारू प्रक्रिया के रूप में प्रचारित किया जा रहा हो, लेकिन इसके भीतर गहराई से देखें तो यह कई विरोधाभासों और जमीनी स्तर पर व्यावहारिक समस्याओं से जूझ रहा है। यह अभियान ना केवल हजारों-लाखों मतदाताओं के मताधिकार को खतरे में डाल सकता है, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया की मूल भावना को भी आघात पहुंचाता है।

प्रक्रिया के विरोधाभास: प्रचार बनाम वास्तविकता

बिहार के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी (CEO) द्वारा प्रारंभिक विज्ञापनों में यह बताया गया था कि मतदाता यदि निर्धारित 11 पहचान दस्तावेज़ों में से कोई भी प्रस्तुत नहीं कर पा रहे हैं, तो वे बूथ लेवल अधिकारियों (BLOs) को केवल नामांकन फॉर्म जमा कर सकते हैं। दस्तावेज़ बाद में जमा किए जा सकते हैं, या स्थानीय जांच के माध्यम से उनकी पात्रता सत्यापित की जाएगी। यह लचीला दृष्टिकोण ग्रामीण, निर्धन और पिछड़े वर्गों के मतदाताओं के लिए राहतकारी प्रतीत हुआ।
हालांकि, जल्द ही मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) द्वारा यह स्पष्टीकरण जारी किया गया कि पुराने आदेश यथावत हैं, और 11 दस्तावेजों में से किसी एक को प्रस्तुत करना अनिवार्य है। ऐसा नहीं करने वालों को 1 अगस्त से 1 सितंबर 2025 तक आपत्ति और दावा दर्ज करने की अनुमति होगी। यह नीति परिवर्तन मतदाताओं में भ्रम उत्पन्न करने वाला है और यह इंगित करता है कि आयोग की अंदरूनी रणनीति अस्पष्ट और परस्पर विरोधी है।

स्थानीय जांच और अधिकारी की मर्जी पर निर्भरता

जब मतदाता की पात्रता की पुष्टि BLO या ERO (Electoral Registration Officer) की स्थानीय जांच पर छोड़ दी जाती है, तो उसमें पक्षपात, भेदभाव और भ्रष्टाचार की संभावनाएं कई गुना बढ़ जाती हैं।
भारत जैसे देश में जहां जाति, वर्ग, धर्म और राजनीतिक झुकाव के आधार पर भेदभाव कोई नई बात नहीं है, वहां यह पूरी प्रक्रिया किसी के मताधिकार को मनमाने तरीके से छीने जाने का माध्यम बन सकती है। किसी भी मजबूत लोकतंत्र में नागरिक को अपने अधिकार की पुष्टि के लिए राज्य के रहमोकरम पर निर्भर नहीं होना चाहिए।

दस्तावेजों की कठोरता: वंचितों के खिलाफ एक संरचना

बिहार जैसे राज्य में जहां ऐतिहासिक रूप से जन्म पंजीकरण, विद्यालय में नामांकन और अन्य आधिकारिक रिकॉर्डिंग की दरें कम रही हैं, वहां बड़ी संख्या में लोग आज भी ऐसे हैं जिनके पास कोई मानक सरकारी दस्तावेज नहीं हैं।
निर्वाचन आयोग ने 11 प्रमुख दस्तावेजों को ही मान्य घोषित किया है, जिनमें ड्राइविंग लाइसेंस, पासपोर्ट, पैन कार्ड, जन्म प्रमाण पत्र आदि शामिल हैं। सवाल यह है कि क्या एक ग्रामीण किसान, भूमिहीन मजदूर या दलित महिला के पास इनमें से कोई भी दस्तावेज़ होना अनिवार्य रूप से संभव है?
इसके बजाय, आयोग को आधार कार्ड, राशन कार्ड और मनरेगा जॉब कार्ड जैसे व्यापक और प्रचलित दस्तावेज़ों को स्वीकार करना चाहिए। आधार आज भारत में लगभग हर सरकारी सेवा का आधार बन चुका है, और इसकी सर्वव्यापकता इसे पहचान प्रमाण के रूप में सर्वोत्तम बनाती है।
इसी तरह राशन कार्ड और मनरेगा जॉब कार्ड भी विशेष रूप से ग्रामीण और श्रमिक वर्गों में व्यापक रूप से प्रचलित हैं। यदि आयोग इन दस्तावेजों को स्वीकार करता है, तो लाखों वास्तविक मतदाताओं की पहचान सुनिश्चित हो सकती है


