ओडिशा के पुरी में आज से भगवान जगन्नाथ की भव्य रथ यात्रा का शुभारंभ हो गया है। लाखों श्रद्धालु देश-विदेश से इस महापर्व को देखने पुरी पहुंचे हैं। भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की इस तीन दिवसीय रथ यात्रा को हिन्दू धर्म में विशेष स्थान प्राप्त है। यह पर्व आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को आरंभ होता है, और इसे देखने मात्र से मोक्ष की प्राप्ति का विश्वास है।
लेकिन रथ यात्रा के इस पावन अवसर पर आज हम बात करने जा रहे हैं उस रहस्यमयी कड़ी की, जो जगन्नाथ मंदिर की सीढ़ियों से जुड़ी है। यह कड़ी है मंदिर की तीसरी सीढ़ी, जिसे “यमशिला” कहा जाता है — और इसके पीछे की कथा जितनी प्राचीन है, उतनी ही अद्भुत और गूढ़ भी।
जगन्नाथ मंदिर: एक अद्वितीय तीर्थस्थल
पुरी का जगन्नाथ मंदिर हिन्दू धर्म के चार धामों में से एक है। इस मंदिर का इतिहास 12वीं शताब्दी से भी पुराना है और यह स्थापत्य, परंपरा और रहस्य का अद्वितीय संगम है। लाखों श्रद्धालु प्रतिवर्ष यहाँ दर्शन हेतु आते हैं, यह मानकर कि भगवान जगन्नाथ के दर्शन मात्र से पापों का क्षय हो जाता है और व्यक्ति मोक्ष की ओर अग्रसर हो जाता है।
मंदिर में प्रवेश करने के लिए श्रद्धालुओं को 22 सीढ़ियाँ चढ़नी होती हैं, जिन्हें ‘बैस पहांच’ कहा जाता है। इनमें से हर एक सीढ़ी पवित्र मानी जाती है, लेकिन तीसरी सीढ़ी को लेकर विशेष मान्यता और एक रहस्यमयी कथा जुड़ी हुई है।
यमशिला की कथा: मृत्यु के देवता का वास
यह तीसरी सीढ़ी सामान्य नहीं है। धार्मिक ग्रंथों और लोककथाओं के अनुसार, यह सीढ़ी यमराज का वास स्थान मानी जाती है, जिसे ‘यमशिला’ कहा गया है।
कथा के अनुसार, एक बार यमराज ने भगवान जगन्नाथ से मिलने के लिए पुरी मंदिर का रुख किया। वे चिंतित थे कि उनके लोक (यमलोक) में अब आत्माएँ आना बंद हो गई हैं। इसका कारण यह था कि भगवान जगन्नाथ के दर्शन मात्र से ही मोक्ष मिल रहा था और जीवों को यमलोक की यात्रा नहीं करनी पड़ रही थी।
यह सुनकर भगवान जगन्नाथ मुस्कराए और यमराज को आदेश दिया:
“जो व्यक्ति मेरे दर्शन के पश्चात इस तीसरी सीढ़ी पर पाँव रखेगा, उसके पाप नष्ट होंगे, लेकिन वह अंततः तुम्हारे लोक को प्राप्त करेगा।”
इस घोषणा के बाद से ही तीसरी सीढ़ी को यमशिला कहा जाने लगा, और तब से लेकर आज तक, श्रद्धालु इस सीढ़ी पर पाँव रखने से बचते हैं। वे या तो इसे पार कर जाते हैं या सिर झुकाकर स्पर्श करते हैं, लेकिन सीधे उस पर पाँव नहीं रखते।
यमशिला की पहचान कैसे करें?
जगन्नाथ मंदिर प्रशासन ने श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए यमशिला को अन्य सीढ़ियों से विभिन्न रंग में चिन्हित किया है। जहां बाकी 21 सीढ़ियाँ सामान्य पत्थर की हैं, वहीं तीसरी सीढ़ी काले रंग की है — जो स्पष्ट रूप से यमशिला को पहचानने योग्य बनाती है।
यह विशेष चिन्ह इस बात का प्रतीक है कि मृत्यु, पुनर्जन्म और मोक्ष के गूढ़ सिद्धांतों को यह एक सीढ़ी अपने भीतर समेटे हुए है। यह न केवल धार्मिक विश्वास है, बल्कि यह भी संकेत है कि आस्था और परंपरा का गहराई से पालन कैसे किया जाता है।
क्या है धार्मिक महत्व?
हिन्दू मान्यता के अनुसार, यमराज केवल मृत्यु के देवता नहीं हैं, वे न्याय के देवता भी हैं। जीवन के पाप-पुण्य का लेखा-जोखा रखने वाले यमराज, भगवान विष्णु (जगन्नाथ) के अधीन माने जाते हैं।
इसलिए यमराज को जगन्नाथ मंदिर के प्रवेशद्वार पर स्थान देने की मान्यता यह दर्शाती है कि जगन्नाथ सर्वोच्च सत्ता हैं, और यमराज भी उनकी इच्छा के अनुसार कार्य करते हैं। साथ ही यह भी संकेत है कि भगवान के दर्शन के बाद यदि व्यक्ति अपने कर्मों में सुधार नहीं करता, तो वह यमलोक से नहीं बच सकता।
श्रद्धालु कैसे करते हैं यमशिला का सम्मान?
मंदिर में आने वाले अधिकतर श्रद्धालु दर्शन से पहले और बाद में सीढ़ियों को ध्यानपूर्वक देखते हैं। यमशिला के पास पहुँचकर कई लोग:
- सीढ़ी को स्पर्श करके माथे से लगाते हैं।
- कुछ लोग उस पर पाँव रखे बिना लंबा कदम बढ़ाकर ऊपर की ओर बढ़ते हैं।
- वहीं कुछ श्रद्धालु यमराज को ध्यानपूर्वक प्रणाम करते हैं, यह मानकर कि उनका दर्शन भी भगवान के समीप ले जाता है।
यह श्रद्धा न केवल विश्वास को प्रकट करती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि भारतीय संस्कृति में मृत्यु और मोक्ष को कितनी गहराई से समझा गया है।
रथ यात्रा और यमशिला: प्रतीकों का संगम
रथ यात्रा का पर्व, जहाँ भगवान खुद बाहर आकर जनता को दर्शन देते हैं, वहीं यमशिला यह स्मरण कराती है कि जीवन, मृत्यु और मोक्ष तीनों एक ही चक्र के अंग हैं। भगवान के रथ पर बैठने से लेकर मंदिर की सीढ़ियों तक, हर प्रतीक में एक आध्यात्मिक संदेश छिपा है।
यह परंपरा सिर्फ कर्मकांड नहीं, बल्कि जीवन दर्शन है — कि मनुष्य को ईश्वर का दर्शन करने के बाद अपने कर्मों पर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि मोक्ष पाने के लिए केवल दर्शन ही नहीं, सदाचार और संयमित जीवन भी आवश्यक है।
निष्कर्ष: यमशिला — आस्था और आत्मबोध का प्रतीक
पुरी के जगन्नाथ मंदिर की तीसरी सीढ़ी, यमशिला, कोई सामान्य पत्थर नहीं, यह एक धार्मिक चेतना का केंद्र है। यह हमें यह समझाने का माध्यम है कि ईश्वर के दर्शन से पूर्व और पश्चात, हमें आत्मचिंतन की आवश्यकता है।
यमशिला न केवल यमराज की उपस्थिति का संकेत देती है, बल्कि यह भी बताती है कि मोक्ष का मार्ग भक्ति से होकर गुजरता है, लेकिन कर्म और चेतना के साथ।
तो जब भी आप पुरी जाएँ, और जगन्नाथ मंदिर में दर्शन करें — 22 सीढ़ियाँ पार करते हुए उस तीसरी सीढ़ी पर रुकिए, उसे देखिए, सर झुकाइए… क्योंकि वह केवल पत्थर नहीं — धर्म, न्याय और मोक्ष का द्वार है।
















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