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भारतीय संविधान की प्रस्तावना पर नया विवाद: ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्दों को हटाने की मांग क्यों?

New controversy over the Preamble of the Indian Constitution: Why the demand to remove the words 'socialist' and 'secular'?

भारत के संविधान की प्रस्तावना यानी Preamble को देश की आत्मा माना जाता है। यह केवल एक भूमिका नहीं, बल्कि उस दर्शन का प्रतीक है, जिस पर भारत का लोकतंत्र टिका हुआ है। लेकिन इन दिनों देश की राजनीति में एक नया तूफ़ान उठा है—क्या संविधान की प्रस्तावना से ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्दों को हटाया जाना चाहिए?

इस बहस को हवा दी है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के महासचिव दत्तात्रेय होसबाले के बयान ने, जिसमें उन्होंने कहा कि “समाजवादी” और “धर्मनिरपेक्ष” शब्द बलपूर्वक संविधान में जोड़े गए थे और इन्हें हटाने पर विचार किया जाना चाहिए। इस पर उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ का बयान भी सामने आया कि, “प्रस्तावना बदली नहीं जा सकती ऐसा नहीं है, क्योंकि 1976 में इसे बदला गया था।

तो आइए विस्तार से समझते हैं कि इस विवाद की जड़ क्या है, इतिहास क्या कहता है, और आज यह मुद्दा इतना संवेदनशील क्यों बन गया है।


🔹 प्रस्तावना में बदलाव: इतिहास की एक झलक

जब संविधान 26 नवंबर 1949 को अपनाया गया और 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ, तब उसकी प्रस्तावना में “समाजवादी” और “धर्मनिरपेक्ष” शब्द नहीं थे। यह शब्द बाद में 1976 में 42वें संविधान संशोधन के माध्यम से जोड़े गए।

इस संशोधन को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार ने आपातकाल (Emergency) के दौरान संसद में पारित करवाया था। इस संशोधन के माध्यम से प्रस्तावना में निम्नलिखित बदलाव किए गए:

  • “We, the people of India… to constitute India into a Sovereign, Socialist, Secular, Democratic Republic…”
  • इसके अतिरिक्त “Unity of the Nation” को Unity and Integrity of the Nation से बदला गया।

इस संशोधन के बाद संविधान की आत्मा में “धर्मनिरपेक्षता” और “समाजवाद” जैसे मूल्य औपचारिक रूप से जुड़ गए।


🔹 उपराष्ट्रपति का बयान: “प्रस्तावना बदली जा चुकी है”

उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने 29 जून को एक सार्वजनिक कार्यक्रम में कहा कि:

“प्रस्तावना संविधान का बीज है जिससे पूरा संविधान विकसित होता है। लेकिन ये कहना कि इसे बदला नहीं जा सकता, सही नहीं है, क्योंकि 1976 में इसे बदला जा चुका है।”

उनका यह बयान तब आया जब RSS की तरफ से प्रस्तावना में संशोधन की मांग फिर से उठी। उन्होंने ये भी कहा कि विश्व में भारत एकमात्र ऐसा देश है, जहाँ संविधान की प्रस्तावना को बदला गया है।


🔹 आरएसएस का तर्क: ‘बाहरी विचारधारा’ का आरोप

RSS महासचिव दत्तात्रेय होसबाले ने कहा:

“धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद जैसे शब्द भारतीय संस्कृति से नहीं, बल्कि पश्चिमी अवधारणाओं से लिए गए हैं। इन्हें जबरदस्ती जोड़ा गया, अब समय है कि इन्हें फिर से परखा जाए।”

उन्होंने कांग्रेस और खासतौर पर राहुल गांधी पर हमला करते हुए कहा कि:

“जिन लोगों ने संविधान में ये जोड़ दिए, वही आज उसकी कॉपी लेकर घूम रहे हैं। क्या उन्होंने इसके लिए माफ़ी मांगी?”

इसका स्पष्ट संकेत आपातकाल के समय लिए गए निर्णयों और आज के विपक्ष की राजनीति की ओर था।


🔹 विपक्ष का पलटवार: “मनुस्मृति चाहिए इन्हें, संविधान नहीं”

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने RSS और BJP पर तीखा हमला करते हुए कहा:

“RSS और BJP संविधान नहीं, मनुस्मृति चाहते हैं। इनका एजेंडा गरीबों, दलितों और हाशिये पर खड़े लोगों से उनके अधिकार छीनकर उन्हें फिर से गुलाम बनाना है।”

कांग्रेस का आरोप है कि प्रस्तावना से “धर्मनिरपेक्ष” और “समाजवादी” शब्द हटाने की मांग दरअसल भारतीय संविधान की आत्मा पर हमला है, जिसे बाबा साहेब अंबेडकर ने पूरी सोच-समझ के साथ बनाया था।


🔹 भाजपा की प्रतिक्रिया: “भारतीय संस्कृति में ‘धर्मनिरपेक्षता’ पश्चिमी आयात है”

पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सहित कई बीजेपी नेताओं ने कहा कि:

“भारत की संस्कृति मूलतः सर्वधर्म समभाव की रही है। ‘सेक्युलरिज़्म’ जैसी अवधारणाएं पश्चिम से आयात की गई हैं। ये भारतीय सोच का हिस्सा नहीं हैं।”

भाजपा के कई नेता यह मानते हैं कि आपातकाल के दौरान जो बदलाव किए गए, वो बिना जन-सहमति और संसद में बहस के लाए गए थे, इसलिए उन्हें हटाने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।


🔹 सुप्रीम कोर्ट का रुख

2023 में सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दाखिल हुईं जिनमें मांग की गई थी कि 42वें संविधान संशोधन को रद्द किया जाए और प्रस्तावना को उसके मूल रूप में वापस लाया जाए। लेकिन नवंबर 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने इन याचिकाओं को खारिज कर दिया। कोर्ट ने माना कि संशोधन के दौरान प्रक्रियात्मक रूप से संविधान का उल्लंघन नहीं हुआ।


🔹 “समाजवादी” और “धर्मनिरपेक्ष” शब्द क्यों ज़रूरी हैं?

धर्मनिरपेक्षता का अर्थ है कि राज्य का कोई धर्म नहीं होता, और वह सभी धर्मों से समान दूरी बनाए रखता है। यह अल्पसंख्यकों के अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता की संवैधानिक गारंटी है।

समाजवाद का मतलब है कि संसाधनों का न्यायसंगत वितरण, आर्थिक विषमता को कम करना, और एक कल्याणकारी राज्य की स्थापना करना।

इन दोनों ही मूल्यों को संविधान की प्रस्तावना में जोड़ने का मकसद भारत को एक ऐसा राष्ट्र बनाना था जो धर्म और वर्ग के आधार पर किसी भी भेदभाव से ऊपर हो।


🔚 निष्कर्ष: प्रस्तावना की आत्मा पर बहस या राजनीति?

वर्तमान विवाद यह सवाल खड़ा करता है कि—क्या संविधान की प्रस्तावना में दर्ज शब्दों को राजनीतिक दृष्टिकोण से हटाया जा सकता है?

  • संविधान विशेषज्ञों का मानना है कि प्रस्तावना भले ही बदली जा सकती है, लेकिन उसका आत्मिक स्वरूप नहीं बदला जा सकता।
  • राजनीतिक पार्टियों के लिए यह विषय एक सांकेतिक युद्धक्षेत्र बन चुका है—एक ओर राष्ट्रवादी पहचान, दूसरी ओर संवैधानिक मूल्यों की रक्षा।

संविधान की प्रस्तावना केवल शब्दों का समूह नहीं है—यह उस स्वप्न का घोषणापत्र है जो स्वतंत्र भारत के नागरिकों ने देखा था। उसमें छेड़छाड़ केवल शब्दों का परिवर्तन नहीं, बल्कि भारत की संवैधानिक आत्मा का पुनर्लेखन होगा।

इसीलिए यह बहस केवल “धर्मनिरपेक्ष” और “समाजवादी” शब्दों की नहीं, बल्कि उस भारत की है जिसे हम आने वाली पीढ़ियों के लिए छोड़ना चाहते हैं।

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