हर नागरिक को “संदिग्ध” मानने की प्रवृत्ति

वर्तमान पुनरीक्षण प्रक्रिया में ऐसा प्रतीत होता है जैसे हर मतदाता को पहले “असंवैधानिक” या “अवैध” मान लिया गया है, जब तक कि वह दस्तावेज़ों से अपनी नागरिकता सिद्ध नहीं करता। यह सिद्धांत लोकतंत्र के उस मूलभूत विचार के विपरीत है जिसमें राज्य नागरिक पर विश्वास करता है और उसे अपने मताधिकार का प्रयोग करने की स्वतंत्रता देता है।
यह प्रक्रिया वंचितों के विरुद्ध एक तरह की सामाजिक और संस्थागत हिंसा है, जो उन्हें यह महसूस कराती है कि वे इस लोकतंत्र के समग्र भागीदार नहीं हैं।

डिजिटलकरण और जागरूकता की कमी

बिहार के अधिकांश ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल साक्षरता अभी भी सीमित है। कई बूथ स्तर अधिकारी स्वयं तकनीकी रूप से दक्ष नहीं हैं। ऑनलाइन फॉर्म भरना, दस्तावेज़ स्कैन कर अपलोड करना, या मोबाइल ऐप के माध्यम से पहचान सत्यापन जैसे कदम ग्रामीण जनता के लिए एक जटिल प्रक्रिया बन जाते हैं।
इसका सीधा असर यही होता है कि असंख्य लोग जानबूझकर नहीं, बल्कि संसाधनों की कमी के चलते मतदाता सूची से बाहर रह जाते हैं।
सुप्रीम कोर्ट की निगरानी और संभावित हस्तक्षेपगौरतलब है कि इस विशेष पुनरीक्षण प्रक्रिया को लेकर कई याचिकाएं सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल की गई हैं, जिनमें इस पूरी प्रक्रिया की वैधता और पारदर्शिता को चुनौती दी गई है। कोर्ट की सुनवाई यदि गंभीर हस्तक्षेप की ओर जाती है, तो आयोग को अपनी प्रक्रिया में आमूलचूल परिवर्तन करने पर बाध्य होना पड़ सकता है।
लेकिन जब तक ऐसा न हो, तब तक आयोग को स्वयं आत्मनिरीक्षण कर अपनी नीतियों को लोकतांत्रिक और समावेशी बनाना होगा।


सुझाव और संभावित समाधान

दस्तावेजों की सूची का विस्तार करें: आयोग को तत्काल आधार, राशन कार्ड, मनरेगा कार्ड जैसे व्यापक दस्तावेजों को मान्यता देनी चाहिए।
स्थानीय सत्यापन में पारदर्शिता लाएं: यदि स्थानीय स्तर पर जांच अनिवार्य है, तो उसकी प्रक्रिया स्पष्ट, लिखित और रिकॉर्डेड होनी चाहिए। साथ ही, इसकी निगरानी के लिए स्वतंत्र समितियां नियुक्त की जाएं।
डिजिटल साक्षरता अभियान चलाएं: आयोग को ग्रामीण इलाकों में मतदाता जागरूकता और तकनीकी सहायता शिविर लगाने चाहिए ताकि लोग खुद अपने अधिकारों को जान सकें।
स्वचालित नामांकन की दिशा में कदम: जैसे ही कोई व्यक्ति 18 वर्ष का होता है, यदि उसके पास आधार या स्कूल सर्टिफिकेट है, तो स्वचालित रूप से उसका नामांकन हो सके, ऐसी व्यवस्था बनाई जानी चाहिए।
सुनवाई की प्रक्रिया में सहजता: जिनके नाम हटाए गए हैं, उनके लिए आपत्ति दर्ज करने और पुन: शामिल होने की प्रक्रिया सरल और जनसुलभ बनाई जाए।


निष्कर्ष

लोकतंत्र की आत्मा मतदाता होता है। और यदि मतदाता को ही अपने अस्तित्व को साबित करने में संघर्ष करना पड़े, तो यह व्यवस्था की विफलता है। बिहार का विशेष सघन पुनरीक्षण अभियान जिस तरह से संचालित हो रहा है, उसमें सच्चे मतदाताओं को अपात्र बना देने की आशंका बलवती हो रही है।
निर्वाचन आयोग को चाहिए कि वह संविधान में प्रदत्त सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के मूल सिद्धांत को अक्षुण्ण रखते हुए, अपनी प्रक्रिया को लचीला, समावेशी और व्यावहारिक बनाए। यही लोकतंत्र का तकाजा है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *